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एक रुपये की इरेजर में भी कमीशन नहीं छोड़ रहे स्कूल
Updated Fri, 06 Apr 2018 12:44 AM IST
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एक रुपये की इरेजर में भी कमीशन नहीं छोड़ रहे स्कूल
सहारनपुर। किताबों और स्टेशनरी की बिक्री में स्कूलों का कमीशन किसी से छिपा नहीं है। आलम यह है कि ज्यादातर स्कूल एक रुपये की इरेजर तक में कमीशन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। स्कूलों और विक्रेताओं की मिलीभगत और मनमानी के सामने अभिभावक कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि मामला उनके कलेजे के टुकड़े के भविष्य से जुड़ा है। ऐसे में वह दिल पर पत्थर रखकर जेब कटवा रहे हैं।
मटिया मलह में एक किताब विक्रेता ने एक नामी स्कूल की किताबें बेचने का जिम्मा लिया हुआ है। यह विक्रेता किताबों के साथ नोटबुक यानी कॉपी और पेंसिल, इरेजर (रबर) और शॉर्पनर (कटर) के पैकेट भी बेच रहा है। जानकर हैरानी होगी कि बाजार में अच्छी क्वालिटी की दस पेंसिल का बॉक्स 35 से 40 रुपये में उपलब्ध है। मगर यहां किसी लोकल कंपनी की दस पेंसिल का पैकेट 45 से 50 रुपये में दिया जा रहा है। 20 इरेजर के पैकेट के भी 25 से 30 रुपये वसूले जा रहे हैं, जबकि बाजार में अच्छी कंपनी की इरेजर का पैकेट 20 रुपये में उपलब्ध है। यही हालत शॉर्पनर के भी साथ है। हालांकि इस दुकान पर नोटबुक, इरेजर, पेंसिल और शॉर्पनर कहीं से भी खरीदने की छूट है। मगर ज्यादातर अभिभावक जानकारी के अभाव में या भटकने से बचने के लिए पूरी किट वहीं से खरीद रहे हैं। दुकान के बाहर मिले राजपाल और संजीव मनचंदा का आरोप है कि स्कूल किताबों में 30 से 40 प्रतिशत तक का कमीशन ले रहे हैं। यह भी बताया कि स्कूल ने किताबें बेचने का ठेका एक ही दुकान को दिया हुआ है। ऐसे में उनके सामने कोई विकल्प नहीं है।
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स्टेशनरी खरीदने का दबाव
दिल्ली रोड स्थित एक किताब विक्रेता अभिभावकों को किताबों के साथ स्टेशनरी भी थोप रहा है। मनोज शर्मा और पिंकी ने बताया कि वह दुकान पर बच्चों के लिए किताबें खरीदने पहुंचे थे। मगर दुकानदार ने स्टेशनरी भी साथ में थमा दी। जब स्टेशनरी देने से मना किया गया तो दुकानदार ने किताबें भी उठाकर भीतर रख लीं। जब उन्होंने कहा कि उन्हें केवल किताबें चाहिए तो दुकानदार बोला कि 15 दिन बाद आना। अभी किताबें चाहिए बतो स्टेशनरी लेनी ही होगी।
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दो दिन पहले एक अभिभावक के साथ मारपीट हुई
दिल्ली रोड स्थित किताबों की एक दुकान पर दो दिन पहले किताबें वापस करने गए एक अभिभावक की दुकानदार के साथ मारपीट भी हुई। अभिभावक का आरोप है कि दुकानदार ने उन्हें गलत क्लास की किताबें दे दीं, जिनका उन्हें घर जाकर पता चला। अगले दिन जब वह किताबें बदलने पहुंचे तो आरोप है कि नहीं बदली गई और दूसरे दिन आने को कहा। जब वह दूसरे दिन पहंचे तो उनको घंटों इंतजार कराया गया। इस बात को लेकर कहासुनी हुई, जिसके बाद दुकान पर तैनात स्टाफ ने उनके साथ बदसलूकी की। सूचना मिलने पर पुलिस भी मौके पर पहुंची थी।
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फिर बदली गई यूनिफॉर्म
अनेक स्कूल कमीशन के चक्कर में प्रत्येक वर्ष यूनिफॉर्म बदल रहे हैं। नियमानुसार कोई भी स्कूल अभिभावकों की सहमति के बिना यूनिफॉर्म चेंज नहीं कर सकता है। मगर ज्यादातर स्कूलों को इसकी परवाह नहीं है। क्योंकि उन्हें प्रत्येक वर्ष कमीशन चाहिए। इसलिए वह बार-बार यूनिफॉर्म चेंज कर रहे हैं। आईटीसी रोड निवासी अनिल नाम के एक अभिभावक ने फेसबुक के जरिए स्कूल की इस मनमानी को उजागर किया है।
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अभिभावकों के सामने हों कई विकल्प
सीबीएसई स्कूलों की संस्था प्रोग्रेसिव स्कूल फोरम के संयोजक सुरेंद्र चौहान का कहना है कि अभिभावकों पर दुकान विशेष से यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी खरीदने का दबाव बनाना ठीक नहीं है। जहां तक मुझे पता है ऐसा सभी स्कूल नहीं कर रहे हैं। मगर जो कुछ स्कूल ऐसा कर भी रहे हैं तो उन्हें अभिभावकों के सामने सामान खरीदने के विकल्प रखने चाहिए। जिससे अभिभावक अपनी मर्जी की जगह से सामान खरीद सकें।
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सहारनपुर। किताबों और स्टेशनरी की बिक्री में स्कूलों का कमीशन किसी से छिपा नहीं है। आलम यह है कि ज्यादातर स्कूल एक रुपये की इरेजर तक में कमीशन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। स्कूलों और विक्रेताओं की मिलीभगत और मनमानी के सामने अभिभावक कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि मामला उनके कलेजे के टुकड़े के भविष्य से जुड़ा है। ऐसे में वह दिल पर पत्थर रखकर जेब कटवा रहे हैं।
मटिया मलह में एक किताब विक्रेता ने एक नामी स्कूल की किताबें बेचने का जिम्मा लिया हुआ है। यह विक्रेता किताबों के साथ नोटबुक यानी कॉपी और पेंसिल, इरेजर (रबर) और शॉर्पनर (कटर) के पैकेट भी बेच रहा है। जानकर हैरानी होगी कि बाजार में अच्छी क्वालिटी की दस पेंसिल का बॉक्स 35 से 40 रुपये में उपलब्ध है। मगर यहां किसी लोकल कंपनी की दस पेंसिल का पैकेट 45 से 50 रुपये में दिया जा रहा है। 20 इरेजर के पैकेट के भी 25 से 30 रुपये वसूले जा रहे हैं, जबकि बाजार में अच्छी कंपनी की इरेजर का पैकेट 20 रुपये में उपलब्ध है। यही हालत शॉर्पनर के भी साथ है। हालांकि इस दुकान पर नोटबुक, इरेजर, पेंसिल और शॉर्पनर कहीं से भी खरीदने की छूट है। मगर ज्यादातर अभिभावक जानकारी के अभाव में या भटकने से बचने के लिए पूरी किट वहीं से खरीद रहे हैं। दुकान के बाहर मिले राजपाल और संजीव मनचंदा का आरोप है कि स्कूल किताबों में 30 से 40 प्रतिशत तक का कमीशन ले रहे हैं। यह भी बताया कि स्कूल ने किताबें बेचने का ठेका एक ही दुकान को दिया हुआ है। ऐसे में उनके सामने कोई विकल्प नहीं है।
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स्टेशनरी खरीदने का दबाव
दिल्ली रोड स्थित एक किताब विक्रेता अभिभावकों को किताबों के साथ स्टेशनरी भी थोप रहा है। मनोज शर्मा और पिंकी ने बताया कि वह दुकान पर बच्चों के लिए किताबें खरीदने पहुंचे थे। मगर दुकानदार ने स्टेशनरी भी साथ में थमा दी। जब स्टेशनरी देने से मना किया गया तो दुकानदार ने किताबें भी उठाकर भीतर रख लीं। जब उन्होंने कहा कि उन्हें केवल किताबें चाहिए तो दुकानदार बोला कि 15 दिन बाद आना। अभी किताबें चाहिए बतो स्टेशनरी लेनी ही होगी।
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दो दिन पहले एक अभिभावक के साथ मारपीट हुई
दिल्ली रोड स्थित किताबों की एक दुकान पर दो दिन पहले किताबें वापस करने गए एक अभिभावक की दुकानदार के साथ मारपीट भी हुई। अभिभावक का आरोप है कि दुकानदार ने उन्हें गलत क्लास की किताबें दे दीं, जिनका उन्हें घर जाकर पता चला। अगले दिन जब वह किताबें बदलने पहुंचे तो आरोप है कि नहीं बदली गई और दूसरे दिन आने को कहा। जब वह दूसरे दिन पहंचे तो उनको घंटों इंतजार कराया गया। इस बात को लेकर कहासुनी हुई, जिसके बाद दुकान पर तैनात स्टाफ ने उनके साथ बदसलूकी की। सूचना मिलने पर पुलिस भी मौके पर पहुंची थी।
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फिर बदली गई यूनिफॉर्म
अनेक स्कूल कमीशन के चक्कर में प्रत्येक वर्ष यूनिफॉर्म बदल रहे हैं। नियमानुसार कोई भी स्कूल अभिभावकों की सहमति के बिना यूनिफॉर्म चेंज नहीं कर सकता है। मगर ज्यादातर स्कूलों को इसकी परवाह नहीं है। क्योंकि उन्हें प्रत्येक वर्ष कमीशन चाहिए। इसलिए वह बार-बार यूनिफॉर्म चेंज कर रहे हैं। आईटीसी रोड निवासी अनिल नाम के एक अभिभावक ने फेसबुक के जरिए स्कूल की इस मनमानी को उजागर किया है।
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अभिभावकों के सामने हों कई विकल्प
सीबीएसई स्कूलों की संस्था प्रोग्रेसिव स्कूल फोरम के संयोजक सुरेंद्र चौहान का कहना है कि अभिभावकों पर दुकान विशेष से यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी खरीदने का दबाव बनाना ठीक नहीं है। जहां तक मुझे पता है ऐसा सभी स्कूल नहीं कर रहे हैं। मगर जो कुछ स्कूल ऐसा कर भी रहे हैं तो उन्हें अभिभावकों के सामने सामान खरीदने के विकल्प रखने चाहिए। जिससे अभिभावक अपनी मर्जी की जगह से सामान खरीद सकें।