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योगी सरकार के कदम से टेंशन में आए निजी स्कूल संचालक
Updated Sun, 10 Dec 2017 12:02 AM IST
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सहारनपुर। योगी सरकार निजी स्कूलों की मनमानी पर शिकंजा कसने की तैयारी में है, जिसके लिए वह कड़े प्रावधान लाने जा रही है। सरकार के कदम से जनपद के निजी स्कूल संचालक टेंशन में आ गए हैं। साथ ही अभिभावकों में खुशी की लहर है। बता दें कि जनपद में स्कूलों की मनमानी के खिलाफ अभिभावक कई बार आंदोलन कर चुके हैं, मगर प्रशासनिक स्तर से साथ न मिलने की वजह से स्कूल संचालक ही हावी रहे हैं।
जिले में सीबीएसई बोर्ड से जुड़े करीब 55 स्कूल हैं, जबकि दो स्कूल आईसीएसई बोर्ड के हैं, जो शहर में हैं। करीब दो दशक पहले शहर में गिने चुने ही निजी स्कूल थे, मगर उसके बाद स्कूलों की बाढ़ सी आ गई। हर कॉलोनी में निजी स्कूल खुल चुका है। ज्यादातर स्कूल संचालकों ने स्कूलों को शिक्षा का मंदिर कम और कमाई का अड्डा ज्यादा बनाया है। शासन और प्रशासन के आदेश तो दूर की बात यह स्कूल अपने बोर्ड के दिशा निर्देशों तक को मानने को तैयार नहीं हैं। सीबीएसई बोर्ड की गाइड लाइन के अनुसार कोई भी स्कूल अभिभावकों को संज्ञान में लिए बिना और वजह बताए बगैर फीस वृद्धि नहीं कर सकता है, मगर यहां स्कूल मनमानी करते आए हैं। स्कूलों की मनमानी को लेकर कई बार अभिभावक आंदोलन कर चुके हैं, मगर स्कूलों की हठधर्मिता के सामने उनके आंदोलन दम तोड़ गए। अब योगी सरकार स्कूल संचालकों की मनमानी पर अंकुश लगाने की तैयारी में है। जिसमें स्कूलों की मनमानी पर कार्रवाई और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना तक लगाने के प्रावधान किए जा रहे हैं। उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने शुक्रवार को यूपी वित्त पोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क का विनियमन) विधेयक 2017 का मसौदा जारी किया, जिसके बाद से स्कूल संचालकों की हवाइयां उड़ी हुई हैं।
पांच सौ से पांच हजार रुपये तक फीस
जनपद में चल रहे सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों की एक ही क्लास की फीस में काफी असमानता है। कोई स्कूल प्री-नर्सरी की मासिक फीस पांच सौ रुपये वसूल रहा है तो कोई स्कूल ढाई से तीन हजार रुपये तक ऐंठ रहा है। बेहट रोड स्थित एक स्कूल इसका उदाहरण है। बाकी क्लास में भी फीस का इसी तरह का अंतर है। आलम यह है कि अनेक स्कूल 12वीं तक की क्लास में मासिक फीस तीन से पांच हजार तक वसूल रहे हैं, जिसे लेकर अभिभावक खासे आहत हैं।
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प्रशासन को दबाव में रखते हैं स्कूल
निजी स्कूलों की मनमानी का आलम यह है कि वह प्रशासन को कुछ नहीं समझते हैं। प्रशासन अनेक बार बैठकें कर स्कूलों को दिशा निर्देश जारी कर चुका है, मगर स्कूलों की मनमानी पर इसका असर नहीं पड़ा है। उदाहरण कुछ दिन पहले तत्कालीन डीएम शफकत कमाल की अध्यक्षता में हुई स्कूल संचालकों की बैठक है। डीएम ने स्कूलों के प्रधानाचार्यों को जनहित में कुछ सुझाव दिए थे। साथ ही न मानने पर कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी। डीएम के समक्ष तो स्कूल संचालक दबी आवाज में हां में हां मिलाते गए, मगर बैठक के तुरंत बाद दिल्ली रोड स्थित एक स्कूल में अलग से बैठक कर प्रशासन की बात न मानने का फरमान जारी कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने प्रशासन के खिलाफ खूब बयानबाजी तक की। इसके बाद प्रशासन भी मौत होकर रह गया।
आरटीई को नहीं मानते स्कूल संचालक
प्रदेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2005 लागू है, मगर जनपद में इसका असर न के बराबर है। नियमानुसार निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों से भरी जानी चाहिए, जिनकी फीस का खर्च सरकार उठाएगी। मगर जनपद में कोई भी स्कूल इस कानून का पूरी तरह पालन नहीं कर रहा है। पिछले कुछ साल से प्रशासन और शिक्षा विभाग कागजी कार्रवाई करते आ रहे हैं, जिससे उनकी गर्दन बची रहे। होता यह है कि बेसिक शिक्षा विभाग निजी स्कूलों में दाखिले के लिए आवेदन मांगता है, जिसके बाद आवेदकों को निजी स्कूलों में दाखिला दिलवाता है। यदि कानून का पूरी तरह पालन किया जाए तो करीब 55 स्कूलों की कुल संख्या यानी करीब 15 से 20 हजार विद्यार्थियों में 25 फीसदी संख्या, जो करीब तीन से चार हजार बैठती है गरीब बच्चों की होनी चाहिए, मगर मुश्किल से 20 से 50 बच्चों को ही प्रशासन दाखिला दिला पाता है, जिनमें से ज्यादातर बच्चों की पढ़ाई स्कूलों की मनमानी की वजह से बीच में ही छूट जाती है।
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फीस बढ़ोत्तरी के लिए दिखावा
स्कूलों को संसाधनों और सुविधाओं के हिसाब से फीस तय करने का अधिकार है। ऐसे में ज्यादातर स्कूल संचालकों ने स्कूलों के शानदार भवन बनाने के साथ ही स्कूलों में बच्चों के मनोरंजन के लिए तमाम तरह के झूले, खिलौने और छोटी ट्रेन आदि तक की व्यवस्था की हुई है। इस सभी चीजों को दिखा कर वह अभिभावकों और बच्चों को आकर्षित करते हैं, जबकि पढ़ाई के स्तर को कोई देखना नहीं चाहता है।
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न योग्य शिक्षक और न ही शिक्षकों को पूरा वेतन
सीबीएसई और आईसीएसई स्कूलों में बोर्ड की गाइडलाइन के अनुसार योग्य शिक्षक रखे जाने चाहिए। यानी वह कम से कम बीएड तो हों ही। कुछ ही स्कूल इसे फॉलो कर रहे हैं, जबकि ज्यादातर स्कूल केवल बीए और एमए पास युवक युवतियों से काम चला रहे हैं, जिससे बच्चों के ज्ञान का स्तर निम्न है। प्रशासन या शिक्षा विभाग ने कभी भी शिक्षकों की योग्यता जानने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। इसके अलावा शिक्षकों को सरकारी स्कूलों की तरह वेतन और तमाम भत्ते दिए जाने का प्रावधान है, मगर यहां यह भी नियम लागू नहीं है। कुछ ही स्कूल शिक्षकों को कायदे से वेतन दे रहे हैं।
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यूनिफॉर्म, किताब और स्टेशनरी में कमीशन का खेल
निजी स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी में भी बड़ा कमीशन लेते हैं। कई स्कूल तो ऐसे हैं, जो खुद ही तमाम चीजें उपलब्ध कराते हैं। जबकि ज्यादातर स्कूलों का दुकानों से कमीशन बंधा हुआ है। ऐसे में वह उस खास दुकान से किताबें, यूनिफॉर्म या स्टेशनरी खरीदने के लिए कहते हैं। सूत्रों की मानें तो इन सब चीजों में 20 से 40 प्रतिशत तक का कमीशन स्कूलों का रहता है।
हर साल वसूलते हैं वार्षिक शुल्क
स्कूल वार्षिक शुल्क के नाम पर हर साल लाखों रुपये अंदर करते हैं। यदि कोई बच्चा प्री-नर्सरी से किसी स्कूल में पढ़ रहा है तो उससे 12वीं तक प्रत्येक साल फीस से अलग वार्षिक शुल्क वसूला जाता है। वार्षिक शुल्क कोई स्कूल तीन हजार रुपये तो कोई 50 से 70 हजार रुपये तक वसूल रहा है। इसके अलावा स्कूल में किसी उत्सव या त्योहार पर होने वाले सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर अलग से वसूली की जाती है।
इन चीजों के लिए वसूलते हैं शुल्क
ट्यूशन फीस यानी पढ़ाई का शुल्क।
जनरेटर शुल्क यानी जनरेटर की मरम्मत और तेल आदि का पैसा।
बिल्डिंग शुल्क, इसमें भवनों की मरम्मत और नए भवनों का निर्माण तक शामिल।
फ्रीज और हीटर शुल्क, जिसमें बच्चों को शुद्घ व ठंडा पेयजल उपलब्ध कराने का पैसा।
ट्रांसपोर्टेशन फीस, यानी बच्चे को स्कूल लाने व घर छोड़ने का शुल्क आदि।
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निजी स्कूल नियमों का पालन करते रहे हैं। फीस में वृद्धि संसाधनों और सुविधाओं के हिसाब से की जाती है। अनेक स्कूल ऐसे हैं जो गरीब और असहाय बच्चों की फीस में छूट करते हैं या फिर नि:शुल्क तक पढ़ाते हैं।
सुरेंद्र चौहान, संयोजक, प्रोग्रेसिव स्कूल सोसायटी।
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जिले में सीबीएसई बोर्ड से जुड़े करीब 55 स्कूल हैं, जबकि दो स्कूल आईसीएसई बोर्ड के हैं, जो शहर में हैं। करीब दो दशक पहले शहर में गिने चुने ही निजी स्कूल थे, मगर उसके बाद स्कूलों की बाढ़ सी आ गई। हर कॉलोनी में निजी स्कूल खुल चुका है। ज्यादातर स्कूल संचालकों ने स्कूलों को शिक्षा का मंदिर कम और कमाई का अड्डा ज्यादा बनाया है। शासन और प्रशासन के आदेश तो दूर की बात यह स्कूल अपने बोर्ड के दिशा निर्देशों तक को मानने को तैयार नहीं हैं। सीबीएसई बोर्ड की गाइड लाइन के अनुसार कोई भी स्कूल अभिभावकों को संज्ञान में लिए बिना और वजह बताए बगैर फीस वृद्धि नहीं कर सकता है, मगर यहां स्कूल मनमानी करते आए हैं। स्कूलों की मनमानी को लेकर कई बार अभिभावक आंदोलन कर चुके हैं, मगर स्कूलों की हठधर्मिता के सामने उनके आंदोलन दम तोड़ गए। अब योगी सरकार स्कूल संचालकों की मनमानी पर अंकुश लगाने की तैयारी में है। जिसमें स्कूलों की मनमानी पर कार्रवाई और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना तक लगाने के प्रावधान किए जा रहे हैं। उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने शुक्रवार को यूपी वित्त पोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क का विनियमन) विधेयक 2017 का मसौदा जारी किया, जिसके बाद से स्कूल संचालकों की हवाइयां उड़ी हुई हैं।
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पांच सौ से पांच हजार रुपये तक फीस
जनपद में चल रहे सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों की एक ही क्लास की फीस में काफी असमानता है। कोई स्कूल प्री-नर्सरी की मासिक फीस पांच सौ रुपये वसूल रहा है तो कोई स्कूल ढाई से तीन हजार रुपये तक ऐंठ रहा है। बेहट रोड स्थित एक स्कूल इसका उदाहरण है। बाकी क्लास में भी फीस का इसी तरह का अंतर है। आलम यह है कि अनेक स्कूल 12वीं तक की क्लास में मासिक फीस तीन से पांच हजार तक वसूल रहे हैं, जिसे लेकर अभिभावक खासे आहत हैं।
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प्रशासन को दबाव में रखते हैं स्कूल
निजी स्कूलों की मनमानी का आलम यह है कि वह प्रशासन को कुछ नहीं समझते हैं। प्रशासन अनेक बार बैठकें कर स्कूलों को दिशा निर्देश जारी कर चुका है, मगर स्कूलों की मनमानी पर इसका असर नहीं पड़ा है। उदाहरण कुछ दिन पहले तत्कालीन डीएम शफकत कमाल की अध्यक्षता में हुई स्कूल संचालकों की बैठक है। डीएम ने स्कूलों के प्रधानाचार्यों को जनहित में कुछ सुझाव दिए थे। साथ ही न मानने पर कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी। डीएम के समक्ष तो स्कूल संचालक दबी आवाज में हां में हां मिलाते गए, मगर बैठक के तुरंत बाद दिल्ली रोड स्थित एक स्कूल में अलग से बैठक कर प्रशासन की बात न मानने का फरमान जारी कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने प्रशासन के खिलाफ खूब बयानबाजी तक की। इसके बाद प्रशासन भी मौत होकर रह गया।
आरटीई को नहीं मानते स्कूल संचालक
प्रदेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2005 लागू है, मगर जनपद में इसका असर न के बराबर है। नियमानुसार निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों से भरी जानी चाहिए, जिनकी फीस का खर्च सरकार उठाएगी। मगर जनपद में कोई भी स्कूल इस कानून का पूरी तरह पालन नहीं कर रहा है। पिछले कुछ साल से प्रशासन और शिक्षा विभाग कागजी कार्रवाई करते आ रहे हैं, जिससे उनकी गर्दन बची रहे। होता यह है कि बेसिक शिक्षा विभाग निजी स्कूलों में दाखिले के लिए आवेदन मांगता है, जिसके बाद आवेदकों को निजी स्कूलों में दाखिला दिलवाता है। यदि कानून का पूरी तरह पालन किया जाए तो करीब 55 स्कूलों की कुल संख्या यानी करीब 15 से 20 हजार विद्यार्थियों में 25 फीसदी संख्या, जो करीब तीन से चार हजार बैठती है गरीब बच्चों की होनी चाहिए, मगर मुश्किल से 20 से 50 बच्चों को ही प्रशासन दाखिला दिला पाता है, जिनमें से ज्यादातर बच्चों की पढ़ाई स्कूलों की मनमानी की वजह से बीच में ही छूट जाती है।
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फीस बढ़ोत्तरी के लिए दिखावा
स्कूलों को संसाधनों और सुविधाओं के हिसाब से फीस तय करने का अधिकार है। ऐसे में ज्यादातर स्कूल संचालकों ने स्कूलों के शानदार भवन बनाने के साथ ही स्कूलों में बच्चों के मनोरंजन के लिए तमाम तरह के झूले, खिलौने और छोटी ट्रेन आदि तक की व्यवस्था की हुई है। इस सभी चीजों को दिखा कर वह अभिभावकों और बच्चों को आकर्षित करते हैं, जबकि पढ़ाई के स्तर को कोई देखना नहीं चाहता है।
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न योग्य शिक्षक और न ही शिक्षकों को पूरा वेतन
सीबीएसई और आईसीएसई स्कूलों में बोर्ड की गाइडलाइन के अनुसार योग्य शिक्षक रखे जाने चाहिए। यानी वह कम से कम बीएड तो हों ही। कुछ ही स्कूल इसे फॉलो कर रहे हैं, जबकि ज्यादातर स्कूल केवल बीए और एमए पास युवक युवतियों से काम चला रहे हैं, जिससे बच्चों के ज्ञान का स्तर निम्न है। प्रशासन या शिक्षा विभाग ने कभी भी शिक्षकों की योग्यता जानने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। इसके अलावा शिक्षकों को सरकारी स्कूलों की तरह वेतन और तमाम भत्ते दिए जाने का प्रावधान है, मगर यहां यह भी नियम लागू नहीं है। कुछ ही स्कूल शिक्षकों को कायदे से वेतन दे रहे हैं।
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यूनिफॉर्म, किताब और स्टेशनरी में कमीशन का खेल
निजी स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी में भी बड़ा कमीशन लेते हैं। कई स्कूल तो ऐसे हैं, जो खुद ही तमाम चीजें उपलब्ध कराते हैं। जबकि ज्यादातर स्कूलों का दुकानों से कमीशन बंधा हुआ है। ऐसे में वह उस खास दुकान से किताबें, यूनिफॉर्म या स्टेशनरी खरीदने के लिए कहते हैं। सूत्रों की मानें तो इन सब चीजों में 20 से 40 प्रतिशत तक का कमीशन स्कूलों का रहता है।
हर साल वसूलते हैं वार्षिक शुल्क
स्कूल वार्षिक शुल्क के नाम पर हर साल लाखों रुपये अंदर करते हैं। यदि कोई बच्चा प्री-नर्सरी से किसी स्कूल में पढ़ रहा है तो उससे 12वीं तक प्रत्येक साल फीस से अलग वार्षिक शुल्क वसूला जाता है। वार्षिक शुल्क कोई स्कूल तीन हजार रुपये तो कोई 50 से 70 हजार रुपये तक वसूल रहा है। इसके अलावा स्कूल में किसी उत्सव या त्योहार पर होने वाले सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर अलग से वसूली की जाती है।
इन चीजों के लिए वसूलते हैं शुल्क
ट्यूशन फीस यानी पढ़ाई का शुल्क।
जनरेटर शुल्क यानी जनरेटर की मरम्मत और तेल आदि का पैसा।
बिल्डिंग शुल्क, इसमें भवनों की मरम्मत और नए भवनों का निर्माण तक शामिल।
फ्रीज और हीटर शुल्क, जिसमें बच्चों को शुद्घ व ठंडा पेयजल उपलब्ध कराने का पैसा।
ट्रांसपोर्टेशन फीस, यानी बच्चे को स्कूल लाने व घर छोड़ने का शुल्क आदि।
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निजी स्कूल नियमों का पालन करते रहे हैं। फीस में वृद्धि संसाधनों और सुविधाओं के हिसाब से की जाती है। अनेक स्कूल ऐसे हैं जो गरीब और असहाय बच्चों की फीस में छूट करते हैं या फिर नि:शुल्क तक पढ़ाते हैं।
सुरेंद्र चौहान, संयोजक, प्रोग्रेसिव स्कूल सोसायटी।