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Pilibhit News: नेपाल की तबाही ने फिर कुरेद दिया 1989 में आई शारदा की जलप्रलय का जख्म

Sun, 30 Aug 2026 01:53 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 30 Aug 2026 01:53 AM IST
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The devastation in Nepal has reopened the wounds of the 1989 Sharda deluge.
पूर्व में आई बाढ़ के बाद नेपाल ने अपने क्षेत्र में बनाया झूला पुल। संवाद
पीलीभीत। नेपाल में आई त्रासदी की खबरों ने शारदा नदी के सीमांत क्षेत्र में रहने वाले बुजुर्गों के जख्म फिर हरे कर दिए हैं। पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश और नेपाल-उत्तराखंड की नदियों के उफान से वर्ष 1989 में शारदा ने जो रौद्र रूप दिखाया था, उसकी भयावह यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। उस समय नदी सिर्फ खेतों की मेड़ नहीं काट रही थी, बल्कि देखते ही देखते लोगों के घर, बस्तियां और पीढ़ियों की मेहनत अपने साथ बहा ले गई थी। गभिया सहराई का करीब आधा हिस्सा शारदा की धारा में समा गया था। सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन का नामोनिशान मिट गया था। इधर नेपाल में आई हालिया त्रासदी ने सीमांत क्षेत्र के लोगों को उसी पुराने मंजर की याद दिला दी है। बारिश तेज होते ही नदी किनारे बसे परिवारों की निगाहें शारदा के जलस्तर पर टिक जाती हैं। संवाद
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गभिया सहराई का आधा हिस्सा शारदा में समा गया
गभिया सहराई निवासी अजीत मंडल आज भी उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। उनका कहना है कि 1989 की बाढ़ में देखते ही देखते गभिया सहराई क्षेत्र का आधा हिस्सा शारदा नदी की भेंट चढ़ गया था। जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां बाद में शारदा की धार बहने लगी। कई परिवारों के सामने रहने और रोजी-रोटी दोनों का संकट खड़ा हो गया।
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बस्तियां उजड़ीं, खेत कटे, पीढ़ियों की कमाई बह गई
शारदा नदी से सटे कलीनगर तहसील क्षेत्र में बाढ़ और कटान ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। कई बंगाली और पूर्वी कॉलोनियों का बड़ा हिस्सा नदी में समा गया था। किसानों की सैकड़ों एकड़ भूमिधरी जमीन कटकर शारदा की धारा का हिस्सा बन गई। जिन परिवारों ने वर्षों की मेहनत से घर और खेत बनाए थे, उन्हें सब कुछ पीछे छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ा। स्थानीय लोगों के अनुसार उस समय क्षेत्र में बसे कई परिवारों के लोग तैरना जानते थे। इससे बड़े पैमाने पर जनहानि तो टल गई, लेकिन आर्थिक और सामाजिक नुकसान इतना बड़ा था कि उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। चार दशक बाद आज भी उनका परिवार और कई अन्य प्रभावित परिवार खुद को बाढ़ पीड़ित मानते हैं। स्थायी जमीन और सुरक्षित पुनर्वास नहीं मिलने से उनकी जिंदगी अब भी अस्थायी ठिकानों के सहारे चल रही है।
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नेपाल ने आपदा से निपटने के किए इंतजाम
पुरानी त्रासदी को देखते हुए नेपाल की ओर सीमांत क्षेत्र में आपदा की स्थिति में नागरिकों को सुरक्षित रखने के लिए करीब 90 लोगों की क्षमता वाला ठहरने का स्थान तैयार किया गया है। भारत-नेपाल सीमा पर कई स्थानों पर झूला पुल भी बनाए गए हैं। इससे आवागमन में सुविधा हुई है।

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आंखों के सामने घूम जाता है 1989 का मंजर
हमने शारदा नदी का जलप्रलय अपनी आंखों से देखा है। 1989 में देखते ही देखते गभिया सहराई क्षेत्र का आधा हिस्सा शारदा नदी की भेंट चढ़ गया था। वह मंजर आज भी याद है तो सिहरन पैदा हो जाती है।- अजीत मंडल, गभिया सहराई

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सब कुछ चला गया, आज भी हैं बाढ़ पीड़ित
मैं 1971 और 1989 की जलप्रलय का पीड़ित रहा हूं। 1989 की बाढ़ बहुत खतरनाक थी। देखते ही देखते हमारा सब कुछ चला गया। घर और सामान बचाना भी मुश्किल हो गया था। आज भी हम बाढ़ पीड़ित हैं और शारदा डैम क्षेत्र में अस्थायी रूप से रह रहे हैं। - बिल्लू राजभर, ग्राम रमनगर गुन्हान

पूर्व में आई बाढ़ के बाद नेपाल ने अपने क्षेत्र में बनाया झूला पुल। संवाद

पूर्व में आई बाढ़ के बाद नेपाल ने अपने क्षेत्र में बनाया झूला पुल। संवाद

पूर्व में आई बाढ़ के बाद नेपाल ने अपने क्षेत्र में बनाया झूला पुल। संवाद

पूर्व में आई बाढ़ के बाद नेपाल ने अपने क्षेत्र में बनाया झूला पुल। संवाद

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