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बेटी की शादी है, इसलिए नेताजी को चाहिए सरकारी धान खरीद में पूरा हिस्सा
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पीलीभीत। सरकारी धान खरीद में करोड़ों के गोलमाल के खबरें अब तक दबी ढंकी थीं। अब इसकी परतें बाहर तक उधड़ने लगी हैं। किसानों से दलाल और माफिया ने औने-पौने में जो धान खरीदा, उससे हुई कमाई का हिस्सा नेताओं तक पहुंचाने के लिए द्वितीय शनिवार को अवकाश के दिन डिप्टी आरएमओ दफ्तर में क्रय एजेंसियों से जुड़े ठेकेदारों की गोपनीय मीटिंग बुलाई गई। बैठक में एक बड़े नेताजी की बेटी की शादी के लिए मोटी रकम में सबको हाथ ‘बंटाने’ के लिए कहा गया। यह सुनकर भड़के ठेकेदारों को धमका दिया गया कि आप लोग स्वयं नेताजी के घर जाकर हिसाब-किताब निपटा लें क्योंकि आपको कारोबार करना है और हमको नौकरी।
छुट्टी के दिन खुले टनकपुर हाईवे स्थित डिप्टी आरएमओ दफ्तर में दोपहर लगभग 12 बजे शुरू हुई इस मीटिंग की शुरुआत में साहब ने ठेकेदारों से कहा- ‘देखिए, नेताजी का बहुत दबाव है। उनके आदमी (बीसलपुर का एक खाद्यान्न माफिया, जो सपा सरकार में बड़े स्तर पर खाद्यान्न घोटाले में लिप्त था और उस पर बीसलपुर थाने में कई मुकदमे दर्ज हैं) का टेंडर भले ही 23 नवंबर से हुआ है, मगर गेहूं खरीद का बिल एक अक्टूबर से ही दिखाना है।’ ठेकेदार इस पर भड़क गए, बोले-‘यह कौन सी बात हुई, हम पहले आप सबको समझें (हिस्सा दें), फिर नेताजी के आदमियों को। धान खरीद में इतनी बचत तो होती नहीं है। उनके आदमी का 23 नवंबर को टेंडर हुआ। तबसे ही उसका हिस्सा रखें। अक्टूबर से हिस्सा नहीं दे पाएंगे।’
तुरंत ही एक क्रय एजेंसी के जिला प्रबंधक बोल उठे- ‘हम किस-किस को निपटाएं। बरखेड़ा में नेताजी की बेटी की शादी है। वह साफ कह चुके हैं कि धान सेंटरों में पूरा हिस्सा चाहिए। एक पैसा भी कम नहीं लेंगे क्योंकि शादी में पैसा बहुत लग रहा है।’ ठेकेदार बोले- यह तो नाजायज दबाया जा रहा है। हम किसी को इतना पैसा नहीं दे पाएंगे। तब तक साहब ने ठेकेदारों को समझाते हुए कहा-‘देखिए। सबको अपना कारोबार करना है। हमें अपनी नौकरी करनी है। तुम्हारा कारोबार न प्रभावित हो। हमारी नौकरी भी चलती रही। आप लोग नेताजी के दफ्तर में चले जाइए। वहां उनसे मिलकर बात कर लीजिए। हमें विवाद (साहब को) में विवाद मत डालिए।’ साहब के इसी उद्बोधन के साथ गोपनीय मीटिंग समाप्त हो गई।
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दो महीने पहले ही लक्ष्य पार कर गई धान खरीद
इस बार सरकारी धान खरीद का लक्ष्य 3.08 लाख मीट्रिक टन था। एक अक्तूबर से धान खरीद 147 सेंटरों पर शुरू हुई। सेंटर प्रभारियों ने अक्तूबर तक तो किसी भी सेेंटर पर किसान के धान का एक दाना भी नहीं खरीदा। तब तक किसान अपना अधिकतर धान आढ़तियों, दलालों और बिचौलियों को 1300 से 1400 रुपये प्रति क्विंतल खरीद लिया। बाद में वही धान सरकारी सेंटरों पर दूसरे किसानों के नाम से खरीदा दिखा दिया गया। राइस मिलर्स ने मंडियों में अपने आढ़तिये बैठा दिए। वह औने-पौने दामों में किसानों का धान खरीदते रहे क्योंकि सरकारी सेंटरों पर किसानों का धान अधिक नमी बताकर वापस किया जाता रहा। फिर वही धान संबद्ध राइस मिलों को चावल निकालने के लिए भेजा गया। अब उसी धान का चावल एफसीआई गोदाम में रखा जाना है। इस खेल में माफिया और दलालों को करोड़ों का फायदा हो गया।
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छुट्टी के दिन खुले टनकपुर हाईवे स्थित डिप्टी आरएमओ दफ्तर में दोपहर लगभग 12 बजे शुरू हुई इस मीटिंग की शुरुआत में साहब ने ठेकेदारों से कहा- ‘देखिए, नेताजी का बहुत दबाव है। उनके आदमी (बीसलपुर का एक खाद्यान्न माफिया, जो सपा सरकार में बड़े स्तर पर खाद्यान्न घोटाले में लिप्त था और उस पर बीसलपुर थाने में कई मुकदमे दर्ज हैं) का टेंडर भले ही 23 नवंबर से हुआ है, मगर गेहूं खरीद का बिल एक अक्टूबर से ही दिखाना है।’ ठेकेदार इस पर भड़क गए, बोले-‘यह कौन सी बात हुई, हम पहले आप सबको समझें (हिस्सा दें), फिर नेताजी के आदमियों को। धान खरीद में इतनी बचत तो होती नहीं है। उनके आदमी का 23 नवंबर को टेंडर हुआ। तबसे ही उसका हिस्सा रखें। अक्टूबर से हिस्सा नहीं दे पाएंगे।’
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तुरंत ही एक क्रय एजेंसी के जिला प्रबंधक बोल उठे- ‘हम किस-किस को निपटाएं। बरखेड़ा में नेताजी की बेटी की शादी है। वह साफ कह चुके हैं कि धान सेंटरों में पूरा हिस्सा चाहिए। एक पैसा भी कम नहीं लेंगे क्योंकि शादी में पैसा बहुत लग रहा है।’ ठेकेदार बोले- यह तो नाजायज दबाया जा रहा है। हम किसी को इतना पैसा नहीं दे पाएंगे। तब तक साहब ने ठेकेदारों को समझाते हुए कहा-‘देखिए। सबको अपना कारोबार करना है। हमें अपनी नौकरी करनी है। तुम्हारा कारोबार न प्रभावित हो। हमारी नौकरी भी चलती रही। आप लोग नेताजी के दफ्तर में चले जाइए। वहां उनसे मिलकर बात कर लीजिए। हमें विवाद (साहब को) में विवाद मत डालिए।’ साहब के इसी उद्बोधन के साथ गोपनीय मीटिंग समाप्त हो गई।
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दो महीने पहले ही लक्ष्य पार कर गई धान खरीद
इस बार सरकारी धान खरीद का लक्ष्य 3.08 लाख मीट्रिक टन था। एक अक्तूबर से धान खरीद 147 सेंटरों पर शुरू हुई। सेंटर प्रभारियों ने अक्तूबर तक तो किसी भी सेेंटर पर किसान के धान का एक दाना भी नहीं खरीदा। तब तक किसान अपना अधिकतर धान आढ़तियों, दलालों और बिचौलियों को 1300 से 1400 रुपये प्रति क्विंतल खरीद लिया। बाद में वही धान सरकारी सेंटरों पर दूसरे किसानों के नाम से खरीदा दिखा दिया गया। राइस मिलर्स ने मंडियों में अपने आढ़तिये बैठा दिए। वह औने-पौने दामों में किसानों का धान खरीदते रहे क्योंकि सरकारी सेंटरों पर किसानों का धान अधिक नमी बताकर वापस किया जाता रहा। फिर वही धान संबद्ध राइस मिलों को चावल निकालने के लिए भेजा गया। अब उसी धान का चावल एफसीआई गोदाम में रखा जाना है। इस खेल में माफिया और दलालों को करोड़ों का फायदा हो गया।