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रामपुर और संभल ने ही जताया महिलाओं पर विश्वास
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लोकसभा के चुनाव में रामपुर और संभल ही ऐसे लोकसभा क्षेत्र हैं जहां से महिला सांसद चुनी गईं। मुरादाबाद और अमरोहा संसदीय सीट से अब तक हुए लोकसभा के चुनाव में कोई महिला संसद तक नहीं पहुंच पाई है।इसमें भी संभल से 1984 के बाद कोई महिला सांसद नहीं बन सकी है। वह भी तब जब सरकारों की ओर से महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर काफी जोर दिया जाता रहा है।
देश में पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ था। तब रामपुर से पहले सांसद अबुल कलाम आजाद बने, जो उस समय देश के पहले शिक्षामंत्री भी बने। मुरादाबाद से राम सरन और अमरोहा से मौलाना मोहम्मद हिफ्जुर्रहमान सांसद चुने गए थे। संभल तब लोकसभा सीट नहीं थी। 1977 में संभल को अलग संसदीय क्षेत्र बनाया गया, जिसमें भारतीय लोकदल के टिकट पर शांतिदेवी ने जीत दर्ज की और संसद तक पहुंची। वह मंडल की पहली महिला सांसद थीं। 1980 में संभल से विजेन्द्र पाल कांग्रेस के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे। अगला चुनाव 1984 में हुआ और कांग्रेस के टिकट पर फिर से शांतिदेवी ने जीत दर्ज की। उस वक्त भी वह मंडल से एकमात्र महिला सांसद थीं, जिन्होंने दूसरी बाद लोकसभा में संभल का प्रतिनिधित्व किया था।
इसके बाद से महिलाओं के लिए मंडल में सूखा जैसा पड़ गया, लेकिन 1996 में मंडल से महिला के तौर पर नवाब परिवार से बेगम नूरबानो ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की और लोकसभा तक पहुंची, लेकिन 1998 में वह भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी से चुनाव हार गईं। इसके अगले चुनाव में वर्ष 1999 में एक बार फिर वह जीतीं। तब भी वह मंडल से एकमात्र महिला थीं, जो संसद तक पहुंची। लेकिन, इसके बाद 2004 के चुनाव में फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा ने समाजवादी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ा और बेगम नूरबानों को हरा दिया। 2009 के चुनाव में भी जयाप्रदा ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर ही जीत दर्ज की, लेकिन 2014 के चुनाव में फिर से मंडल की सभी संसदीय सीटों पर पुरुषों का कब्जा हो गया। इस तरह आजादी के बाद सिर्फ रामपुर और संभल के मतदाताओं ने ही महिलाओं पर विश्वास जताया, जबकि अमरोहा और मुरादाबाद से कोई भी महिला अब तक संसद तक नहीं पहुंच सकी है।
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देश में पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ था। तब रामपुर से पहले सांसद अबुल कलाम आजाद बने, जो उस समय देश के पहले शिक्षामंत्री भी बने। मुरादाबाद से राम सरन और अमरोहा से मौलाना मोहम्मद हिफ्जुर्रहमान सांसद चुने गए थे। संभल तब लोकसभा सीट नहीं थी। 1977 में संभल को अलग संसदीय क्षेत्र बनाया गया, जिसमें भारतीय लोकदल के टिकट पर शांतिदेवी ने जीत दर्ज की और संसद तक पहुंची। वह मंडल की पहली महिला सांसद थीं। 1980 में संभल से विजेन्द्र पाल कांग्रेस के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे। अगला चुनाव 1984 में हुआ और कांग्रेस के टिकट पर फिर से शांतिदेवी ने जीत दर्ज की। उस वक्त भी वह मंडल से एकमात्र महिला सांसद थीं, जिन्होंने दूसरी बाद लोकसभा में संभल का प्रतिनिधित्व किया था।
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इसके बाद से महिलाओं के लिए मंडल में सूखा जैसा पड़ गया, लेकिन 1996 में मंडल से महिला के तौर पर नवाब परिवार से बेगम नूरबानो ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की और लोकसभा तक पहुंची, लेकिन 1998 में वह भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी से चुनाव हार गईं। इसके अगले चुनाव में वर्ष 1999 में एक बार फिर वह जीतीं। तब भी वह मंडल से एकमात्र महिला थीं, जो संसद तक पहुंची। लेकिन, इसके बाद 2004 के चुनाव में फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा ने समाजवादी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ा और बेगम नूरबानों को हरा दिया। 2009 के चुनाव में भी जयाप्रदा ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर ही जीत दर्ज की, लेकिन 2014 के चुनाव में फिर से मंडल की सभी संसदीय सीटों पर पुरुषों का कब्जा हो गया। इस तरह आजादी के बाद सिर्फ रामपुर और संभल के मतदाताओं ने ही महिलाओं पर विश्वास जताया, जबकि अमरोहा और मुरादाबाद से कोई भी महिला अब तक संसद तक नहीं पहुंच सकी है।
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