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हमसे ज्यादा गंदे बस 40 ही शहर
रायबरेली/ अमर उजाला ब्यूराे
Updated Thu, 04 May 2017 11:44 PM IST
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कूड़े के ढेरों के पास फैली गंदगी
- फोटो : अमर उजाला
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शहर की स्वच्छता को लेकर अफसरों के सारे दावे बृहस्पतिवार को खोखले साबित हो गए। हम बेहद गंदे शहर में रहते हैं। केंद्र सरकार की स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार देश भर के 434 शहरों में हमसे ज्यादा बस 40 ही शहर अधिक गंदे हैं। रिपोर्ट में रायबरेली शहर 394 पायदान पर है।
सिर्फ कागजों में घोड़े दौड़ाने वाले जिले के आला अधिकारियों के लिए ये रिपोर्ट बेहद शर्मनाक है। क्योंकि साफ-सफाई के नाम पर शहर को 2000 में से मात्र 561 अंक ही मिले हैं। शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रतिदिन एक लाख रुपये खर्च करने का दावा किया जाता हैं।
यानी प्रतिमाह 30 लाख और प्रति वर्ष तीन करोड़ 60 लाख रुपये सिर्फ साफ-सफाई के नाम पर खर्च किए जाते हैं। इसके अलावा इस कार्य के लिए तैनात अधिकारियों व कर्मचारियों का वेतन अलग। इसके बाद भी शहर की सूरत नहीं बदल सकी। इतना बड़ा बजट कहां खर्च हो गया, इसे जिम्मेदार नहीं बता पा रहे हैं।
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साफ-सफाई के नाम पर प्रति माह करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी न तो मोहल्लों की गंदगी साफ हो सकी, न ही सीवर से छुटकारा मिला। शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला हो, जहां गंदगी का अंबार न लगा हो। जनता चिल्लाती रहती है और पालिका अफसर ध्यान नहीं देते हैं।
शहरी विकास मंत्रालय की ओर से गुरुवार को स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 की सूची जारी की, तो अफसरों के साफ सफाई के सारे दावे खोखले साबित हो गए। देश के 434 शहरों में स्वच्छता को लेकर हुए सर्वेक्षण में वीवीआईपी शहर में शामिल रायबरेली 394वें रैंक पर रहा।
यहीं नहीं अंकों के लिहाज से स्वच्छ शहर में नंबर एक रैंक पर रहे इंदौर को 1808 अंक मिले, तो सफाई में रायबरेली आधे अंक भी नहीं पा सका। रायबरेली को कुल 561 अंक ही मिल सके। नगर पालिका परिषद में चल रहे स्वच्छ भारत मिशन के सारे दावे धरे के धरे रह गए।
नगर क्षेत्र कितना गंदा है, इसका अंदाजा स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 की सर्वे रिपोर्ट में सामने आ गया है। सफाई के प्रति जिम्मेदार पद नगर स्वास्थ्य अधिकारी का होने के बावजूद नगर पालिका में किसी स्थायी अधिकारी की तैनाती नहीं है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर में सफाई किस तरह होती होगी।
शहर में इस पद पर डॉ. एपी सिंह को तैनात किया गया है, लेकिन वे केवल बुधवार को बैठते हैं। इसकी वजह यह है कि उनकी तैनाती स्वास्थ्य विभाग में सीएचसी बेलाभेला में डॉक्टर के पद पर है। यदि नगर पालिका में नगर स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर किसी की स्थायी नियुक्ति हो जाए, तो सफाई व्यवस्था में सुधार हो सकता है।
नगर क्षेत्र में अधिशासी अधिकारी से लेकर सफाई निरीक्षक, सफाई कर्मचारियों के वेतन और संसाधनों में तकरीबन 10 करोड़ रुपये महीने में खर्च हो रहा है। इसके बावजूद शहर के मोहल्लों और गलियों की हालत बदहाल है।
शहर की सफाई व्यवस्था की हकीकत स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 की सूची से उजागर हो चुकी है। जाहिर है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सफाई के प्रति न तो अधिकारी और न ही कर्मचारी गंभीर हैं। इसका खामियाजा सीधे तौर पर नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
नगर पालिका परिषद के चेयरमैन मो. इलियास शहर की साफ-सफाई के समय-समय पर तमाम दावे करते रहे। लेकिन वो धरातल पर कम ही उतर पाए। यही वजह रही है कि शहर साफ-सफाई वाले टॉप 100 शहरों में भी स्थान नहीं बना सका।
रिपोर्ट आने के बाद चेयरमैन ने दावा किया कि सीवर प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई है। इसके पूरा होने से सीवर की व्यवस्था में सुधार होगा। पिछले कुछ महीने से कूड़ा निस्तारण प्लांट बंद होने से परेशानी हुई है। अब सुचारु रूप से प्लांट शुरू हो गया है। सफाई को लेकर जो भी कमियां रह गई हैं, दूर कराया जाएगा।
नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी एसके गौतम भी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। उनके साफ-सफाई के कागजी दावों की कलई बृहस्पतिवार को सर्वेक्षण नतीजे सामने आने पर खुल गई। साफ-सफाई के लिए शहरवासी आवाज उठाते रहे और ईओ उन्हें कोरे आश्वासन देतेे रहे।
एक बार फिर उन्होंने दावा करते हुए कहा कि सफाई व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त कराया जा रहा है। हर दिन सफाई कराई जाती है। वर्तमान में जो भी कमियां हो रही हैं, उसे दूर करा दिया जाएगा। सभी मोहल्लों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन कराया जाने की तैयारी की जा रही है।
सप्ताह में एक दिन नगर पालिका में बैठने वाले नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एपी सिंह ने भी कभी शहर की साफ-सफाई पर ध्यान नहीं दिया। लोगों का तो यहां तक कहना है कि वो इसके प्रति गंभीर ही नहीं रहे। जिसके चलते शहर का बुरा हाल है।
हालांकि बृहस्पतिवार को इस बारे में डॉ. सिंह का कहना था कि सभी वार्डों के लिए अलग-अलग तिथि निर्धारित की गई हैं। प्रतिदिन सफाई निरीक्षक से रिपोर्ट ली जा रही है। सफाई कराने के बाद सभासदों से सहमति पत्र लिया जाता है। समय-समय पर नाला सफाई, क्लोरीन छिड़काव आदि कार्य कराए जाते हैं।
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सिर्फ कागजों में घोड़े दौड़ाने वाले जिले के आला अधिकारियों के लिए ये रिपोर्ट बेहद शर्मनाक है। क्योंकि साफ-सफाई के नाम पर शहर को 2000 में से मात्र 561 अंक ही मिले हैं। शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रतिदिन एक लाख रुपये खर्च करने का दावा किया जाता हैं।
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यानी प्रतिमाह 30 लाख और प्रति वर्ष तीन करोड़ 60 लाख रुपये सिर्फ साफ-सफाई के नाम पर खर्च किए जाते हैं। इसके अलावा इस कार्य के लिए तैनात अधिकारियों व कर्मचारियों का वेतन अलग। इसके बाद भी शहर की सूरत नहीं बदल सकी। इतना बड़ा बजट कहां खर्च हो गया, इसे जिम्मेदार नहीं बता पा रहे हैं।
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साफ-सफाई के नाम पर प्रति माह करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी न तो मोहल्लों की गंदगी साफ हो सकी, न ही सीवर से छुटकारा मिला। शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला हो, जहां गंदगी का अंबार न लगा हो। जनता चिल्लाती रहती है और पालिका अफसर ध्यान नहीं देते हैं।
शहरी विकास मंत्रालय की ओर से गुरुवार को स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 की सूची जारी की, तो अफसरों के साफ सफाई के सारे दावे खोखले साबित हो गए। देश के 434 शहरों में स्वच्छता को लेकर हुए सर्वेक्षण में वीवीआईपी शहर में शामिल रायबरेली 394वें रैंक पर रहा।
यहीं नहीं अंकों के लिहाज से स्वच्छ शहर में नंबर एक रैंक पर रहे इंदौर को 1808 अंक मिले, तो सफाई में रायबरेली आधे अंक भी नहीं पा सका। रायबरेली को कुल 561 अंक ही मिल सके। नगर पालिका परिषद में चल रहे स्वच्छ भारत मिशन के सारे दावे धरे के धरे रह गए।
नगर क्षेत्र कितना गंदा है, इसका अंदाजा स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 की सर्वे रिपोर्ट में सामने आ गया है। सफाई के प्रति जिम्मेदार पद नगर स्वास्थ्य अधिकारी का होने के बावजूद नगर पालिका में किसी स्थायी अधिकारी की तैनाती नहीं है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर में सफाई किस तरह होती होगी।
शहर में इस पद पर डॉ. एपी सिंह को तैनात किया गया है, लेकिन वे केवल बुधवार को बैठते हैं। इसकी वजह यह है कि उनकी तैनाती स्वास्थ्य विभाग में सीएचसी बेलाभेला में डॉक्टर के पद पर है। यदि नगर पालिका में नगर स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर किसी की स्थायी नियुक्ति हो जाए, तो सफाई व्यवस्था में सुधार हो सकता है।
नगर क्षेत्र में अधिशासी अधिकारी से लेकर सफाई निरीक्षक, सफाई कर्मचारियों के वेतन और संसाधनों में तकरीबन 10 करोड़ रुपये महीने में खर्च हो रहा है। इसके बावजूद शहर के मोहल्लों और गलियों की हालत बदहाल है।
शहर की सफाई व्यवस्था की हकीकत स्वच्छ सर्वेक्षण 2017 की सूची से उजागर हो चुकी है। जाहिर है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सफाई के प्रति न तो अधिकारी और न ही कर्मचारी गंभीर हैं। इसका खामियाजा सीधे तौर पर नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
नगर पालिका परिषद के चेयरमैन मो. इलियास शहर की साफ-सफाई के समय-समय पर तमाम दावे करते रहे। लेकिन वो धरातल पर कम ही उतर पाए। यही वजह रही है कि शहर साफ-सफाई वाले टॉप 100 शहरों में भी स्थान नहीं बना सका।
रिपोर्ट आने के बाद चेयरमैन ने दावा किया कि सीवर प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई है। इसके पूरा होने से सीवर की व्यवस्था में सुधार होगा। पिछले कुछ महीने से कूड़ा निस्तारण प्लांट बंद होने से परेशानी हुई है। अब सुचारु रूप से प्लांट शुरू हो गया है। सफाई को लेकर जो भी कमियां रह गई हैं, दूर कराया जाएगा।
नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी एसके गौतम भी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। उनके साफ-सफाई के कागजी दावों की कलई बृहस्पतिवार को सर्वेक्षण नतीजे सामने आने पर खुल गई। साफ-सफाई के लिए शहरवासी आवाज उठाते रहे और ईओ उन्हें कोरे आश्वासन देतेे रहे।
एक बार फिर उन्होंने दावा करते हुए कहा कि सफाई व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त कराया जा रहा है। हर दिन सफाई कराई जाती है। वर्तमान में जो भी कमियां हो रही हैं, उसे दूर करा दिया जाएगा। सभी मोहल्लों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन कराया जाने की तैयारी की जा रही है।
सप्ताह में एक दिन नगर पालिका में बैठने वाले नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एपी सिंह ने भी कभी शहर की साफ-सफाई पर ध्यान नहीं दिया। लोगों का तो यहां तक कहना है कि वो इसके प्रति गंभीर ही नहीं रहे। जिसके चलते शहर का बुरा हाल है।
हालांकि बृहस्पतिवार को इस बारे में डॉ. सिंह का कहना था कि सभी वार्डों के लिए अलग-अलग तिथि निर्धारित की गई हैं। प्रतिदिन सफाई निरीक्षक से रिपोर्ट ली जा रही है। सफाई कराने के बाद सभासदों से सहमति पत्र लिया जाता है। समय-समय पर नाला सफाई, क्लोरीन छिड़काव आदि कार्य कराए जाते हैं।