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ध्यान और तप से मिलता है मोक्ष - जन मुनि अनुज सागर जी महाराज
Updated Fri, 27 Apr 2018 12:56 AM IST
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ध्यान और तप से मिलता है मोक्ष : महाराज
सरसावा। जैन मुनि अनुज सागर महाराज ने कहा कि मंदिर में बैठकर पूजा पाठ भक्ति करने से पुण्य में तो अपार वृद्धि हो सकती है जिससे संसार में नाम चमकता रहेगा। लेकिन इससे कर्म का बंध छूटने वाला नहीं है। यदि कर्मों के बंध से पीछा छुड़ाकर मोक्ष पाना चाहते हो तो दिगम्बर अवस्था धारण कर ध्यान मुद्रा में मग्न होना पड़ेगा।
बृहस्पतिवार को सराफा बाजार स्थित पंचायती जैन मंदिर में प्रवचन करते हुए जैन मुनि अनुज सागर जी महाराज ने कर्मों के बंध की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सभी तीर्थंकरों ने ध्यान किया महीनों, वर्षों तक घोर तप किया। तब जाकर केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई है। इसी को प्रदर्शित करते हुए। सभी पूजित जगहों पर तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हमेशा ध्यानावस्था में ही होती हैं यदि कहीं खुदाई में भी कोई प्रतिमा निकलती है तो वो भी ध्यान मुद्रा में ही होती है। मुनि श्री ने कहा कि कालांतर में स्वार्थ शब्द का अर्थ बदल गया है जबकि स्वार्थ का असली अर्थ है कि जिसमें स्व का अर्थ जान लिया हो। जिन धर्म के सिद्धांत आत्मा को शुद्ध करने आत्मा को पवित्र करने के लिये प्रतिपादित किए गये हैं, ना कि शरीर को। उन्होंने कहा कि मंदिरों में बैठकर पूजा करने से पुण्यार्जन तो किया जा सकता है लेकिन इससे मोक्ष की प्राप्ति होने वाली नहीं है। मुनि श्री ने कहा कि सभी तीर्थंकर राजा थे अपार वैभवशाली थे लेकिन सम्य्क दृष्टा बनने के लिये उन्होंने सब कुछ त्यागकर ध्यान धरा तथा तप किया तब जाकर तीर्थंकर कहलाये। प्रवचनों में जैन समुदाय के अतिरिक्त अन्य धर्मावलंबी भी शामिल रहे। इसके उपरांत मुनिश्री आहार चर्या के लिये गमन कर गये। शाम के समय जैन अतिथि भवन में भक्ति संध्या का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
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सरसावा। जैन मुनि अनुज सागर महाराज ने कहा कि मंदिर में बैठकर पूजा पाठ भक्ति करने से पुण्य में तो अपार वृद्धि हो सकती है जिससे संसार में नाम चमकता रहेगा। लेकिन इससे कर्म का बंध छूटने वाला नहीं है। यदि कर्मों के बंध से पीछा छुड़ाकर मोक्ष पाना चाहते हो तो दिगम्बर अवस्था धारण कर ध्यान मुद्रा में मग्न होना पड़ेगा।
बृहस्पतिवार को सराफा बाजार स्थित पंचायती जैन मंदिर में प्रवचन करते हुए जैन मुनि अनुज सागर जी महाराज ने कर्मों के बंध की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सभी तीर्थंकरों ने ध्यान किया महीनों, वर्षों तक घोर तप किया। तब जाकर केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई है। इसी को प्रदर्शित करते हुए। सभी पूजित जगहों पर तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हमेशा ध्यानावस्था में ही होती हैं यदि कहीं खुदाई में भी कोई प्रतिमा निकलती है तो वो भी ध्यान मुद्रा में ही होती है। मुनि श्री ने कहा कि कालांतर में स्वार्थ शब्द का अर्थ बदल गया है जबकि स्वार्थ का असली अर्थ है कि जिसमें स्व का अर्थ जान लिया हो। जिन धर्म के सिद्धांत आत्मा को शुद्ध करने आत्मा को पवित्र करने के लिये प्रतिपादित किए गये हैं, ना कि शरीर को। उन्होंने कहा कि मंदिरों में बैठकर पूजा करने से पुण्यार्जन तो किया जा सकता है लेकिन इससे मोक्ष की प्राप्ति होने वाली नहीं है। मुनि श्री ने कहा कि सभी तीर्थंकर राजा थे अपार वैभवशाली थे लेकिन सम्य्क दृष्टा बनने के लिये उन्होंने सब कुछ त्यागकर ध्यान धरा तथा तप किया तब जाकर तीर्थंकर कहलाये। प्रवचनों में जैन समुदाय के अतिरिक्त अन्य धर्मावलंबी भी शामिल रहे। इसके उपरांत मुनिश्री आहार चर्या के लिये गमन कर गये। शाम के समय जैन अतिथि भवन में भक्ति संध्या का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
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