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जागरुकता बढ़ाने की जरुरत...तभी रुकेगा मानव-वन्यजीव संघर्ष
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पीलीभीत। जंगल से बाहर आए बाघों के बढ़ते हमलों को रोकने और उन्हें लोगों से बचाने के लिए जिला प्रशासन ने पहल की है। डीएम ने वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ बुलाई गई गोष्ठी में टाइगर रिजर्व प्रशासन और कृषि विभाग को मिलकर कार्ययोजना बनाने को कहा।
टाइगर रिजर्व प्रशासन की ओर से बाघ संरक्षण माह के तहत ‘मानव -वन्यजीव संघर्ष पर रोकथाम’ विषय पर शुक्रवार को गांधी प्रेक्षागृह में हुई जिला स्तरीय गोष्ठी में डीएम ने कहा कि इस संबंध में कृषि अधिकारियों से वार्ता हुई थी। जंगल से सटे एरिया में मैंथा की खेती की जा सकती हैं। इसे वन्यजीव भी नहीं खा सकते हैं। यह गन्ने की फसल से ज्यादा लाभदायक है। एक बार लगाने से चार-पांच साल तक की पैदावार की जा सकती है और जो ऑयल निकलता है उसकी मार्केट में बिक्री भी अच्छी है। गन्ने की फसल के तौर पर इन फसलों को भी लगाएं तो इससे किसानों की आय में वृद्धि तो होगी ही, साथ ही गन्ने की फसल में छिपने वाले बाघों से मुक्ति मिल सकेगी। उन्होंने पीटीआर और कृषि विभाग से संयुक्त कार्ययोजना तैयार करने को कहा।
गोष्ठी में टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर नवीन खंडेलवाल ने प्रोजेक्टर के माध्यम से टाइगर रिजर्व की भौगोलिक स्थिति से रूबरू कराया। उन्होंने बताया कि टाइगर रिजर्व के बाहर भी सोशल फारेस्ट्री में आठ से 10 बाघ रह रहे हैं। इसके बावजूद वहां कोई मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं नहीं हो रही है। जंगल का वातावरण अनुकूल होने के कारण बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है, यह एक गर्व की बात है, लेकिन इसके साथ ही कुछ समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ रहा है। बाघों पर निगरानी को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं की गई हैं। कहा कि बाघ, तेंदुआ और भालू जंगल से बाहर निकलते हैं और गन्ने के खेतों में ठहर जाते हैं। जब गन्ने की कटाई होती है तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं प्रकाश में आती है। जंगल किनारे के किसानों के लिए एक माइक्रो प्लान बनाकर उन्हें जागरूक किया गया था कि वे कटाई करते समय क्या सावधानियां बरतें। यही वजह है कि पिछले सालों के अपेक्षा एक दो साल से मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में काफी कमी आई है।
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वन एवं वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ संजीव कुमार ने मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रोकथाम के उपायों की जानकारी दी। कहा कि पर्यावरण निरंतर अनुकूल हो रहा है। वन्यजीवों की संख्या भी बढ़ रही है। अमरिया में 11-12 बाघ हैं। उन्हें यहां वातावरण बेहद अनुकूल मिला है। यहां मानव-वन्यजीव संघर्ष की भी घटनाएं देखने को नहीं मिली हैं। इन सबका मैनेजमेंट जनता के हाथ में हैं। अमरिया की जनता का भी पूरा सपोर्ट है। उन्होंने बचाव के तौर तरीके की जानकारी दी।
गोष्ठी में एसपी अभिषेक दीक्षित, सीडीओ रमेश चंद्र पांडेय, पीडी अनिल कुमार, डीआईओएस संतप्रकाश, बीएसए देवेंद्र स्वरूप, एआर कोआपरेटिव वीर विक्रम सिंह, ईओ निशा मिश्रा, एएसडीएम चंद्रभानु सिंह, एसडीओ प्रवीण खरे, रेंजर आरिफ जमाल, पर्यावरणविद् टीएच खान, परवेज हनीफ, अख्तर मियां, एसीएमओ डॉ. वीबीराम, डॉ. हरपाल सिंह आदि मौजूद रहे।
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टाइगर रिजर्व प्रशासन की ओर से बाघ संरक्षण माह के तहत ‘मानव -वन्यजीव संघर्ष पर रोकथाम’ विषय पर शुक्रवार को गांधी प्रेक्षागृह में हुई जिला स्तरीय गोष्ठी में डीएम ने कहा कि इस संबंध में कृषि अधिकारियों से वार्ता हुई थी। जंगल से सटे एरिया में मैंथा की खेती की जा सकती हैं। इसे वन्यजीव भी नहीं खा सकते हैं। यह गन्ने की फसल से ज्यादा लाभदायक है। एक बार लगाने से चार-पांच साल तक की पैदावार की जा सकती है और जो ऑयल निकलता है उसकी मार्केट में बिक्री भी अच्छी है। गन्ने की फसल के तौर पर इन फसलों को भी लगाएं तो इससे किसानों की आय में वृद्धि तो होगी ही, साथ ही गन्ने की फसल में छिपने वाले बाघों से मुक्ति मिल सकेगी। उन्होंने पीटीआर और कृषि विभाग से संयुक्त कार्ययोजना तैयार करने को कहा।
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गोष्ठी में टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर नवीन खंडेलवाल ने प्रोजेक्टर के माध्यम से टाइगर रिजर्व की भौगोलिक स्थिति से रूबरू कराया। उन्होंने बताया कि टाइगर रिजर्व के बाहर भी सोशल फारेस्ट्री में आठ से 10 बाघ रह रहे हैं। इसके बावजूद वहां कोई मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं नहीं हो रही है। जंगल का वातावरण अनुकूल होने के कारण बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है, यह एक गर्व की बात है, लेकिन इसके साथ ही कुछ समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ रहा है। बाघों पर निगरानी को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं की गई हैं। कहा कि बाघ, तेंदुआ और भालू जंगल से बाहर निकलते हैं और गन्ने के खेतों में ठहर जाते हैं। जब गन्ने की कटाई होती है तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं प्रकाश में आती है। जंगल किनारे के किसानों के लिए एक माइक्रो प्लान बनाकर उन्हें जागरूक किया गया था कि वे कटाई करते समय क्या सावधानियां बरतें। यही वजह है कि पिछले सालों के अपेक्षा एक दो साल से मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में काफी कमी आई है।
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वन एवं वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ संजीव कुमार ने मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रोकथाम के उपायों की जानकारी दी। कहा कि पर्यावरण निरंतर अनुकूल हो रहा है। वन्यजीवों की संख्या भी बढ़ रही है। अमरिया में 11-12 बाघ हैं। उन्हें यहां वातावरण बेहद अनुकूल मिला है। यहां मानव-वन्यजीव संघर्ष की भी घटनाएं देखने को नहीं मिली हैं। इन सबका मैनेजमेंट जनता के हाथ में हैं। अमरिया की जनता का भी पूरा सपोर्ट है। उन्होंने बचाव के तौर तरीके की जानकारी दी।
गोष्ठी में एसपी अभिषेक दीक्षित, सीडीओ रमेश चंद्र पांडेय, पीडी अनिल कुमार, डीआईओएस संतप्रकाश, बीएसए देवेंद्र स्वरूप, एआर कोआपरेटिव वीर विक्रम सिंह, ईओ निशा मिश्रा, एएसडीएम चंद्रभानु सिंह, एसडीओ प्रवीण खरे, रेंजर आरिफ जमाल, पर्यावरणविद् टीएच खान, परवेज हनीफ, अख्तर मियां, एसीएमओ डॉ. वीबीराम, डॉ. हरपाल सिंह आदि मौजूद रहे।