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Saharanpur News: अंग्रेज अफसरों ने भी झुकाया था माता के आगे शीश
Tue, 09 Apr 2024 02:48 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Tue, 09 Apr 2024 02:48 AM IST
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यूपी उत्तराखंड सीमा पर स्थित डाट काली माता का भवन। संवाद
छुटमलपुर। यूपी-उत्तराखंड की सीमा पर सहारनपुर जिला मुख्यालय से 55 किमी दूर दून हाईवे किनारे स्थित मां डाट काली मनोकामना सिद्धपीठ करोड़ो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। नवरात्र में यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है। 1804 में स्थापित इस मंदिर की स्थापना के वक्त से यहां लगातार धूना जल रहा है, जबकि 1921 से अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित हो रही है। अंग्रेज अफसरों ने भी माता की शक्ति के आगे शीश झुकाया था।
मंदिर के नौवें महंत रमन प्रसाद गोस्वामी बताते हैं कि पहले माता का स्वरूप शिवालिक घाटी में स्थापित होने के कारण इसे घाटेवाली देवी के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1804 में सहारनपुर देहरादून सड़क मार्ग के निर्माण के दौरान अंग्रेजों द्वारा पहाड़ियों के बीच सुरंग बनाने का काम चल रहा था। मजदूर दिन में जितनी खोदाई करते रात में वह ढह जाती। जब यह सिलसिला कई दिनों तक चला और अंग्रेज अफसर परेशान हो गए तो एक दिन माता ने सपने में आकर मंदिर को सुरंग के पास स्थापित करने का आदेश दिया। इस पर मंदिर यहां प्रतिष्ठित किया गया। इसके बाद ही सुरंग बन सकी। इस पर अंग्रेज अफसरों ने भी माता की शक्ति के समक्ष शीश नवाया।
पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड की है इष्ट देवी
इस सिद्धपीठ का महत्व पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड में काफी है। नया वाहन लेने पर श्रद्धालु पूजा कराने मंदिर में पहुंचते हैं। महंत रमन प्रसाद गोस्वामी बताते हैं कि अष्टमी और नवमी पर 108 कन्याओं को भोग लगाने के साथ ही दस हजार भक्तों के लिए भोजन प्रसाद बनाया जाता है।
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नेपाली सेना के गोरखा सेनापति ने की थी मां भद्रकाली मंदिर की स्थापना
सुरंग पार देहरादून की सीमा में मां भद्रकाली का मंदिर है। बताया जाता है कि मुगलों से लड़ते हुए नेपाली सेनापति बलभद्र सिंह यहां तक आ पहुंचे थे, लेकिन मुगलों ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया तो उन्होंने इष्ट देवी माता की उपासना की। माता ने एक स्थान पर दबी हुई अपनी मूर्ति खोज कर यहां स्थापित करके की आज्ञा दी। बलभद्र सिंह ने जैसे ही माता की मूर्ति यहां स्थापित की वैसे ही मुगलों के पैर उखड़ने लगे। इसके बाद बलभद्र सिंह ने मुगलों को दिल्ली तक खदेड़ दिया था।
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मंदिर के नौवें महंत रमन प्रसाद गोस्वामी बताते हैं कि पहले माता का स्वरूप शिवालिक घाटी में स्थापित होने के कारण इसे घाटेवाली देवी के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1804 में सहारनपुर देहरादून सड़क मार्ग के निर्माण के दौरान अंग्रेजों द्वारा पहाड़ियों के बीच सुरंग बनाने का काम चल रहा था। मजदूर दिन में जितनी खोदाई करते रात में वह ढह जाती। जब यह सिलसिला कई दिनों तक चला और अंग्रेज अफसर परेशान हो गए तो एक दिन माता ने सपने में आकर मंदिर को सुरंग के पास स्थापित करने का आदेश दिया। इस पर मंदिर यहां प्रतिष्ठित किया गया। इसके बाद ही सुरंग बन सकी। इस पर अंग्रेज अफसरों ने भी माता की शक्ति के समक्ष शीश नवाया।
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पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड की है इष्ट देवी
इस सिद्धपीठ का महत्व पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड में काफी है। नया वाहन लेने पर श्रद्धालु पूजा कराने मंदिर में पहुंचते हैं। महंत रमन प्रसाद गोस्वामी बताते हैं कि अष्टमी और नवमी पर 108 कन्याओं को भोग लगाने के साथ ही दस हजार भक्तों के लिए भोजन प्रसाद बनाया जाता है।
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नेपाली सेना के गोरखा सेनापति ने की थी मां भद्रकाली मंदिर की स्थापना
सुरंग पार देहरादून की सीमा में मां भद्रकाली का मंदिर है। बताया जाता है कि मुगलों से लड़ते हुए नेपाली सेनापति बलभद्र सिंह यहां तक आ पहुंचे थे, लेकिन मुगलों ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया तो उन्होंने इष्ट देवी माता की उपासना की। माता ने एक स्थान पर दबी हुई अपनी मूर्ति खोज कर यहां स्थापित करके की आज्ञा दी। बलभद्र सिंह ने जैसे ही माता की मूर्ति यहां स्थापित की वैसे ही मुगलों के पैर उखड़ने लगे। इसके बाद बलभद्र सिंह ने मुगलों को दिल्ली तक खदेड़ दिया था।