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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Pratapgarh News ›   Hindi Diwas... Records could not be saved on the same land where Munshi Premchand taught children Kakhara.

Pratapgarh News: हिंदी दिवस... जिस जगह मुंशी प्रेमचंद ने बच्चों को सिखाया ककहरा, उसी धरा पर नहीं सहेज पाए अभिलेख

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 14 Sep 2024 04:24 AM IST
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Hindi Diwas... Records could not be saved on the same land where Munshi Premchand taught children Kakhara.
आज हम राष्ट्रीय हिंदी दिवस मना तो रहे हैं लेकिन अपने साहित्यकारों से जुड़े अभिलेखों और धरोहरों को संजोकर भी नहीं रख पाए। जिस जिले में मुंशी प्रेमचंद ने बच्चों को पढ़ाया हो, उन्हें हिंदी का ककहारा सिखाया हो। वहां हम उनकी स्मृतियों को संजोकर रखने में हम नाकाम रहे। उपन्यास सम्राट को जिले में सम्मान का तख्त तक नहीं दिलाया जा सका।
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शहर के राजकीय इंटर कॉलेज में मुंशी प्रेमचंद को प्रतिमा के इतर कुछ नहीं है। मुंशी प्रेमचंद ने शहर के चौक स्थित वर्नाकुलर कॉलेज (वर्तमान जीजीआईसी) में बतौर कला शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाया। गोदान उपन्यास को सृजित करने से पहले उनके किरदारों की रूपरेखा बेल्हा के ग्रामीण परिवेश से ही ली थी।
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कहानीकार प्रेम कुमार त्रिपाठी के मुताबिक बहराइच में शिक्षक के तौर पहली नियुक्ति मिलने के ढाई माह बाद मुंशी प्रेमचंद का तबादला 21 सितंबर 1900 को प्रतापगढ़ के चौक स्थित वर्नाकुलर कॉलेज (वर्तमान जीजीआईसी) में हो गया था। छह जुलाई 1902 में छुट्टी लेकर उन्होंने इलाहाबाद के प्रिपरेटरी कॉलेज में ट्रेनिंग के लिए दाखिला लिया। इसके बाद 30 अप्रैल 1904 को मुंशी प्रेमचंद दोबारा बेल्हा लौट आए। करीब नौ माह पढ़ाने के बाद वह मई 1905 में पुन: प्रयागराज लौट गए।
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साहित्यकार डॉ. दयाराम मौर्य के मुताबिक मुंशी प्रेमचंद अजीत नगर स्थित ताला कोठी में निवास करते थे। उन्होंने ताला रियासत के ताल्लुकदार रुद्र प्रताप सिंह के बेटे रामेश्वर प्रसाद सिंह, राघवेंद्र प्रसाद सिंह व राजेंद्र प्रसाद सिंह को शिक्षा दी। ताला कोठी में रहते हुए प्रेमचंद ने बेल्हा के जनजीवन के साथ ही सामाजिक दशा, रीति रिवाज, परंपरा व रहन-सहन को बारीकी से जाना। जिसका जिक्र उनकी कहानियों व उपन्यासों में मिलता है।
ताला कोठी की बहू चंद्रप्रभा सिंह के मुताबिक ताल्लुकदार रुद्र प्रताप सिंह मुंशी जी को घर के सदस्य की तरह मानते थे। पेट की समस्या के चलते उन्हें खिचड़ी अधिक प्रिय थी। उन्होंने बताया कि अब कक्ष तो मौजूद नहीं है लेकिन पुराना भवन प्रेमचंद की यादों को थोड़ा बहुत संजोये हुए है।

इनसेट :-
जहां पढ़ाया, वहीं पर नहीं है मुंशी प्रेमचंद जुड़ा कोई साक्ष्य

वर्तमान जीजीआईसी हो या फिर जीआईसी कहीं पर प्रेमचंद से जुड़ा साक्ष्य मौजूद नहीं है। जीआईसी परिसर में मुंशी प्रेमचंद की सिर्फ प्रतिमा मौजूद है। जिसकी रंगाई तक नहीं हुई है। जीआईसी प्रधानाचार्य कुलश्रेष्ठ तिवारी ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद यहां शिक्षक के तौर पर नियुक्त रहे। लेकिन उनसे जुड़े कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।
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इनसेट
मुंशी प्रेमचंद के इतिहास के बारे में जानकारी नहीं है कि वह कभी यहां पर शिक्षक रहे। लेकिन उनकी कहानी ईदगाह को पढ़ा है।
आयुष पांडेय, छात्र, जीआईसी

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मित्रता कहानी को पढ़कर मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व का पता चलता है। प्रतापगढ़ से उनका क्या नाता रहा यह नहीं मालूम था। विद्यालय में उनकी प्रतिमा जरूर लगी है।

आदित्य मिश्रा, छात्र, जीआईसी
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कहानियों को पढ़कर मुंशी प्रेमचंद के बारे में जान पाया। बेल्हा में उन्होंने कब शिक्षा दी इसकी जानकारी नहीं है। प्रेमचंद जिले से जुड़े रहे तो यह गर्व की बात है।

हिमांशु यादव, छात्र,जीआईसी

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गोदान उपन्यास पढ़कर ग्रामीण परिवेश की लकीर आंखों के समक्ष सजीव हो जाती है। प्रेमचंद के शिक्षण कार्य के बारे में अधिक मालूम नहीं है कि वह यहां पढ़ाते थे।

आदर्श, छात्र, जीआईसी
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