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शताब्दियों का इतिहास समेटे है धार्मिक महत्व की नगरी गंगोह
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बाबा हरिदास की प्रतिमा
- फोटो : SAHARANPUR
शताब्दियों का इतिहास समेटे है धार्मिक महत्व की नगरी गंगोह
गंगोह (सहारनपुर)। राजा गंग की नगरी गंगोह का तहसील बनने का दावा यूं ही पुख्ता नहीं है, इसे केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने इसे ग्रामीण पर्यटन का दर्जा दे रखा है। गंगोह नगर का जहां धार्मिक रूप से बेहद महत्व है, वहीं यह क्षेत्र स्वयं में शताब्दियों पुराना इतिहास भी समेटे है। धार्मिक ऐतिहासिक महत्व और उत्साहित नागरिकों की मांग को अब नजरअंदाज कर पाना मुश्किल है। प्रशासन ने भी अपनी ओर से प्रयास शुरू कर दिए हैं।
सूफी संतों की नगरी गंगोह दुनिया को दे रही सौहार्द का संदेश
गंगोह। विख्यात सूफी संत हजरत कुतुबे आलम और बाबा हरीदास की नगरी गंगोह पूरे विश्व को सौहार्द का संदेश दे रही है। संत बाबा हरीदास और हजरत कुतुबे आलम की दी गई आध्यात्म और भाईचारे की शिक्षा के कारण ही आज तक कोई ताकत यहां के सांप्रदायिक सद्भाव को तोड़ नहीं पाई है। रूहानियत के रिश्ते में बंधे दोनों संतों ने करीब 13 वर्ष एक साथ गुजारे। सूफी संतों के अनेकों तबर्रूकात यहां संग्रहित हैं। हुमायूं, इब्राहिम लोदी और बाबर जैसे बादशाह भी यहां हाजिरी भरने आते थे। कहा जाता है कि हुमायूं ने ही हजरत कुतुबे आलम की दरगाह बनवाई थी। श्रद्धालु मामू मौला बख्श, हजरत शेख सादिक, अबू सईद की मजारों पर भी मत्था टेकते हैं। यह सभी सूफी संत भी हजरत कुतुबे आलम के वंश से ही संबंध रखते हैं।
मामू मौला बख्श के बारे में बताया जाता है कि मात्र 12 वर्ष की आयु में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के दरबार में हाजिरी देने के बाद यहां आकर उन्होंने अपनी सारी उम्र अपने मुरशीद के यहां गुजारी। इसके अलावा पवित्र कंकराली सरोवर और श्री भगवती सिद्ध पीठ के साथ ही श्री बालाजी धाम और श्री माता वैष्णो देवी धाम भी आस्था के बडे़ केंद्र हैं। इन सभी स्थलों पर प्रतिवर्ष धार्मिक मेले एवं अन्य आयोजन होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
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राजा गंग का बसाया हुआ ऐतिहासिक नगर है गंगोह
गंगोह। गंगोह नगर राजा गंग द्वारा बसाया गया ऐतिहासिक नगर है। 1978 में सराफा बाजार में खोदाई के दौरान हजारों साल पुरानी मूर्ति निकली थी। यहां से करीब छह किलोमीटर दूर गांव लखनौती में भी मुगल काल की भूल भुलैंया, हुजरे, किला एवं सुरक्षा चौकियों के अवशेष आज भी मौजूद हैं। गांव बुड्ढा खेड़ा में 1857 की क्रांति के योद्धा फतवा गुज्जर का किला था। नगर की पहचान रशीद अहमद गंगोही के नगर के रूप में भी होती है। उन्होंने जहां दारुल उलूम देवबंद की स्थापना में अपनी भूमिका अदा की थी, वहीं स्वतंत्रता आंदोलन का भी हिस्सा बने।
बताते हैं कि सन 1526 ई. में बाबर यहां आया और यहीं पर इब्राहीम लोदी से उनका युद्ध हुआ था, तभी लखनौती की नींव पड़ी थी। यह तुर्कमानों के अधिकार में था। यहां 79,694 बीघा में खेती होती थी और 17,96,058 दाम मालगुजारी वसूल होती थी। उसी समय लखनौती को बाबर ने अपने एक सिपहसालार को सौंप दिया था। उसके बाद ही यहां विभिन्न इमारतों का निर्माण भी हुआ। लखनौती में प्रवेश करते ही मुगल काल का किला दिखाई दे जाता है, मुगलकाल के हुजरे भी यहां कई स्थानों पर बने हुए हैं। गंगोह में राजा गंग के महल की निशानी एकमात्र दरवाजा आज भी मौजूद है। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने गंगोह को ग्रामीण पर्यटन स्थल का दर्जा भी दे रखा है। इन स्थलों को देखने के लिए यहां साल भर में भारी संख्या में लोग आते हैं।
प्रस्तावित तहसील शामली में जाना कोरी अफवाह
सामाजिक कार्यकर्ता बलबीर सिंह तोमर के अनुसार प्रस्तावित गंगोह तहसील के शामली जिले में जाने की चर्चा भी निराधार है। कुछ लोग नाहक ही भ्रम पैदा करते हैं। ऐसा कार्य केवल संसद ही नियम बदलकर कर सकती है। कोई भी लोकसभा क्षेत्र दो राज्यों तथा विधानसभा क्षेत्र दो जिलों में फैला हुआ नहीं हो सकता।
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गंगोह (सहारनपुर)। राजा गंग की नगरी गंगोह का तहसील बनने का दावा यूं ही पुख्ता नहीं है, इसे केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने इसे ग्रामीण पर्यटन का दर्जा दे रखा है। गंगोह नगर का जहां धार्मिक रूप से बेहद महत्व है, वहीं यह क्षेत्र स्वयं में शताब्दियों पुराना इतिहास भी समेटे है। धार्मिक ऐतिहासिक महत्व और उत्साहित नागरिकों की मांग को अब नजरअंदाज कर पाना मुश्किल है। प्रशासन ने भी अपनी ओर से प्रयास शुरू कर दिए हैं।
सूफी संतों की नगरी गंगोह दुनिया को दे रही सौहार्द का संदेश
गंगोह। विख्यात सूफी संत हजरत कुतुबे आलम और बाबा हरीदास की नगरी गंगोह पूरे विश्व को सौहार्द का संदेश दे रही है। संत बाबा हरीदास और हजरत कुतुबे आलम की दी गई आध्यात्म और भाईचारे की शिक्षा के कारण ही आज तक कोई ताकत यहां के सांप्रदायिक सद्भाव को तोड़ नहीं पाई है। रूहानियत के रिश्ते में बंधे दोनों संतों ने करीब 13 वर्ष एक साथ गुजारे। सूफी संतों के अनेकों तबर्रूकात यहां संग्रहित हैं। हुमायूं, इब्राहिम लोदी और बाबर जैसे बादशाह भी यहां हाजिरी भरने आते थे। कहा जाता है कि हुमायूं ने ही हजरत कुतुबे आलम की दरगाह बनवाई थी। श्रद्धालु मामू मौला बख्श, हजरत शेख सादिक, अबू सईद की मजारों पर भी मत्था टेकते हैं। यह सभी सूफी संत भी हजरत कुतुबे आलम के वंश से ही संबंध रखते हैं।
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मामू मौला बख्श के बारे में बताया जाता है कि मात्र 12 वर्ष की आयु में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के दरबार में हाजिरी देने के बाद यहां आकर उन्होंने अपनी सारी उम्र अपने मुरशीद के यहां गुजारी। इसके अलावा पवित्र कंकराली सरोवर और श्री भगवती सिद्ध पीठ के साथ ही श्री बालाजी धाम और श्री माता वैष्णो देवी धाम भी आस्था के बडे़ केंद्र हैं। इन सभी स्थलों पर प्रतिवर्ष धार्मिक मेले एवं अन्य आयोजन होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
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राजा गंग का बसाया हुआ ऐतिहासिक नगर है गंगोह
गंगोह। गंगोह नगर राजा गंग द्वारा बसाया गया ऐतिहासिक नगर है। 1978 में सराफा बाजार में खोदाई के दौरान हजारों साल पुरानी मूर्ति निकली थी। यहां से करीब छह किलोमीटर दूर गांव लखनौती में भी मुगल काल की भूल भुलैंया, हुजरे, किला एवं सुरक्षा चौकियों के अवशेष आज भी मौजूद हैं। गांव बुड्ढा खेड़ा में 1857 की क्रांति के योद्धा फतवा गुज्जर का किला था। नगर की पहचान रशीद अहमद गंगोही के नगर के रूप में भी होती है। उन्होंने जहां दारुल उलूम देवबंद की स्थापना में अपनी भूमिका अदा की थी, वहीं स्वतंत्रता आंदोलन का भी हिस्सा बने।
बताते हैं कि सन 1526 ई. में बाबर यहां आया और यहीं पर इब्राहीम लोदी से उनका युद्ध हुआ था, तभी लखनौती की नींव पड़ी थी। यह तुर्कमानों के अधिकार में था। यहां 79,694 बीघा में खेती होती थी और 17,96,058 दाम मालगुजारी वसूल होती थी। उसी समय लखनौती को बाबर ने अपने एक सिपहसालार को सौंप दिया था। उसके बाद ही यहां विभिन्न इमारतों का निर्माण भी हुआ। लखनौती में प्रवेश करते ही मुगल काल का किला दिखाई दे जाता है, मुगलकाल के हुजरे भी यहां कई स्थानों पर बने हुए हैं। गंगोह में राजा गंग के महल की निशानी एकमात्र दरवाजा आज भी मौजूद है। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने गंगोह को ग्रामीण पर्यटन स्थल का दर्जा भी दे रखा है। इन स्थलों को देखने के लिए यहां साल भर में भारी संख्या में लोग आते हैं।
प्रस्तावित तहसील शामली में जाना कोरी अफवाह
सामाजिक कार्यकर्ता बलबीर सिंह तोमर के अनुसार प्रस्तावित गंगोह तहसील के शामली जिले में जाने की चर्चा भी निराधार है। कुछ लोग नाहक ही भ्रम पैदा करते हैं। ऐसा कार्य केवल संसद ही नियम बदलकर कर सकती है। कोई भी लोकसभा क्षेत्र दो राज्यों तथा विधानसभा क्षेत्र दो जिलों में फैला हुआ नहीं हो सकता।

हजरत कुतुबे आलम की दरगाह- फोटो : SAHARANPUR

बाबा हरिदास का मंदिर- फोटो : SAHARANPUR

लखनौती का मुगल कालीन किला- फोटो : SAHARANPUR