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गन्ना फसल में कंसुआ कीट का प्रकोप
Updated Sat, 02 Jun 2018 12:25 AM IST
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गन्ना फसल में कंसुआ कीट का प्रकोप
सहारनपुर। गन्ना फसल में कंसुआ कीट के प्रकोप से उसकी पैदावार प्रभावित हो रही है। इससे प्रभावित पौधे की गोभ सूख जाती है। समय से उपचार नहीं किया गया तो इसका असर गन्ने की उत्पादकता पर पड़ना तय है।
गन्ने की फसल इस समय कंसुआ कीट की चपेट में है। प्रभावित फसल के पौधे की गोभ सूख जाती है और कभी कभी तो पूरा पौधा ही सूख जाता है। साथ ही जड भी काली होकर गल जाती है। जैैसे जैसे गन्ने की फसल बढ़ती है वैसे ही इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। उप निदेशक कृषि राजीव कुमार ने बताया कि कंसुआ कीट का प्रकोप नियंत्रित करने के लिए क्लोरो पाइरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी की डेढ़ लीटर मात्रा को 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना चाहिए। या कोर्बोफ्यूरान तीन प्रतिशत सीजी की 30 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करना मुफीद रहता है। या फोरेट 10 प्रतिशत सीजी की 30 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से बिखेर देनी चाहिए। जैविक उपचार के लिए 15 दिनों के अंतराल पर ट्राइकोग्रामा कार्ड का प्रयोग करना चाहिए। यह कार्ड प्रति हेक्टेयर 10 पर्याप्त रहते हैं। इसके अलावा प्रभावित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट कर देना भी फायदेमंद रहता है।
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सहारनपुर। गन्ना फसल में कंसुआ कीट के प्रकोप से उसकी पैदावार प्रभावित हो रही है। इससे प्रभावित पौधे की गोभ सूख जाती है। समय से उपचार नहीं किया गया तो इसका असर गन्ने की उत्पादकता पर पड़ना तय है।
गन्ने की फसल इस समय कंसुआ कीट की चपेट में है। प्रभावित फसल के पौधे की गोभ सूख जाती है और कभी कभी तो पूरा पौधा ही सूख जाता है। साथ ही जड भी काली होकर गल जाती है। जैैसे जैसे गन्ने की फसल बढ़ती है वैसे ही इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। उप निदेशक कृषि राजीव कुमार ने बताया कि कंसुआ कीट का प्रकोप नियंत्रित करने के लिए क्लोरो पाइरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी की डेढ़ लीटर मात्रा को 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना चाहिए। या कोर्बोफ्यूरान तीन प्रतिशत सीजी की 30 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करना मुफीद रहता है। या फोरेट 10 प्रतिशत सीजी की 30 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से बिखेर देनी चाहिए। जैविक उपचार के लिए 15 दिनों के अंतराल पर ट्राइकोग्रामा कार्ड का प्रयोग करना चाहिए। यह कार्ड प्रति हेक्टेयर 10 पर्याप्त रहते हैं। इसके अलावा प्रभावित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट कर देना भी फायदेमंद रहता है।
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