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काशीनगरी की फूल से प्रसन्न हुईं लक्ष्मी
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कचहरी के समीप चौराहे पर दीपावली पूजा को फूल खरीदते लोग।
- फोटो : PRATAPGARH
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भगवान भोले की नगरी वाराणसी से आने वाले फूलों में लक्ष्मी और गणेश प्रसन्न किया। जिले में फूल का उत्पादन कम होने और दिवाली पर मांग अधिक होने के कारण दुकानदारों ने वाराणसी से फूल मंगाए। लोगों ने घरों में शिवनगरी से आई विशेष गुलसुपाड़ी फूलों की माला से पूजन कर लक्ष्मी को प्रसन्न किया।
दिवाली के बाद भी न सूखने वाला यह फूल साल-भर सुख और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। दिवाली पर श्रद्धालुओं ने गणेश-लक्ष्मी के दरबार को गेंदा और मोर पंख से सजाकर विधिवत पूजा-अर्चना की।
दिवाली पर फूलों का सबसे अधिक महत्व होता है। गेंदा के फूल को पूजा करने के साथ-साथ सजाने के भी काम आता है। ये ऐसा फूल है, जो हर शुभ काम में प्रयोग में आता है। अगर दिवाली की बात की जाय तो इस मौके पर कमल और गुल सुपाड़ी और मोरपंखी का पूजन में विशेष महत्व होता है। दिवाली पर अंबेडकर चौराहे पर पुष्पों की दुकान लगाने वाले शिवकुमार माली बताते हैं कि गुल सुपाड़ी का पुष्प सुपाड़ी के आकार का बैगनी रंग का होता है।
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मान्यता है कि इस पुष्प की विशेष माला के चढ़ाने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। इसकी विशेषता है कि यह जल्दी सूखता नहीं हैं। पानी में एक बार भिगो देने से ये पहले जैसे हरा-भरा हो जाता है। यह इसकी विशेषता है। दोबारा दिवाली आने पर लोग इस माला को बदल देते हैं। कमल ज्ञान की देवी सरस्वती और ब्रह्माजी को बहुत प्रिय है।
दिवाली पर इससे पूजन का विशेष महत्व है। मोरपंखी को भी विद्या की देवी मां सरस्वती का प्रतीक माना जाता है। लक्ष्मी और सरस्वती का एक ही रूप है। दिवाली पर मोरपंखी और कमल पुष्प और गेंदे से सजे गुलदस्ते से पूजा कर धन के साथ ज्ञान की वृद्धि भी कामना की गई।
शाम होते ही गिर गया फूल और माला का रेट
शाम होते ही फूल और मालाओं के बाजार में गिरावट आना शुरू हो गई। दिन भर तो गेंदे की माला 50 रुपये से कम नहीं थी। कमल का फूल 50 और गुलसुपाड़ी की माला 60 रुपये में बिक रहा था। शाम होते ही माला और पुष्प के रेट आधे हो गये।
दुकानदारों का कहना था कि गत वर्ष की अपेक्षा इस साल काफी मात्रा में फूल और मालाओं बिक्री के लिये वाराणसी से मंगाये गये थे। दुकानें भी अधिक सज गई थी। फूल खराब होने से घाटा लगेगा इसलिये आधे दाम में ही बेचना पड़ रहा है।
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दिवाली के बाद भी न सूखने वाला यह फूल साल-भर सुख और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। दिवाली पर श्रद्धालुओं ने गणेश-लक्ष्मी के दरबार को गेंदा और मोर पंख से सजाकर विधिवत पूजा-अर्चना की।
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दिवाली पर फूलों का सबसे अधिक महत्व होता है। गेंदा के फूल को पूजा करने के साथ-साथ सजाने के भी काम आता है। ये ऐसा फूल है, जो हर शुभ काम में प्रयोग में आता है। अगर दिवाली की बात की जाय तो इस मौके पर कमल और गुल सुपाड़ी और मोरपंखी का पूजन में विशेष महत्व होता है। दिवाली पर अंबेडकर चौराहे पर पुष्पों की दुकान लगाने वाले शिवकुमार माली बताते हैं कि गुल सुपाड़ी का पुष्प सुपाड़ी के आकार का बैगनी रंग का होता है।
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मान्यता है कि इस पुष्प की विशेष माला के चढ़ाने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। इसकी विशेषता है कि यह जल्दी सूखता नहीं हैं। पानी में एक बार भिगो देने से ये पहले जैसे हरा-भरा हो जाता है। यह इसकी विशेषता है। दोबारा दिवाली आने पर लोग इस माला को बदल देते हैं। कमल ज्ञान की देवी सरस्वती और ब्रह्माजी को बहुत प्रिय है।
दिवाली पर इससे पूजन का विशेष महत्व है। मोरपंखी को भी विद्या की देवी मां सरस्वती का प्रतीक माना जाता है। लक्ष्मी और सरस्वती का एक ही रूप है। दिवाली पर मोरपंखी और कमल पुष्प और गेंदे से सजे गुलदस्ते से पूजा कर धन के साथ ज्ञान की वृद्धि भी कामना की गई।
शाम होते ही गिर गया फूल और माला का रेट
शाम होते ही फूल और मालाओं के बाजार में गिरावट आना शुरू हो गई। दिन भर तो गेंदे की माला 50 रुपये से कम नहीं थी। कमल का फूल 50 और गुलसुपाड़ी की माला 60 रुपये में बिक रहा था। शाम होते ही माला और पुष्प के रेट आधे हो गये।
दुकानदारों का कहना था कि गत वर्ष की अपेक्षा इस साल काफी मात्रा में फूल और मालाओं बिक्री के लिये वाराणसी से मंगाये गये थे। दुकानें भी अधिक सज गई थी। फूल खराब होने से घाटा लगेगा इसलिये आधे दाम में ही बेचना पड़ रहा है।

अम्बेडकर चौराहे पर लक्ष्मी गणेश पूजा व घरों को सजाने के लिए फूल खरीदते लोग।- फोटो : PRATAPGARH