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कैराना उप चुनाव की घोषणा के साथ चढ़ा सियासी पारा-----
Updated Fri, 27 Apr 2018 01:28 AM IST
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कैैराना उप चुनाव की घोषणा के साथ चढ़ा सियासी पारा
सहारनपुर। कैराना उप चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ ही सहारनपुर और शामली जिले में सियासी पारा चढ़ गया है। इस सीट पर भाजपा को छोड़कर अभी किसी राजनीतिक दल की स्थिति साफ नहीं है। कांग्रेस के इमरान मसूद जिस तरह सपा की घेराबंदी कर रहे है, उससे विपक्ष की एकता में दरार साफ तौर से झलक रही है, मगर राजनीति में दोस्त कब दुश्मन और दुश्मन कब दोस्त बन जाए, कहना मुश्किल है। फिलहाल संसद भवन पहुंचने का सपना संजोए तमाम दलों के दावेदारों ने अपनी भागदौड़ तेज कर दी है।
कैराना लोकसभा में सहारनपुर की गंगोह और नकुड के अलावा शामली जिले की तीन विधानसभाएं कैराना, शामली और थानाभवन शामिल है। इस सीट पर हार जीत में जाट ,मुस्लिम, गुर्जर, सैनी, कश्यप मतदाताओं की अहम भूमिका रहती है। 2009 में हुए नए परिसीमन के बाद सहारनपुर की दो विधानसभाएं भी इसमें शामिल हो गई। पहली बार पूर्व सांसद स्व. मुनव्वर हसन की बेगम तब्बसुम इस सीट से संसद पहुंची थी। 2014 के चुनाव में यहां राजनीति के दिग्गज रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी। कार्यकाल पूरा होने से पहले सांसद हुकुम सिंह के निधन से यह सीट खाली हो गई। अब उनकी विरासत बेटी मृंगाका सिंह के हाथों में है। भाजपा ने मृंगाका पर ही अपना दांव लगाया है। पिछले दिनों सहारनपुर आए उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मृंगाका के नाम की घोषणा कर दी है। विपक्ष ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले है। गोरखपुर और फूलपुर विधानसभा में जीत के बाद विपक्ष की एकता की बात चल रही थी। सपा और बसपा तो एक दूसरे के सुुर में सुर मिला रही है, मगर इस सीट पर दावेदारी जताने वाले कांग्रेस के पूर्व विधायक इमरान मसूद जिस तरह एकता की अगुवाई करने वाली समाजवादी पार्टी पर हमला बोल रहे है, उससे जाहिर है कि विपक्ष में एकता बनती दिख नहीं रही है। पिछले कुछ दिनो से कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल में जिस तरह की नजदीकियां बढ़ी है, उससे नई खिचड़ी पकने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। फिलहाल चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ सियासी हलचल तेज हो गई है। कौन दल किस पाले में होगा, आने वाले दिनों में तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी।
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सहारनपुर। कैराना उप चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ ही सहारनपुर और शामली जिले में सियासी पारा चढ़ गया है। इस सीट पर भाजपा को छोड़कर अभी किसी राजनीतिक दल की स्थिति साफ नहीं है। कांग्रेस के इमरान मसूद जिस तरह सपा की घेराबंदी कर रहे है, उससे विपक्ष की एकता में दरार साफ तौर से झलक रही है, मगर राजनीति में दोस्त कब दुश्मन और दुश्मन कब दोस्त बन जाए, कहना मुश्किल है। फिलहाल संसद भवन पहुंचने का सपना संजोए तमाम दलों के दावेदारों ने अपनी भागदौड़ तेज कर दी है।
कैराना लोकसभा में सहारनपुर की गंगोह और नकुड के अलावा शामली जिले की तीन विधानसभाएं कैराना, शामली और थानाभवन शामिल है। इस सीट पर हार जीत में जाट ,मुस्लिम, गुर्जर, सैनी, कश्यप मतदाताओं की अहम भूमिका रहती है। 2009 में हुए नए परिसीमन के बाद सहारनपुर की दो विधानसभाएं भी इसमें शामिल हो गई। पहली बार पूर्व सांसद स्व. मुनव्वर हसन की बेगम तब्बसुम इस सीट से संसद पहुंची थी। 2014 के चुनाव में यहां राजनीति के दिग्गज रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी। कार्यकाल पूरा होने से पहले सांसद हुकुम सिंह के निधन से यह सीट खाली हो गई। अब उनकी विरासत बेटी मृंगाका सिंह के हाथों में है। भाजपा ने मृंगाका पर ही अपना दांव लगाया है। पिछले दिनों सहारनपुर आए उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मृंगाका के नाम की घोषणा कर दी है। विपक्ष ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले है। गोरखपुर और फूलपुर विधानसभा में जीत के बाद विपक्ष की एकता की बात चल रही थी। सपा और बसपा तो एक दूसरे के सुुर में सुर मिला रही है, मगर इस सीट पर दावेदारी जताने वाले कांग्रेस के पूर्व विधायक इमरान मसूद जिस तरह एकता की अगुवाई करने वाली समाजवादी पार्टी पर हमला बोल रहे है, उससे जाहिर है कि विपक्ष में एकता बनती दिख नहीं रही है। पिछले कुछ दिनो से कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल में जिस तरह की नजदीकियां बढ़ी है, उससे नई खिचड़ी पकने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। फिलहाल चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ सियासी हलचल तेज हो गई है। कौन दल किस पाले में होगा, आने वाले दिनों में तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी।
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