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Pilibhit News: पीटीआर में बाघ ही नहीं, दुर्लभ प्रजाति का वन्यजीव पैंगोलिन भी
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पीटीआर में मौजूद दुर्लभ वन्यजीव पैंगोलिन। स्रोत संस्था
पीलीभीत। पीलीभीत टाइगर रिजर्व न केवल बाघों बल्कि दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी से भी सुर्खियों में है। इसमें शेड्यूल वन में संरक्षित प्रजाति पैंगोलिन भी शामिल हैं। यह संकटग्रस्त वन्यजीव की श्रेणी में भी दर्ज है।
पीलीभीत का जंगल वैसे तो बेहतर जैव विविधता और बाघों की मौजूदगी के कारण ब्रिटिशकाल से प्रसिद्ध रहा है, लेकिन वर्ष 2014 में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद संरक्षण की दिशा में प्रयास तेज हुए हुए। इसके बाद बाघों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इस उपलब्धि पर पीटीआर प्रशासन को कई विश्व स्तरीय पुरस्कार भी मिले हैं।
पीटीआर के जंगल में बाघों के अलावा वन्यजीवों की कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां भी हैं। इसमें शेड्यूल वन श्रेणी का पैंगोलिन भी शामिल है। यह वन्यजीव बहुत कम दिखाई देता है। इसे सल्लू सांप और चींटीखोर के नाम से भी जाना जाता है।
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वन्यजीवों पर काम करने वाली संस्था टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद अख्तर मियां का कहना है कि विलुप्त श्रेणी में शामिल यह वन्यजीव आईयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर) के रेड डाटा बुक में संकटग्रस्त वन्यजीव की श्रेणी में दर्ज है।
यह भोजन के रूप में चींटी और दीमक को खाता है। इसकी मौजूदगी घने जंगलों में देखी जाती है। अभी तक हरिपुर, बराही और दियोरिया रेंज के जंगल में इसकी मौजूदगी देखी गई है। डीएफओ मनीष सिंह का कहना है कि पीटीआर में बाघ समेत वन्यजीवों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। यहां कई दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव भी हैं।
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत अधिक, तस्करी का बना रहता है खतरा
कई देशों में दवाएं बनाने और मांस के लिए पैंगोलिन की मांग अधिक रहती है। पैंगोलिन की त्वचा की ऊपरी शल्क कैरोटिन से बनी होती है। दवा बनाने के लिए भी इस वन्यजीव के शरीर का इस्तेमाल होता है। ऐसे में तस्करी की आशंका अधिक रहती है।
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पीलीभीत का जंगल वैसे तो बेहतर जैव विविधता और बाघों की मौजूदगी के कारण ब्रिटिशकाल से प्रसिद्ध रहा है, लेकिन वर्ष 2014 में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद संरक्षण की दिशा में प्रयास तेज हुए हुए। इसके बाद बाघों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इस उपलब्धि पर पीटीआर प्रशासन को कई विश्व स्तरीय पुरस्कार भी मिले हैं।
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पीटीआर के जंगल में बाघों के अलावा वन्यजीवों की कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां भी हैं। इसमें शेड्यूल वन श्रेणी का पैंगोलिन भी शामिल है। यह वन्यजीव बहुत कम दिखाई देता है। इसे सल्लू सांप और चींटीखोर के नाम से भी जाना जाता है।
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वन्यजीवों पर काम करने वाली संस्था टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद अख्तर मियां का कहना है कि विलुप्त श्रेणी में शामिल यह वन्यजीव आईयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर) के रेड डाटा बुक में संकटग्रस्त वन्यजीव की श्रेणी में दर्ज है।
यह भोजन के रूप में चींटी और दीमक को खाता है। इसकी मौजूदगी घने जंगलों में देखी जाती है। अभी तक हरिपुर, बराही और दियोरिया रेंज के जंगल में इसकी मौजूदगी देखी गई है। डीएफओ मनीष सिंह का कहना है कि पीटीआर में बाघ समेत वन्यजीवों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। यहां कई दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव भी हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत अधिक, तस्करी का बना रहता है खतरा
कई देशों में दवाएं बनाने और मांस के लिए पैंगोलिन की मांग अधिक रहती है। पैंगोलिन की त्वचा की ऊपरी शल्क कैरोटिन से बनी होती है। दवा बनाने के लिए भी इस वन्यजीव के शरीर का इस्तेमाल होता है। ऐसे में तस्करी की आशंका अधिक रहती है।