फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Pratapgarh News ›   model scool in pratrapgarh

इनसे सीखिए, आप भी बदल डालिए अपने गांव के स्कूल

Thu, 05 Apr 2018 12:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Updated Thu, 05 Apr 2018 12:04 AM IST
विज्ञापन
हर कमरे में फर्श पर चमचमाती टाइल्स, दीवारों पर शानदार पेंटिंग, पंखे, अत्याधुनिक लाइब्रेरी और प्रयोगशाला, कंप्यूटर लैब, चमाचम शौचालय और इन सबके बीच फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते बच्चे। यह पढ़ने के बाद सोच रहे हैं कि बात किसी कान्वेंट स्कूल की हो रही है तो आप गलत हैं। यह जिले के छह सरकारी स्कूलों की तस्वीर है, जहां प्रधानाध्यापकों और प्रधानों ने मिलकर सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों को अपना नजरिया बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। इन स्कूलों में छात्रों की संख्या भी दो सौ से अधिक है। यह विद्यालय बेसिक शिक्षा के लिए नजीर बने हैं। तो इनसे आप भी सीखिए और अपने गांव के स्कूल की हालत बदल डालिए...
विज्ञापन



प्रोजेक्टर से स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर भी चलाते हैं बच्चे
सदर क्षेत्र में मोहनगंज के पास स्थित प्राथमिक विद्यालय भुवालपुर डोमीपुर की हालत तीन वर्ष पहले तक दूसरे सरकारी स्कूलों की तरह ही थी। वही टूटी दीवारें, इधर-उधर दौड़ते बच्चे और दोपहर में पानी वाली दाल के साथ जली रोटी। 2015 में यहां प्रधानाध्यापिका डा. नीलम ङ्क्षसह की तैनाती हुई। अंग्रेजी में पीएचडी करने वाली नीलम ने आते ही नए प्रयोग करने शुरू कर दिए। सबसे पहले उन्होंने अपनी जेब से दस हजार रुपये खर्च कर बच्चों के बैठने के लिए डेस्क-बेंच का इंतजाम किया। फिर बच्चों के लिए शनिवार को नो बैग डे घोषित किया। इस दिन आधे हाफ तक खेल और फिर सोशल एक्टिविटी शुरू कराई। उनकी मेहनत रंग लाई और विद्यालय में बच्चों की संख्या बढक़र 228 पहुंच गई है। इस उपलब्धि पर एक बार बेसिक शिक्षा विभाग को भी विश्वास नहीं हुआ। नए शिक्षा सत्र के अभी तीन दिन ही बीते हैं और इस स्कूल में 21 नए बच्चों ने दाखिला ले लिया है। नीलम बताती हैं कि बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा। सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की वजह से अभिभावक खुद उनका एडमिशन करवाने के लिए आगे आए। इस स्कूल में कान्वेंट विद्यालयों की तर्ज पर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई होती है। प्रोजक्टर से स्मार्ट क्लास के अलावा बच्चों को प्रेरणादायक फिल्में और कहानियां दिखाई जाती हैं। विज्ञान और कंप्यूटर लैब के साथ लाइब्रेरी भी है, जिसमें छह सौ से अधिक किताबें हैं। यहां से बच्चों को किताबें उपलब्ध कराई जाती हैं। कुल पांच अध्यापक अलग-अलग विषयों में लगे रहते हैं। बच्चों को कैरम, बैडमिंटन, क्रिकेट और शतरंज भी खेलवाया जाता है। स्कूल के विकास में प्रधान ने भी सहयोग किया और अब यहां साफ-सुथरे शौचालय के साथ हर कमरे में टाइल्स और पानी के लिए सबमर्सिबल भी लग गया है। स्कूल देखने के बाद आप एक नजर में यह यकीन नहीं कर सकते कि यह प्राथमिक विद्यालय है।
विज्ञापन



कान्वेंट के बच्चों से प्रतियोगिता, हर सप्ताह होती है पैरेंट्स मीटिंग
मानधाता इलाके के पूर्व माध्यमिक विद्यालय मल्हूपुर भी सरकारी शिक्षा के क्षेत्र में नजीर बना है। यहां भी 2015 से पहले हालात बहुत अच्छे नहीं थे। 2015 में हेडमास्टर रमाशंकर ने विद्यालय की दशा सुधारने के लिए अपने तरीके से प्रयास करने शुरू किए। सबसे पहले उन्होंने बच्चों को बैठने के लिए अपने पैसे डेस्क बेंच का इंतजाम किया। कुछ दिनों बाद अपनी तनख्वाह से ही स्मार्ट क्लास चलाने के लिए प्रोजक्टर लगाया। कान्वेंट स्कूलों की तर्ज पर पढ़ाई शुरू की तो आसपास के इलाके में चर्चा शुरू हो गई। रमाशंकर यहीं नहीं रुके। उन्होंने अभिभावकों से डोर टू डोर संपर्क करना शुरू किया और बेहतर पढ़ाई का दावा किया। बात इससे भी न बनी तो हर सप्ताह पैरेंट्स मीटिंग करनी शुरू कर दी। रिस्पांस देखकर अभिभावकों ने भी रुचि दिखाई शुरू कर दी। नतीजा यह हुआ कि स्कूल की सूरत बदलने लगी। रमाशंकर की मेहनत देख प्रधान नंदिनी मिश्रा ने भी सहयोग किया और बरामदा, आफिस और साइंस लैब में टाइल्स की व्यवस्था कराई। तीन आधुनिक शौचालय बनवाए। रमाशंकर अपने स्कूल के बच्चों की कान्वेंट स्कूल के बच्चों के साथ प्रतियोगिता कराते हैं। इस स्कूल में पिछले सत्र में 126 बच्चे थे। नए सत्र में तीन दिन के भीतर ही 35 नए एडमिशन हो चुके हैं। रमाशंकर बताते हैं कि 2015 के बाद उन्हें शिक्षकों की अच्छी टीम मिली। जिससे स्थितियों में तेजी से सुधार हुआ।
विज्ञापन
विज्ञापन



बायोमैट्रिक मशीन से शिक्षकों और बच्चों की हाजिरी
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कटरागुलाबसिंह तो निजी स्कूलों को भी मात दे रहा है। हेडमास्टर मोहम्मद फरहीम ने अपने जुनून जज्बे से न सिर्फ स्कूल को हाईटेक किया, बल्कि बच्चों के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया है। यह उत्तर प्रदेश का दूसरा ऐसा सरकारी विद्यालय है जहां शिक्षकों और बच्चों का हाजिरी बायोमैट्रिक मशीन से लगती है। कोई भी लेट नहीं हो सकता। फरहीम ने अपने वेतन से स्कूल को संवारा है। उन्होंने खुद के पैसे से स्कूल की वायरिंग कराई। बिजली, पंखे के साथ इनवर्टर और कक्षा में नोटिस बोर्ड लगवाया। अब प्रधान प्रेमलता अग्रहरि भी चौदहवें वित्त से स्कूल के लिए मदद कर रही हैं। छह शौचालय बनवाए जा रहे हैं तो बच्चों को शुद्ध पानी पिलाने के लिए आरओ भी लग रहा है। स्मार्ट क्लास के लिए डिजिटल बोर्ड के साथ सोलर पैनल भी आ गया है। फरहीम जब इस स्कूल में आए थे तो महज 50 बच्चे थे। अब उनकी संख्या बढक़र 250 पहुंच गई है। स्कूल के अलावा वह कमजोर बच्चों को हर दिन दो घंटे नि:शुल्क कोचिंग भी देते हैं।

प्रधान ने दस लाख रुपये खर्च कर बदला रंगरूप
मॉडल स्कूल राजगढ़ भी प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ़ रहा है। इस स्कूल को संवारने में हेडमास्टर अजय दूबे के साथ प्रधान देवदास विश्वकर्मा की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। 14वें वित्त से 10 लाख रुपये खर्च कर प्रधान ने स्कूल की सूरत ही बदल डाली। कमरों में टाइल्स, शौचालय के साथ सबमर्सिबल और शानदार किचेन बनवाया। पिछले दिनों मंडलायुक्त आशीष गोयल ने भी इस स्कूल का निरीक्षण किया और यहां की व्यवस्था देखकर अध्यापकों को शाबाशी दी। इस स्कूल में भी बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जा रही है। प्रधानाध्यापक अजय दूबे के प्रयास से बच्चों की संख्या बढ़ी है।

चमचमाते कमरे, बेसिन में हाथ धोते हैं बच्चे
कभी बदहाल रहे प्राथमिक सगरा की तस्वीर इन दिनों देखते ही बनती है। ग्राम प्रधान विनोद यादव ने 14वें वित्त से स्कूल की सूरत बदलकर रख दी है। स्कूल के सभी कमरे और आफिस टाइल्स और पेटिंग से चमचमा रहे हैं। स्कूल में मिड डे मील तैयार करने के लिए घर की तरह बेहतरीन किचन बनाया गया है। और स्कूलों की तरह बच्चे न यहां गंदगी करते हैं न जमीन पर हाथ धोते हैं। उनके हाथ धोने के लिए बकायदा बेसिन की बनवाया गया है। जहां साबून के साथ साफ तौलिया भी हर वक्त रखा रहता है। यहां भी बच्चों की संख्या बढ़ रही है।

कभी 12 बच्चे थे, अब बढक़र 40 पहुंची संख्या
विकास खंड कुंडा के शहाबपुर गांव में प्रधान राजेश प्रभाकर सिंह ने पहली बार विद्यालय को कांवेंट बनाने की दिशा में कदम उठाया था। सबसे पहले उन्होंने बिल्डिंग की दशा सुधारी। अब विद्यालय में पार्क, शौचालय, पंखे, टाइल्स देखकर कोई कह नहीं सकता कि यह प्राइमरी स्कूल है। 15 अगस्त 2016 में इस विद्यालय में 12 बच्चे आते थे। अअ 40 बच्चों की उपस्थिति होती है। बच्चों सवालों के जवाब फटाफट देते हैं।

अभिभावकों ने सहयोग कर बदली व्यवस्था
प्रधानाध्यापक संजीव शुक्ला और प्रधानपति आजाद सिंह ने आसपास के लोगों के सहयोग से प्राथमिक विद्यालय चौसा की व्यवस्था बदली। शिक्षा से लेकर बच्चों के रहन सहन और साफ सफाई के बारे में बताने के साथ ही अभिभावकों से मिलकर विद्यालय के लिए सहयोग लिया। इसके बाद बच्चों के बैठने के लिए कुर्सी-मेज, शौचालय, हर कमरे में पंखे और फूलों की क्यारियां तैयार की गईं। यहां नामांकित बच्चों की संख्या 91 है। इसी तरह बाबागंज विकास खंड के ऐंधा तख्त का पुरवा प्राथमिक विद्यालय की दशा में भी प्रधानाध्यापक पंकज सिंह और प्रधान कुसुम सिंह के प्रयास सुधार हुआ है।


हम सुधार रहे हैं, आप साथ दीजिए : बीएसए
बीएसए बीएन सिंह का कहना है कि प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है। इस बार जिले के 127 स्कूलों को मॉडल स्कूल के तौर पर विकसित किया गया है। इन स्कूलों में कान्वेंट स्कूलों की तर्ज पर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई होगी। स्कूल में बच्चों की सुविधाओं और बदहाल दशा को बदलने के लिए प्रधानों के साथ आम लोगों का भी सहयोग चाहिए, तभी प्राथमिक शिक्षा का स्वरूप बदल सकता है। जिले के पांच स्कूल इस दिशा में नजीर बने हैं। सरकारी मदद के साथ-साथ लोग आपसी सहयोग से भी स्कूलों की दशा बदल सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed