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हैलाेजन की रोशनी में होती बंदियों की निगरानी
रायबरेली/ अमर उजाला ब्यूराे
Updated Thu, 03 Nov 2016 11:32 PM IST
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jail
- फोटो : getty images
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सेंट्रल जेल भोपाल में सिमी के आठ आतंकियों के भाग जाने के बाद भी जेल की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। रायबरेली जिला कारागार में स्टाफ और संसाधन की कमी अरसे से बनी है। ऐसे में यहां पर बंदियों की निगरानी रामभरोसे है।
हाईमास्क लाइट, वाच टॉवर की व्यवस्था तक नहीं है। मर्करी की रोशनी में बंदियों की निगरानी की जाती है। क्षमता से अधिक बंदी भी यहां पर बंद हैं। बैरकों की दशा भी खराब है। बारिश के दौरान तो बैरकें टपकती हैं। अफसरों की मानें तो कई बार स्टाफ और संसाधन की कमी को पूरा करने के लिए लिखा पढ़ी की गई, लेकिन नतीजा सिफर है।
देश की आजादी से पहले अंग्रेजी हुकूमत में 1887 में जेल की बिल्ंिडग बनाई गई थी। बैरकों में कैदियों की संख्या तो बढ़ गई, लेकिन स्टाफ और संसाधन पहले की तरह ही हैं। सुरक्षा के मद्देनजर मोबाइल जैमर की कौन कहे, यहां पर वाच टॉवर और हाईमास्क लाइट तक की भी व्यवस्था नहीं है।
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बंदियों की निगरानी के लिए 22 मर्करी लाइटें ही लगाई गई हैं, जबकि दोगुनी होनी चाहिए। मौजूदा समय में करीब 900 बंदी हैं, जबकि जेल की क्षमता 680 है। जेल अफसरों की मानें तो पूर्वांचल समेत सुल्तानपुर, लखनऊ, बाराबंकी, प्रतापगढ़ समेत अन्य जिलों के कई शातिर अपराधी बंद हैं।
जेल में बंद अपराधी तो हाईटेक हो गए हैं, लेकिन यहां पर आज भी तैनात जेल कर्मी को पुरानी बंदूक का ही सहारा है। बंदियों के बवाल करने पर उन्हें रोकने के लिए न तो आंसू गैस और न ही रबर बुलेट की ही कोई व्यवस्था है। ऐसे में हाईटेक अपराधियों के आगे जेल प्रशासन की व्यवस्था बौनी साबित हो रही है।
जेल के भीतर आए दिन बंदियों और बंदीरक्षकों के बीच मारपीट भी हुआ करती है। कुछ माह पहले बंदियों ने जेलर और डिप्टी जेलर तक की पिटाई कर दी थी। बावजूद बंदियों से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
अफसरों का दावा है कि बंदियों की निगरानी के लिए जिला कारागार में 20 सीसीटीवी कैमरे बैरकों के मुख्यद्वार पर लगवाए गए हैं, ताकि बंदियों के निकलने के दौरान उनकी निगरानी की जा सके। पर रात में उजाला कम होने की वजह से इनके भागने का खतरा अधिक रहता है।
मौजूदा समय में जिला कारागार में एक जेल अधीक्षक, एक जेलर, दो डिप्टी जेलर, 24 बंदी रक्षक तैनात है। डिप्टी जेलर के तीन, बंदी रक्षकों के 28 और महिला बंदी रक्षकों के सभी छह पद खाली चल रहे हैं।
जेल अधीक्षक अमिता दुबे का कहना है कि भाोपाल में सिमी आतंकियों की भाग जाने की घटना के चलते सतर्कता बरती जा रही है। स्टाफ और संसाधन की कमी है, जिसे पूरा करने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखापढ़ी की जा रही है। हालांकि मौजूद संसाधन और स्टाफ से सुरक्षा व्यवस्था पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है।
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हाईमास्क लाइट, वाच टॉवर की व्यवस्था तक नहीं है। मर्करी की रोशनी में बंदियों की निगरानी की जाती है। क्षमता से अधिक बंदी भी यहां पर बंद हैं। बैरकों की दशा भी खराब है। बारिश के दौरान तो बैरकें टपकती हैं। अफसरों की मानें तो कई बार स्टाफ और संसाधन की कमी को पूरा करने के लिए लिखा पढ़ी की गई, लेकिन नतीजा सिफर है।
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देश की आजादी से पहले अंग्रेजी हुकूमत में 1887 में जेल की बिल्ंिडग बनाई गई थी। बैरकों में कैदियों की संख्या तो बढ़ गई, लेकिन स्टाफ और संसाधन पहले की तरह ही हैं। सुरक्षा के मद्देनजर मोबाइल जैमर की कौन कहे, यहां पर वाच टॉवर और हाईमास्क लाइट तक की भी व्यवस्था नहीं है।
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बंदियों की निगरानी के लिए 22 मर्करी लाइटें ही लगाई गई हैं, जबकि दोगुनी होनी चाहिए। मौजूदा समय में करीब 900 बंदी हैं, जबकि जेल की क्षमता 680 है। जेल अफसरों की मानें तो पूर्वांचल समेत सुल्तानपुर, लखनऊ, बाराबंकी, प्रतापगढ़ समेत अन्य जिलों के कई शातिर अपराधी बंद हैं।
जेल में बंद अपराधी तो हाईटेक हो गए हैं, लेकिन यहां पर आज भी तैनात जेल कर्मी को पुरानी बंदूक का ही सहारा है। बंदियों के बवाल करने पर उन्हें रोकने के लिए न तो आंसू गैस और न ही रबर बुलेट की ही कोई व्यवस्था है। ऐसे में हाईटेक अपराधियों के आगे जेल प्रशासन की व्यवस्था बौनी साबित हो रही है।
जेल के भीतर आए दिन बंदियों और बंदीरक्षकों के बीच मारपीट भी हुआ करती है। कुछ माह पहले बंदियों ने जेलर और डिप्टी जेलर तक की पिटाई कर दी थी। बावजूद बंदियों से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
अफसरों का दावा है कि बंदियों की निगरानी के लिए जिला कारागार में 20 सीसीटीवी कैमरे बैरकों के मुख्यद्वार पर लगवाए गए हैं, ताकि बंदियों के निकलने के दौरान उनकी निगरानी की जा सके। पर रात में उजाला कम होने की वजह से इनके भागने का खतरा अधिक रहता है।
मौजूदा समय में जिला कारागार में एक जेल अधीक्षक, एक जेलर, दो डिप्टी जेलर, 24 बंदी रक्षक तैनात है। डिप्टी जेलर के तीन, बंदी रक्षकों के 28 और महिला बंदी रक्षकों के सभी छह पद खाली चल रहे हैं।
जेल अधीक्षक अमिता दुबे का कहना है कि भाोपाल में सिमी आतंकियों की भाग जाने की घटना के चलते सतर्कता बरती जा रही है। स्टाफ और संसाधन की कमी है, जिसे पूरा करने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखापढ़ी की जा रही है। हालांकि मौजूद संसाधन और स्टाफ से सुरक्षा व्यवस्था पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है।