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नशे के खुराक के तौर पर नींद की गोलियों की बढ़ रही लत

Fri, 17 Jan 2020 01:47 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 17 Jan 2020 01:47 AM IST
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nasa
पीलीभीत। नींद की गोलियों की खपत तेजी से बढ़ रही है। दवा कारोबारियों के मुताबिक हर महीने जनपद में एक लाख से अधिक ऐसी गोलियां बिक रही हैं। वैसे तो इन गोलियों का सेवन बीमारी के दौरान नींद के लिए डाक्टरों की सलाह पर किया जा है। मगर, इन दिनों इनका सेवन नशे के तौर पर किया जा रहा है। बिक्री होने वाली गोलियों में से कितनी प्रतिशत नशे के लिए इस्तेमाल होती हैं, यह जांच का विषय है। हां इतना जरूर साफ है कि कुछ लोग तो नींद की गोलियों के इस कदर लती हो चुके हैं कि वे एक दिन में आठ से 10 गोलियां खाते हैं।
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खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जनपद के शहरी और ग्रामीण इलाकों में 850 पंजीकृत दवा व्यापारी हैं। इनमें कुछ मेडिकल स्टोर मालिक अपने थोड़े से फायदे के लिए डॉक्टर का पर्चा देखे बिना ही नशीली दवाएं अवैध रूप से बेच देते हैं। ‘शेड्यूल-एच वन’ के तहत नींद की गोलियां डॉक्टर के पर्चे के बिना और बिना बिल के नहीं बेची जा सकती हैं। ‘शेड्यूल-एच वन’ के तहत करीब 46 प्रकार की दवाएं आती हैं। जो नींद न आने समेत अन्य दर्द निवारक दवाओं के रूप में प्रयोग की जाती हैं, लेकिन पीलीभीत में युवा वर्ग इन दवाओं को नशे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। कुछ युवा तो आठ से 10 गोलियां खा लेते हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं कि ये गोलियां स्वास्थ्य के लिए किस कदर हानिकारक हैं। उधर, डाक्टरों का कहना है कि बहुत आवश्यक होने पर ही वह नींद की दवा लिखते हैं, अन्यथा इस तरह की दवाएं मरीज को देने से बचा जाता है।
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जिला अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक लंबे समय तक नींद की गोलियां लेने से याददाशत कमजोर हो जाती हैं। ये गोलियां नर्वस सिस्टम को कमजोर कर देती है। अत्याधिक मात्रा में इन गोलियों का सेवन करने से कोमा में जाने और हार्ट अटैक पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर और सिर दर्द की संभावना बढ़ जाती है। गर्भवती महिलाओं को ये गोलियां लेने से बचना चाहिए। इससे गर्भ में पल रहा शिशु गंभीर विकृतियों का शिकार हो सकता है।
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मानसिक रोग विभाग के काउंसलिंग सेंटर में कई ऐसे मरीज आते हैं जो दिनभर में नींद की आठ से 10 गोलियां खाते हैं। एक दिन में करीब 40 से 45 मरीजों की काउंसिलिंग हो रही है। काउंसिलिंग के बाद हालांकि इन मरीजों में काफी हद तक सुधार भी देखा जा रहा है। -डॉ. पीके मिश्रा, मानसिक रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल
जिला अस्पताल की ओपीडी में आने वाले ऐसे मरीजों को पहले तो सीधे काउंसिलिंग के लिए भेजा जाता है। अत्याधिक आवश्यकता होने पर ही मरीज की इस तरह की दवा दी जाती है। बिना चिकित्सीय सलाह के नींद की गोलियों जैसी दवाएं नहीं लेनी चाहिए। -डॉ. रमाकांत सागर, फिजिशियन, जिला अस्पताल

‘शेड्यूल-एच वन’ के तहत आने वाली दवाओं को बिना बिल के नहीं बेचा जा सकता है। मेडिकल स्टोर को इसका पूरा रिकॉर्ड रखना पड़ता है। यदि नियम का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित को नोटिस दिया जाता है। नोटिस का जवाब सही न मिलने पर लाइसेंस को निलंबित किया जाता है। -बबिता रानी, औषधि निरीक्षक
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