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इतिहास के पन्नों की पहचान बन गईं धरोहरें
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रायबरेली में शहर से होकर गुजरी सई नदी के तट स्थित शहीद स्मारक, जो उपेक्षा का शिकार है।
- फोटो : RAIBARAILY
रायबरेली। विश्व धरोहर दिवस तो हम हर साल मनाते हैं, लेकिन उसका मकसद अभी अधूरा है। अपनों की बेरुखी से जिले की शान मिट रही है। जिसके नाम से जिला जाना जाता है, उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। चाहे फिर सरकार हो या फिर जिला प्रशासन के अधिकारी और जनप्रतिनिधि। सब कुछ जानकर अंजान बने हैं। कभी धन आता है, लेकिन इन धरोहरों की मरम्मत के बजाय उसका घालमेल किया जाता है। सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र में कई ऐसी धरोहरें हैं, जो जिले की पहचान हैं। इसमें शहीद स्मारक, रेवतीराम तालाब, डलमऊ नगरी में जनाना घाट और पक्का घाट, इंदिरा गांधी उद्यान। उपेक्षा की वजह से यह धरोहरों की हालत खस्ताहाल है। शहीद स्मारक में गंदगी फैली है। मरम्मत के अभाव में शहीद स्मारक जर्जर हो रहा है। (संवाद)
सीन-एक
कूड़े के ढेर से पट गया बड़ा कुआं
बदलती चकाचौंध में इतिहास के पन्नों में दर्ज बड़ा कुआं अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। अंग्रेजों की ओर से बनवाए गए इस कुएं के जीर्णोद्धार के लिए कोई आगे नहीं आया। हालात ये हैं कि शहर के गुलाब रोड पर किला बाजार स्थित कूड़े-करकट में यह कुआं तब्दील हो गया है। मान्यता है कि शहर के तेलियाकोट मोहल्ले में अंग्रेजों के जमाने में इस कुएं को बनवाया गया। इस कुएं से अंग्रेज अपनी प्यास बुझाते थे। एक बार कुुएं में पानी समुद्र से आने लगा था। ऐसे में शहर में भी बाढ़ आने का खतरा उत्पन्न हो गया। इस पर लोहे का तावा कुएं में रखवा दिया गया था। समाजसेवी जगदीश शुक्ला कहते हैं कि बड़ा कुआं जिले की धरोहर है। इसलिए जिला प्रशासन को चाहिए कि बड़ा कुएं के सौंदर्यीकरण के लिए प्रयास करें, ताकि इसकी पहचान फिर लौट सके।
सीन-दो
बस नाम का रह गया रेवतीराम तालाब
शहर के किनारे अहियारायपुर में करीब 60 साल पहले एक तालाब बनाया गया था, जिसे इतिहास के पन्नों में रेवतीराम तालाब के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यह तालाब लखनऊ के नवाब शुजाउदौला ने बनवाया था। यहां राज परिवार की महिलाएं घूमने आती थीं। उनके रहने-नहाने के लिए महिला स्नान घर बना है। तालाब में छह गहरे कुएं हैं। इस कारण कभी इस तालाब का पानी नहीं सूखता है, लेकिन वर्तमान समय में तालाब का पानी प्रयोग में नहीं आ रहा है। पर्यटन विभाग की तरफ से रेवतीराम तालाब के सौंदर्यीकरण का कार्य कराया गया, लेकिन अब यह तालाब फिर से जीर्ण-शीर्ण हालत की तरफ बढ़ रहा है। इसकी पहचान वापस दिलाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।
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सीन-3
जीर्ण शीर्ण हालत में शहीद स्मारक
अंग्रेजों के जुल्म और सितम के काले अध्याय के खिलाफ भारतीय किसानों के बलिदान की अमिट गाथा, जिसे मुंशीगंज गोलीकांड का नाम दिया गया। सात जनवरी 1921 को निहत्थे किसानों पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसाई थीं। सई नदी खून से लाल हो गई थी। किसानों की याद में सई नदी के तट पर शहीद स्मारक तो बनवाया गया, लेकिन इसके सौंदर्यीकरण पर ध्यान नहीं दिया गया। सात जनवरी को किसानों को याद करके मामले की इतिश्री कर ली जाती है। यहां पर गंदगी फैली रहती है। यहां लगाई गई वाटिका में पौधे सूख गए हैं। घोड़ा, हिरन, पक्षी व अन्य जानवरों की बनाई गई मूर्तियां टूटकर बदसूरत हो गई हैं। पेयजल के लिए बना टैंक व टोटियां खराब हो गई हैं। मुुख्य शहीद स्तंभ के किनारे बनी रेलिंग व दीवारें टूट रही हैं। यहां लगे सजावटी पौधे सूख गए हैं। आरडीए की तरफ से शहीद स्मारक के सौंदर्यीकरण को लेकर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
सीन-4
नहीं बदल सकी तस्वीर, खंडहर में तब्दील जनाना घाट
डलमऊ। डलमऊ से होकर पतित पावनी गंगा नदी गुजरी हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र का पौैराणिक और ऐतिहासिक महत्व क्या होगा। डलमऊ के शुक्ल घाट पर 500 वर्ष पहले जनाना घाट बनवाया गया था। यहां पर महिलाएं स्नान करती थीं। होते करते जनाना घाट अब खंडहर में तब्दील हो गया है। नमामि गंगे योजना में भी इसे शामिल नहीं किया गया। नतीजतन जनाना घाट की तस्वीर आज तक नहीं बदल पाई। यहीं पर राजा डलदेव का किला है। इसका भी सौंदर्यीकरण कराने की सुधि किसी को नहीं आई। यह हाल तब है, जब पर्यटन विभाग और नगर पंचायत डलमऊ के पास सौंदर्यीकरण कराने के नाम का बजट आता है।
किसी ने नहीं ली सुध
डलमऊ। बड़ामठ के स्वामी दिव्यानंद, तीर्थ पुरोहित सभा के पूर्व अध्यक्ष श्याम प्रकाश कहते हैं कि डलमऊ का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। यहां पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं। नमामि गंगे योजना के तहत कई घाटों का सौंदर्यीकरण कराया गया, लेकिन जनाना घाट और राजा डलदेव का किला उपेक्षा का शिकार है। इन धरोहरों को सजाने और संवारने के लिए न तो जिला प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों की तरफ से कभी ध्यान नहीं दिया गया। यहां के स्थलों का सौंदर्यीकरण करा दिया जाए तो यह पर्यटन के लिहाज से अच्छा होगा, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। बुजुर्ग त्रियुगी नारायण भी कहते हैं कि पर्यटन स्थल को बढ़ावा देने के नाम पर महज खानापूरी ही की गई।
जिले की धरोहरों को चिह्नित कराकर उन्हें उनकी पहचान दिलाने का काम कराया जाएगा। जल्द रूपरेखा तैयार करके सौंदर्यीकरण कराने की पहल की जाएगी।-प्रभाष कुमार, सीडीओ
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सीन-एक
कूड़े के ढेर से पट गया बड़ा कुआं
बदलती चकाचौंध में इतिहास के पन्नों में दर्ज बड़ा कुआं अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। अंग्रेजों की ओर से बनवाए गए इस कुएं के जीर्णोद्धार के लिए कोई आगे नहीं आया। हालात ये हैं कि शहर के गुलाब रोड पर किला बाजार स्थित कूड़े-करकट में यह कुआं तब्दील हो गया है। मान्यता है कि शहर के तेलियाकोट मोहल्ले में अंग्रेजों के जमाने में इस कुएं को बनवाया गया। इस कुएं से अंग्रेज अपनी प्यास बुझाते थे। एक बार कुुएं में पानी समुद्र से आने लगा था। ऐसे में शहर में भी बाढ़ आने का खतरा उत्पन्न हो गया। इस पर लोहे का तावा कुएं में रखवा दिया गया था। समाजसेवी जगदीश शुक्ला कहते हैं कि बड़ा कुआं जिले की धरोहर है। इसलिए जिला प्रशासन को चाहिए कि बड़ा कुएं के सौंदर्यीकरण के लिए प्रयास करें, ताकि इसकी पहचान फिर लौट सके।
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सीन-दो
बस नाम का रह गया रेवतीराम तालाब
शहर के किनारे अहियारायपुर में करीब 60 साल पहले एक तालाब बनाया गया था, जिसे इतिहास के पन्नों में रेवतीराम तालाब के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यह तालाब लखनऊ के नवाब शुजाउदौला ने बनवाया था। यहां राज परिवार की महिलाएं घूमने आती थीं। उनके रहने-नहाने के लिए महिला स्नान घर बना है। तालाब में छह गहरे कुएं हैं। इस कारण कभी इस तालाब का पानी नहीं सूखता है, लेकिन वर्तमान समय में तालाब का पानी प्रयोग में नहीं आ रहा है। पर्यटन विभाग की तरफ से रेवतीराम तालाब के सौंदर्यीकरण का कार्य कराया गया, लेकिन अब यह तालाब फिर से जीर्ण-शीर्ण हालत की तरफ बढ़ रहा है। इसकी पहचान वापस दिलाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।
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सीन-3
जीर्ण शीर्ण हालत में शहीद स्मारक
अंग्रेजों के जुल्म और सितम के काले अध्याय के खिलाफ भारतीय किसानों के बलिदान की अमिट गाथा, जिसे मुंशीगंज गोलीकांड का नाम दिया गया। सात जनवरी 1921 को निहत्थे किसानों पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसाई थीं। सई नदी खून से लाल हो गई थी। किसानों की याद में सई नदी के तट पर शहीद स्मारक तो बनवाया गया, लेकिन इसके सौंदर्यीकरण पर ध्यान नहीं दिया गया। सात जनवरी को किसानों को याद करके मामले की इतिश्री कर ली जाती है। यहां पर गंदगी फैली रहती है। यहां लगाई गई वाटिका में पौधे सूख गए हैं। घोड़ा, हिरन, पक्षी व अन्य जानवरों की बनाई गई मूर्तियां टूटकर बदसूरत हो गई हैं। पेयजल के लिए बना टैंक व टोटियां खराब हो गई हैं। मुुख्य शहीद स्तंभ के किनारे बनी रेलिंग व दीवारें टूट रही हैं। यहां लगे सजावटी पौधे सूख गए हैं। आरडीए की तरफ से शहीद स्मारक के सौंदर्यीकरण को लेकर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
सीन-4
नहीं बदल सकी तस्वीर, खंडहर में तब्दील जनाना घाट
डलमऊ। डलमऊ से होकर पतित पावनी गंगा नदी गुजरी हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र का पौैराणिक और ऐतिहासिक महत्व क्या होगा। डलमऊ के शुक्ल घाट पर 500 वर्ष पहले जनाना घाट बनवाया गया था। यहां पर महिलाएं स्नान करती थीं। होते करते जनाना घाट अब खंडहर में तब्दील हो गया है। नमामि गंगे योजना में भी इसे शामिल नहीं किया गया। नतीजतन जनाना घाट की तस्वीर आज तक नहीं बदल पाई। यहीं पर राजा डलदेव का किला है। इसका भी सौंदर्यीकरण कराने की सुधि किसी को नहीं आई। यह हाल तब है, जब पर्यटन विभाग और नगर पंचायत डलमऊ के पास सौंदर्यीकरण कराने के नाम का बजट आता है।
किसी ने नहीं ली सुध
डलमऊ। बड़ामठ के स्वामी दिव्यानंद, तीर्थ पुरोहित सभा के पूर्व अध्यक्ष श्याम प्रकाश कहते हैं कि डलमऊ का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। यहां पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं। नमामि गंगे योजना के तहत कई घाटों का सौंदर्यीकरण कराया गया, लेकिन जनाना घाट और राजा डलदेव का किला उपेक्षा का शिकार है। इन धरोहरों को सजाने और संवारने के लिए न तो जिला प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों की तरफ से कभी ध्यान नहीं दिया गया। यहां के स्थलों का सौंदर्यीकरण करा दिया जाए तो यह पर्यटन के लिहाज से अच्छा होगा, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। बुजुर्ग त्रियुगी नारायण भी कहते हैं कि पर्यटन स्थल को बढ़ावा देने के नाम पर महज खानापूरी ही की गई।
जिले की धरोहरों को चिह्नित कराकर उन्हें उनकी पहचान दिलाने का काम कराया जाएगा। जल्द रूपरेखा तैयार करके सौंदर्यीकरण कराने की पहल की जाएगी।-प्रभाष कुमार, सीडीओ