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गो आधारित प्राकृतिक खेती से बढ़ेगा किसानों का मुनाफा
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सहारनपुर। परंपरागत विधि से खेती की बढ़ती लागत और घटती बचत को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र( केवीके) गो आधारित प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों को प्रेरित करेगा। इसके लिए केवीके परिसर में कृषि वैज्ञानिक एक मॉडल तैयार करेंगे। इसके पास ही परंपरागत विधि से भी खेती की जाएगी। जिससे किसानों को इन दोनों विधियों का अंतर आसानी से समझाया जा सके।
खेती में लगातार बढ़ रहे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग ने न सिर्फ मृदा को बीमार बना दिया है, बल्कि इनके अंश उत्पाद में आने से मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसके अलावा फसल की लागत में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जिसके चलते खेती में बचत घट रही है। इसको देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र देशी गाय पर आधारित प्राकृतिक खेती का एक मॉडल तैयार करेगा। इसमें प्रयोग के तौर पर एक एकड़ क्षेत्रफल में धान और गेहूं की प्राकृतिक खेती की जाएगी। इसके पास ही इन्हीं फसलों की परंपरागत विधि से खेती की जाएगी। जिससे किसानों को दोनों विधियों के अंतर, लागत और फायदों की जानकारी दी जा सके।
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उर्वरकों के स्थान पर होगा जीवामृत का प्रयोग
प्राकृतिक खेती में रसायनिक उर्वरकों के स्थान पर घन जीवामृत का प्रयोग किया जाएगा। जिससे फसल की लागत में कमी आएगी। जीवामृत को देशी गाय का गोमूत्र, गोबर, गुड़, बेसन और मिट्टी को मिलाकर तैयार किया जाता है। मिलाने के एक सप्ताह बाद यह इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। इससे न सिर्फ भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है, बल्कि मृदा में मित्र जीवाणुओं की संख्या में भी इजाफा होता है। गाय का गोबर, गोमूत्र, तंबाकू, लहसुन, लाल मिर्च आदि को मिलाकर बनाए जाने वाले कीटनाशकों का प्रयोग फसलों पर किया जाएगा। यह कीटनाशक मित्र कीटों को कोई नुकसान नहीं करता।
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-- वर्जन --
केवीके परिसर में प्राकृतिक खेती का एक मॉडल तैयार किया जाएगा। जिससे किसानों को इसके प्रति प्रेरित किया जा सके। इसके पास ही परंपरागत विधि से खेती भी करायी जाएगी। इससे किसान को दोनों विधियों की लागत, उत्पादन और फायदों के बारे में जानकारी मिलेगी।
--- डॉ. आईके कुशवाहा, फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर और प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र।
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खेती में लगातार बढ़ रहे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग ने न सिर्फ मृदा को बीमार बना दिया है, बल्कि इनके अंश उत्पाद में आने से मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसके अलावा फसल की लागत में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जिसके चलते खेती में बचत घट रही है। इसको देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र देशी गाय पर आधारित प्राकृतिक खेती का एक मॉडल तैयार करेगा। इसमें प्रयोग के तौर पर एक एकड़ क्षेत्रफल में धान और गेहूं की प्राकृतिक खेती की जाएगी। इसके पास ही इन्हीं फसलों की परंपरागत विधि से खेती की जाएगी। जिससे किसानों को दोनों विधियों के अंतर, लागत और फायदों की जानकारी दी जा सके।
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उर्वरकों के स्थान पर होगा जीवामृत का प्रयोग
प्राकृतिक खेती में रसायनिक उर्वरकों के स्थान पर घन जीवामृत का प्रयोग किया जाएगा। जिससे फसल की लागत में कमी आएगी। जीवामृत को देशी गाय का गोमूत्र, गोबर, गुड़, बेसन और मिट्टी को मिलाकर तैयार किया जाता है। मिलाने के एक सप्ताह बाद यह इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। इससे न सिर्फ भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है, बल्कि मृदा में मित्र जीवाणुओं की संख्या में भी इजाफा होता है। गाय का गोबर, गोमूत्र, तंबाकू, लहसुन, लाल मिर्च आदि को मिलाकर बनाए जाने वाले कीटनाशकों का प्रयोग फसलों पर किया जाएगा। यह कीटनाशक मित्र कीटों को कोई नुकसान नहीं करता।
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-- वर्जन --
केवीके परिसर में प्राकृतिक खेती का एक मॉडल तैयार किया जाएगा। जिससे किसानों को इसके प्रति प्रेरित किया जा सके। इसके पास ही परंपरागत विधि से खेती भी करायी जाएगी। इससे किसान को दोनों विधियों की लागत, उत्पादन और फायदों के बारे में जानकारी मिलेगी।
--- डॉ. आईके कुशवाहा, फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर और प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र।