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1962 के चीन युद्ध में शामिल रहे देवी सिंह का भी खोला खून
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मेडल दिखाते देवी सिंह
- फोटो : SAHARANPUR
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1962 के युद्ध में शामिल रहे 84 वर्षीय देवी सिंह का भी खून खोला
अंबेहटा। गलवां घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प पर पूर्व सैनिकों का भी खून खौल उठा है। इनमें शामिल पूर्व सैनिक 84 वर्षीय देवी सिंह ने कहा चीन का इतिहास हमेशा से धोखे का रहा है, इसलिए चीन को मुंह तोड़ जवाब मिला बेहद जरूरी है।
क्षेत्र के मोहद्दीनपुर गांव निवासी सेना के भूतपूर्व सैनिक देवी सिंह ने बताया कि 1957 में उनकी भर्ती राजपूत रेजीमेंट चार पलटन में नायक के पद पर हुई थी। उन्होंने बताया कि गलवां घाटी में धोखा देने की चीन की फितरत की घटना पहली नहीं है। देवी सिंह ने बताया कि 1962 में वह नेफा में तैनात थे। तब चीनी सैनिकों ने नेपाल के रास्ते आकर पीछे से भारतीय सेना को घेरकर पर हमला बोला था, इसमें सैकड़ों भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। 20 सैनिकों को चीन ने कैद किया । इसमें देवी सिंह भी शामिल रहे। काफी समय तक जब सैनिकों का कुछ पता नहीं लग सका तो भारत सरकार ने सैनिकों के जिंदा होने की आस छोड़ दी थी। घरवालों ने भी देवी सिंह को मरा समझकर सभी क्रियायें पूरी कर दी थी। देवी सिंह ने बताया कि करीब आठ माह बाद चीन ने सैनिकों के नाम की एक लिस्ट भारत सरकार को भेजी। इसके बाद सरकार और उनके घरवालों को देवी सिंह सहित अन्य सैनिकों के जिंदा होने की खबर लगी थी। वे करीब एक साल तक चीन की कैद में रहे ।
देवी सिंह ने बताया कि 1962 में जब नेफा में चीन ने धोखे से हमला किया तो उस हमले में अन्य सैनिकों के साथ साथ गंगोह क्षेत्र के गांव दूधला निवासी सूबेदार मेजर पृथ्वी सिंह भी शहीद हो गए थे। गलवां की घटना के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए देवी सिंह ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत सरकार ने जो कार्रवाई की है, वह एकदम सही है। चीन को उसकी ही भाषा में जवाब मिलना बेहद जरूरी है। भावुक होते हुए देवी सिंह ने कहा कि उम्र का तकाजा न होता तो वे आज भी चीन के खिलाफ लड़ाई लड़ने का हौसला रखते हैं। देवी सिंह ने कहा नौजवान देश की सेवा के लिए आगे आएं। देवी सिंह ने चीन के सामान के बहिष्कार करने की अपील की। साथ ही सरकार से मांग की कि चीन के सामान को आयात न किया जाए।
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अंबेहटा। गलवां घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प पर पूर्व सैनिकों का भी खून खौल उठा है। इनमें शामिल पूर्व सैनिक 84 वर्षीय देवी सिंह ने कहा चीन का इतिहास हमेशा से धोखे का रहा है, इसलिए चीन को मुंह तोड़ जवाब मिला बेहद जरूरी है।
क्षेत्र के मोहद्दीनपुर गांव निवासी सेना के भूतपूर्व सैनिक देवी सिंह ने बताया कि 1957 में उनकी भर्ती राजपूत रेजीमेंट चार पलटन में नायक के पद पर हुई थी। उन्होंने बताया कि गलवां घाटी में धोखा देने की चीन की फितरत की घटना पहली नहीं है। देवी सिंह ने बताया कि 1962 में वह नेफा में तैनात थे। तब चीनी सैनिकों ने नेपाल के रास्ते आकर पीछे से भारतीय सेना को घेरकर पर हमला बोला था, इसमें सैकड़ों भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। 20 सैनिकों को चीन ने कैद किया । इसमें देवी सिंह भी शामिल रहे। काफी समय तक जब सैनिकों का कुछ पता नहीं लग सका तो भारत सरकार ने सैनिकों के जिंदा होने की आस छोड़ दी थी। घरवालों ने भी देवी सिंह को मरा समझकर सभी क्रियायें पूरी कर दी थी। देवी सिंह ने बताया कि करीब आठ माह बाद चीन ने सैनिकों के नाम की एक लिस्ट भारत सरकार को भेजी। इसके बाद सरकार और उनके घरवालों को देवी सिंह सहित अन्य सैनिकों के जिंदा होने की खबर लगी थी। वे करीब एक साल तक चीन की कैद में रहे ।
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देवी सिंह ने बताया कि 1962 में जब नेफा में चीन ने धोखे से हमला किया तो उस हमले में अन्य सैनिकों के साथ साथ गंगोह क्षेत्र के गांव दूधला निवासी सूबेदार मेजर पृथ्वी सिंह भी शहीद हो गए थे। गलवां की घटना के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए देवी सिंह ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत सरकार ने जो कार्रवाई की है, वह एकदम सही है। चीन को उसकी ही भाषा में जवाब मिलना बेहद जरूरी है। भावुक होते हुए देवी सिंह ने कहा कि उम्र का तकाजा न होता तो वे आज भी चीन के खिलाफ लड़ाई लड़ने का हौसला रखते हैं। देवी सिंह ने कहा नौजवान देश की सेवा के लिए आगे आएं। देवी सिंह ने चीन के सामान के बहिष्कार करने की अपील की। साथ ही सरकार से मांग की कि चीन के सामान को आयात न किया जाए।
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