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शाहबाद में विजयदशमी को नहीं बल्कि एकादशी को मनाया जाता है दशहरा
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शाहबाद। देशभर में दशहरे का पर्व खास विजयदशमी वाले दिन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन, शाहबाद में एक अनोखी परंपरा है। विजयदशमी का पर्व एकादशी यानी दशहरे के अगले दिन मनाया जाता है। आजादी के बाद से शुरू हुई प्रथा आज तक चली आ रही है। पूर्व में राम बरात भी हाथी और घोड़ों पर निकाली जाती थी।
देशभर और क्षेत्रभर में विजयदशमी का पर्व दशहरे के दिन रावण का दहन कर मनाया जाता है। लेकिन, शाहबाद में अनोखी परंपरा है। जिसमें दशहरे के बाद दूसरे दिन को विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है। लेकिन, इस बार दशहरे के दो दिन बाद रावण दहन का कार्यक्रम किया जाएगा। देश की आजादी से पूर्व में रामलीला का मंचन देखने के लिए नगर व क्षेत्र के लोग शाहबाद से 30 किलोमीटर दूर राजा के सहसपुर में मंचन देखने जाया करते थे। आजादी के बाद शाहबाद की रामलीला मंचन की प्रथा को आरंभ करने वाले राम प्रकाश शर्मा उर्फ वेध जी द्वारा डीएम चूड़ामणि मिश्र से 15 दिन की अनुमति ली गई थी।
शाहबाद में सर्वप्रथम रामलीला कमेटी के संस्थापक रामप्रकाश शर्मा उर्फ वैध जी के पौत्र मनोज भारद्वाज ने बताया कि आजादी से पूर्व आस-पास के लोग रामलीला देखने जनपद मुरादाबाद के थाना बिलारी के राजा का सहसपुर तीस किलोमीटर दूर जाया करते थे। सन 1948 में रामप्रकाश शर्मा ने रामलीला का आयोजन अर्थक प्रयासों के बाद शाहबाद में ही कराया था। रामलीला के मंचन के लिए रामप्रकाश रामलीला की अनुमति के लिए रामपुर डीएम चूड़ामणि मिश्र के पास पहुंच गए। उस दौरान डीएम ने मात्र 15 दिन की अनुमति दे दी थी। लेकिन, अनुमति खास विजयदशमी से एक दिन पूर्व दुर्गानवमी के दिन मिली थी। जिसके कारण आनन-फानन में नगर निवासी बसंत लाल श्रीवास्तव एवं ब्रजवासी लाल रावत ने कई लोगों की सहायता से रावण के पुतले का निर्माण किया था।
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जानकारी के मुताबिक नगर के प्राचीन अस्तल मंदिर से शंख और घड़ियाल बजाकर नगर के बच्चे और लोगों को भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता स्वरूपी बनाकर उनकी बरात हाथी-घोड़ों पर निकाली गई थी। उस दौरान हाथी और घोड़े का इंतजाम करने में काफी परेशानी आई थी। इस दौरान उसके बाद रावण के पुतले का दहन किया गया था। तभी से आज तक शाहबाद की एकादशी वाले दिन दशहरा मनाने की अनोखी परंपरा चली आ रही है। शाहबाद में रावण के पुतले का दहन विजयदशमी के अगले दिन एकादशी को किया जाता है। लेकिन इस बार द्वादशी को रावण दहन किया जाएगा।
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देशभर और क्षेत्रभर में विजयदशमी का पर्व दशहरे के दिन रावण का दहन कर मनाया जाता है। लेकिन, शाहबाद में अनोखी परंपरा है। जिसमें दशहरे के बाद दूसरे दिन को विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है। लेकिन, इस बार दशहरे के दो दिन बाद रावण दहन का कार्यक्रम किया जाएगा। देश की आजादी से पूर्व में रामलीला का मंचन देखने के लिए नगर व क्षेत्र के लोग शाहबाद से 30 किलोमीटर दूर राजा के सहसपुर में मंचन देखने जाया करते थे। आजादी के बाद शाहबाद की रामलीला मंचन की प्रथा को आरंभ करने वाले राम प्रकाश शर्मा उर्फ वेध जी द्वारा डीएम चूड़ामणि मिश्र से 15 दिन की अनुमति ली गई थी।
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शाहबाद में सर्वप्रथम रामलीला कमेटी के संस्थापक रामप्रकाश शर्मा उर्फ वैध जी के पौत्र मनोज भारद्वाज ने बताया कि आजादी से पूर्व आस-पास के लोग रामलीला देखने जनपद मुरादाबाद के थाना बिलारी के राजा का सहसपुर तीस किलोमीटर दूर जाया करते थे। सन 1948 में रामप्रकाश शर्मा ने रामलीला का आयोजन अर्थक प्रयासों के बाद शाहबाद में ही कराया था। रामलीला के मंचन के लिए रामप्रकाश रामलीला की अनुमति के लिए रामपुर डीएम चूड़ामणि मिश्र के पास पहुंच गए। उस दौरान डीएम ने मात्र 15 दिन की अनुमति दे दी थी। लेकिन, अनुमति खास विजयदशमी से एक दिन पूर्व दुर्गानवमी के दिन मिली थी। जिसके कारण आनन-फानन में नगर निवासी बसंत लाल श्रीवास्तव एवं ब्रजवासी लाल रावत ने कई लोगों की सहायता से रावण के पुतले का निर्माण किया था।
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जानकारी के मुताबिक नगर के प्राचीन अस्तल मंदिर से शंख और घड़ियाल बजाकर नगर के बच्चे और लोगों को भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता स्वरूपी बनाकर उनकी बरात हाथी-घोड़ों पर निकाली गई थी। उस दौरान हाथी और घोड़े का इंतजाम करने में काफी परेशानी आई थी। इस दौरान उसके बाद रावण के पुतले का दहन किया गया था। तभी से आज तक शाहबाद की एकादशी वाले दिन दशहरा मनाने की अनोखी परंपरा चली आ रही है। शाहबाद में रावण के पुतले का दहन विजयदशमी के अगले दिन एकादशी को किया जाता है। लेकिन इस बार द्वादशी को रावण दहन किया जाएगा।