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नगरपालिका ने एक साल में 78 करोड़ की सफाई करा दी, मगर स्वच्छता रैंकिंग में सबसे पीछे

Sat, 22 Aug 2020 01:15 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2020 01:15 AM IST
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swachata survey ranking
पीलीभीत। शहर को स्वच्छ रखने और सफाई व्यवस्था के नाम पर नगरपालिका ने एक साल में 78 करोड़ रुपये खर्च किए। फिर भी न तो कूड़े के ढेर हटे। न ही चोक नाले-नालियां साफ हुईं। सड़कों और गलियों की हालत जर्जर होने से सफाई व्यवस्था बद से बदतर हो गई। कूड़ा डालने की जगह तय होने के बाद भी डंपिंग ग्राउंड पर उसे नहीं डाला गया। मतलब, सफाई के नाम पर नगरपालिका ने हर महीने 65 लाख रुपये खर्च किए। इसके बावजूद शहर की सफाई व्यवस्था सुधारने में नाकाम रहे। नतीजा यह है कि देश भर के स्वच्छता सर्वेक्षण वाले शहरों की रैंकिंग में पीलीभीत 259 वें नंबर पर है और बरेली मंडल में भी स्वच्छता रैंकिंग में पीलीभीत सबसे पीछे है।
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शहर की आबादी अब ढाई लाख से अधिक हो चुकी है, मगर नगरपालिका आज भी चार दशक पुराने हेल्थ मैनुअल के अनुसार ही काम करती आ रही है। शहर में कुल 27 वार्ड हैं। पूरे शहर की सफाई कराने का जिम्मा 180 स्थायी सफाई कर्मी और 250 ठेका सफाई कर्मियों के कंधों पर है। नगरपालिका आउटसोर्सिंग और ठेके पर भी नाला सफाई कराती है। मगर, कभी भी सफाई व्यवस्था ठीक से नहीं होती। दूसरी नगरपालिका या नगर पंचायतों में सफाई कर्मी दो शिफ्टों में सफाई का काम करते हैं, मगर यहां की नगरपालिका के सफाई कर्मी केवल एक शिफ्ट में ड्यूटी पर आते हैं। वह भी सफाई के नाम पर केवल खानापूरी करते हैं। रेलवे स्टेशन से लेकर मुख्य मार्गों, बाजारों और गलियों में गंदगी पसरी रहती है। मुख्य मार्ग टनकपुर हाईवे के किनारे जहां हरे-भरे पौधे लगे होने चाहिए, वहां कूड़े के ढेरों के दलदल के बीच लंबी घास खड़ी है। तालाबों में सुंदरीकरण की जगह गंदा पानी भरा है। एक साल में नगरपालिका ने सफाई के नाम पर 78 करोड़ का भारी भरकम बजट खर्च कर डाला। इससे शहर से कूड़ा करकट की सफाई तो नहीं हो पाई, लेकिन जिनके ऊपर शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने करोड़ों का बजट जरूर साफ कर दिया।
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शहर में 22 खुले कचरा घर
शहर के 49 मोहल्लों का कूड़ा आज भी सड़कों के किनारे बने 22 खुले कचरा घरों में डाला जाता है। हर रोज इन कचरा घरों से नौ टन से अधिक कूड़ा उठाकर देवहा नदी की तलहटी या फिर हाइवे के किनारे डाला जाता है। ये कचरा घर भी केवल नाम के बने हैं। अधिकांश कूड़ा सड़क तक छितरा रहता है। आधी सड़कों पर कूड़े का कब्जा रहता है। शहरवासियों को इसी कूड़े के ढेर से गुजरना पड़ता है।
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सॉलिड वेस्ट प्लांट नहीं लगा, नदी किनारे पड़ता है कूड़ा
प्रशासन के सहयोग से दो साल पहले शहर से सटे मीरापुर इलाके में सॉलिड वेस्ट प्लांट लगाने के लिए जमीन तय की गई थी। मगर, यहां अब तक प्लांट नहीं लगा। शुरुआती दौर में यहां कुछ दिन तक शहर का कूड़ा डाला गया, मगर बरसात में बंद कर दिया गया। उसके बाद से शहर भर का कूड़ा देवहा नदी की तलहटी में डाला जाता है। कूड़े से नदी की तलहटी तो पट ही चुकी है। अब यह कूड़ा सड़क तक आ चुका है।
हर माह 65 लाख होते हैं खर्च
नगरपालिका प्रशासन के मुताबिक स्थायी सफाई कर्मचारियों पर वेतन मद से हर माह 45 लाख रुपये से अधिक खर्च किया जाता रहा है, ठेका सफाई कर्मियों पर 16 लाख खर्च हो रहे हैं। वाहनों पर चार लाख का डीजल खर्च होना दर्शाया जाता है। हर माह 65 लाख रुपये सफाई पर खर्च होते हैं। फिर भी शहर में कहीं सफाई नहीं दिखती।
नगरपालिका के पास ये हैं संसाधन
जेसीबी मशीन 02
लोडर 01
डंपर 01
टैक्ट्रर ट्रॉली 05
टाटा लोडर 16
सीवर सक्शन मशीन 01
शहर की सफाई व्यवस्था बेपटरी हो चुकी है। सुनगढ़ी तिराहे के पास कूड़े के ढेर देखकर खुद को शर्मिंदगी महसूस होती है। मगर नगरपालिका को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। - मधु कुमार, इंटरनेशनल डायरेक्टर, एलायंस क्लब
स्वच्छता सर्वेक्षण में शहर बरेली मंडल में सबसे पीछे है। फिर एक साल में 78 करोड़ रुपये कहां खर्च हो गए। शहर में सफाई व्यवस्था की नए सिरे से रणनीति बनाएं। अन्यथा आने वाले दिनों में हालत और बदतर होगी। - डॉ. लक्ष्मीकांत दीक्षित, सेवानिवृत चिकित्साधिकारी
अब तक यह समझ में नहीं आया कि सॉलिड वेस्ट प्लांट क्यों चालू नहीं हो पाया। आखिर शहर का कूड़ा डंपिंग ग्राउंड मे क्यों नहीं डाला जाता। नगरपालिका की सफाई व्यवस्था पूरी तरह चौपट है। - लक्ष्मीकांत शर्मा, सेवानिवृत प्रवक्ता

स्वच्छ सर्वेक्षण में बेहतर रैंकिंग के लिए नगरपालिका ने बड़े प्रयास किए। मगर डंपिंग ग्राउंड दूर होने और पाइप लाइन बिछने से मार्गों की टूटफूट में हम पिछड़ गए। लोगों में जागरुकता की भी कमी है। फिलहाल पिछली बार से सुधार हुआ है। आगे और भी अच्छा करने का प्रयास किया जाएगा। -विमला जायसवाल, अध्यक्ष, नगरपालिका परिषद
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