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सहारनपुर के थे मोहम्मद रफी के उस्ताद अब्दुल वहीद खां
Updated Tue, 31 Jul 2018 12:27 AM IST
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सहारनपुर। महान गायक मोहम्मद रफी अपनी दमदार आवाज की बदौलत दुनिया भर के करोड़ों दिलों पर आज भी राज कर रहे हैं। मगर ऐसे लोग कम ही होंगे, जो यह जानते हों कि मोहम्मद रफी ने जिस उस्ताद अब्दुल वहीद खां से संगीत की शिक्षा ली वह सहारनपुर में रहते थे। इतना ही नहीं, अब्दुल वहीद खां ने लाहौर से आकर अपने जीवन के अंतिम दिन भी सहारनपुर में ही बिताए और यहीं आखिरी सांस ली।
कैराना घराने ने हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया को बड़े-बड़े उस्ताद दिए हैं, जिनमें पंडित भीमसेन जोशी, अब्दुल करीम खां, गंगूबाई हंगल आदि शामिल हैं। नानौता कस्बे के गांव लुहारी में पले और बढ़े उस्ताद अब्दुल वहीद खां भी कैराना घराने से संगीत सीखकर निकले थे, जो लाहौर में संगीत की शिक्षा देते थे। अब्दुल वहीद खां को कम सुनाई देता था। ऐसे में कुछ लोग उन्हें बहरे वहीद खां भी कहते थे। यहां मोहल्ला काजी में अब्दुल वहीद खां के पौत्र और उनके परिवार रहते हैं, जो संगीत से जुड़े हैं। उन्हीं के पौत्रों में से एक इकबाल ने अमर उजाला को बताया कि उस्ताद अब्दुल वहीद खां उनके पिता शकूर खां के चाचा थे। अब्दुल वहीद खां के बेटे हफीदुल्ला खां लंबे समय तक दिल्ली रेडियो में रहे। इकबाल ने बताया कि उस्ताद वहीद खां जीवन के अंतिम दिनों में लाहौर से सब कुछ छोड़कर सहारनपुर में मोहल्ला काजी चले आए थे। यहीं पर उन्होंने अंतिम सांस ली। अब्दुल वहीद खां का शरीर थाना कुतुबशेर के पीछे बने कब्रिस्तान में दफनाया गया था। उधर, संगीतज्ञ सुशील नाज के पास भी इस बात के प्रमाण मौजूद हैं, जिससे यह साबित होता है कि मोहम्मद रफी को संगीत की शिक्षा देने वाले अब्दुल वहीद खां ही थे। उनके पास संगीत विशारद नाम की पुस्तक है, जिसमें कैराना घराने का पूरा इतिहास दर्ज है। सुशील नाज ने बताया कि अमृतसर के गांव कोटला सुल्तान सिंह में जन्मे मोहम्मद रफी देश के बंटवारे से पहले संगीत की शिक्षा लेने के लिए लाहौर में उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के पास गए थे। बड़े गुलाम अली खां के अधिक व्यस्त रहने की वजह से उनकी बात नहीं बन सकी थी। इसी दौरान किसी ने उन्हें लाहौर में ही संगीत की शिक्षा देने वाले उस्ताद अब्दुल वहीद खां से मिलने की सलाह दी। मोहम्मद रफी ने लाहौर में करीब 12 साल तक अब्दुल वहीद खां से संगीत की शिक्षा ली। -----------------------------------------
अब्दुल वहीद से संगीत की शिक्षा लेने का प्रमाण
सुशील नाज के पास मोहम्मद रफी के इंटरव्यू का एक वीडियो है, जिसमें एक पत्रकार मोहम्मद रफी का इंटरव्यू ले रहे हैं। इस वीडियो में मोहम्मद रफी खुद बता रहे हैं कि उन्होंने उस्ताद अब्दुल वहीद खां से संगीत की शिक्षा ली। रफी इंटरव्यू में बता रहे हैं कि अब्दुल वहीद से पहले उन्होंने बरकत अली से भी संगीत की बारीकियां सीखी, जो बड़े गुलाम अली के भाई थे और लाहौर में ही रहते थे।
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फकीर की गायकी सुनकर बढ़ा जुनून
मोहम्मद रफी इंटरव्यू में बता रहे हैं कि जब वह दस वर्ष के थे तो उनके गांव कोटला सुल्तान सिंह में एक फकीर भिक्षा मांगने आता था। वह फकीर खेड़न दे दिन चार नी माई गीत गाता था। मोहम्मद रफी को उस फकीर का गीत इतना पसंद था कि वह उसके पीछे कई गांवों तक चले जाते थे और बाद में घर लौटकर उसी गीत को गुनगुनाया करते थे।
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फिल्में नहीं देखते थे मोहम्मद रफी
इंटरव्यू में मोहम्मद रफी बता रहे हैं कि उन्हें फिल्में देखने का शौक नहीं है। उन्होंने जिंदगी में चार या पांच ही फिल्में देखी थीं। इतना ही नहीं, वह रात की पार्टियों में जाने से भी बचते थे।
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कैराना घराने ने हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया को बड़े-बड़े उस्ताद दिए हैं, जिनमें पंडित भीमसेन जोशी, अब्दुल करीम खां, गंगूबाई हंगल आदि शामिल हैं। नानौता कस्बे के गांव लुहारी में पले और बढ़े उस्ताद अब्दुल वहीद खां भी कैराना घराने से संगीत सीखकर निकले थे, जो लाहौर में संगीत की शिक्षा देते थे। अब्दुल वहीद खां को कम सुनाई देता था। ऐसे में कुछ लोग उन्हें बहरे वहीद खां भी कहते थे। यहां मोहल्ला काजी में अब्दुल वहीद खां के पौत्र और उनके परिवार रहते हैं, जो संगीत से जुड़े हैं। उन्हीं के पौत्रों में से एक इकबाल ने अमर उजाला को बताया कि उस्ताद अब्दुल वहीद खां उनके पिता शकूर खां के चाचा थे। अब्दुल वहीद खां के बेटे हफीदुल्ला खां लंबे समय तक दिल्ली रेडियो में रहे। इकबाल ने बताया कि उस्ताद वहीद खां जीवन के अंतिम दिनों में लाहौर से सब कुछ छोड़कर सहारनपुर में मोहल्ला काजी चले आए थे। यहीं पर उन्होंने अंतिम सांस ली। अब्दुल वहीद खां का शरीर थाना कुतुबशेर के पीछे बने कब्रिस्तान में दफनाया गया था। उधर, संगीतज्ञ सुशील नाज के पास भी इस बात के प्रमाण मौजूद हैं, जिससे यह साबित होता है कि मोहम्मद रफी को संगीत की शिक्षा देने वाले अब्दुल वहीद खां ही थे। उनके पास संगीत विशारद नाम की पुस्तक है, जिसमें कैराना घराने का पूरा इतिहास दर्ज है। सुशील नाज ने बताया कि अमृतसर के गांव कोटला सुल्तान सिंह में जन्मे मोहम्मद रफी देश के बंटवारे से पहले संगीत की शिक्षा लेने के लिए लाहौर में उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के पास गए थे। बड़े गुलाम अली खां के अधिक व्यस्त रहने की वजह से उनकी बात नहीं बन सकी थी। इसी दौरान किसी ने उन्हें लाहौर में ही संगीत की शिक्षा देने वाले उस्ताद अब्दुल वहीद खां से मिलने की सलाह दी। मोहम्मद रफी ने लाहौर में करीब 12 साल तक अब्दुल वहीद खां से संगीत की शिक्षा ली। -----------------------------------------
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अब्दुल वहीद से संगीत की शिक्षा लेने का प्रमाण
सुशील नाज के पास मोहम्मद रफी के इंटरव्यू का एक वीडियो है, जिसमें एक पत्रकार मोहम्मद रफी का इंटरव्यू ले रहे हैं। इस वीडियो में मोहम्मद रफी खुद बता रहे हैं कि उन्होंने उस्ताद अब्दुल वहीद खां से संगीत की शिक्षा ली। रफी इंटरव्यू में बता रहे हैं कि अब्दुल वहीद से पहले उन्होंने बरकत अली से भी संगीत की बारीकियां सीखी, जो बड़े गुलाम अली के भाई थे और लाहौर में ही रहते थे।
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फकीर की गायकी सुनकर बढ़ा जुनून
मोहम्मद रफी इंटरव्यू में बता रहे हैं कि जब वह दस वर्ष के थे तो उनके गांव कोटला सुल्तान सिंह में एक फकीर भिक्षा मांगने आता था। वह फकीर खेड़न दे दिन चार नी माई गीत गाता था। मोहम्मद रफी को उस फकीर का गीत इतना पसंद था कि वह उसके पीछे कई गांवों तक चले जाते थे और बाद में घर लौटकर उसी गीत को गुनगुनाया करते थे।
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फिल्में नहीं देखते थे मोहम्मद रफी
इंटरव्यू में मोहम्मद रफी बता रहे हैं कि उन्हें फिल्में देखने का शौक नहीं है। उन्होंने जिंदगी में चार या पांच ही फिल्में देखी थीं। इतना ही नहीं, वह रात की पार्टियों में जाने से भी बचते थे।