फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Saharanpur News ›   World cotton day: cost not much market available for sale, farmers turn away from cotton cultivation

विश्व कपास दिवस लागत ज्यादा बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं बाजार, किसानों ने रुई की खेती से मोड़ा मुहं

Wed, 07 Oct 2020 12:33 AM IST
मेरठ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर Published by: मेरठ ब्यूरो Updated Wed, 07 Oct 2020 12:33 AM IST
सार

- जिले में दो दशक पहले तक काफी किसान कपास की खेती करते थे
- बुनकर भी पुरानी ऊन और पुरानी साड़ियों से बना रहे चादर और खेस

विज्ञापन
World cotton day: cost not much market available for sale, farmers turn away from cotton cultivation
kapas, kapas farming - फोटो : amar ujala

विस्तार

एक वक्त था जब बड़ी संख्या में किसान कपास की खेती करते थे। बुनकरों को भी कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो जाता था, लेकिन कपास की खेती में लागत और मेहनत ज्यादा होने तथा इसकी बिक्री का बाजार उपलब्ध नहीं होने से कपास की खेती से मोहभंग हो गया। आज सहारनपुर जिले में गिने-चुने किसान ही कपास की खेती करते हैं। वह व्यावसायिक लिहाज से नहीं, बल्कि अपने घरेलू उपयोग को ध्यान में रखकर ही कर रहे हैं। पेश है किसानों और बुनकरों से बातचीत के साथ रिपोर्ट...
विज्ञापन


पानीपत से लाते हैं पुरानी ऊन : शौकीन
पुवांरका ब्लाक के गांव जयरामपुर उर्फ नानका निवासी शौकीन अंसारी ने बताया कि तीन पीढ़ियों से कपास से बनी रुई के धागे से दुतई, खेस और पहनने का कपड़ा बुनने का काम किया जाता था। पिछले एक दशक से कपास की खेती बंद होने से रुई नहीं मिल रही है। अब वे पानीपत से पुरानी ऊन लाकर उसके कंबल या फिर पुरानी साड़ियों से चादर बनाने का काम करते हैं।
विज्ञापन

कच्चा माल नहीं मिलने से बुनकर भी परेशान : जाकिर
गांव जयरामपुर उर्फ नानका निवासी जाकिर अंसारी ने बताया कि उनके गांव में कभी 80 फीसदी आबादी दुतई, खेस, चादर आदि बुनाई के कारोबार से जुड़ी थी। क्योंकि तब कपास की खेती होने के कारण कच्चा माल आसानी से मिल जाता था। अब कच्चे माल की अनुपलब्धता और लगातार घाटे के चलते मुश्किल से 10 या 12 लोग ही इस काम को कर रहे हैं।

गन्ना और धान की तरफ ज्यादा रुझान : मोहन सिंह
गंगोह क्षेत्र के गुरुनानकपुरा गांव के 70 वर्षीय किसान मोहन सिंह का कहना है कि पहले कपास की खेती से ही किसान अपने परिवार की रोजी रोटी के साथ अपनी जरूरतें भी पूरी करता था। गन्ने और धान की खेती की अपेक्षा कपास की खेती नुकसान का सौदा साबित रही, जिस कारण इसकी खेती घट गई।

कपास की खेती में नुकसान ज्यादा : कुलदीप
शकरपुर गांव के कुलदीप सैनी ने बताया कि राजस्थान से पहले कपास की मंडी नहीं है। ऐसे में कपास उगाकर बेचने के लिए भी किसान को परेशान होना पड़ता है। ज्यादा बीमारियां लगने के कारण कीटनाशक का इस्तेमाल करना पड़ता है जिस कारण फसल उगाना महंगा पड़ता है। एक कारण यह भी है कि कपास की खेती से किसानों का मोह भंग हो गया।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed