{"_id":"627c0b512dd7fa063626cb7a","slug":"narsing-day-pilibhit-news-bly484518990","type":"story","status":"publish","title_hn":"कोरोनाकाल में जब मरीज के करीब जाने से भी होता था परहेज तब नर्सें बनीं सहारा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कोरोनाकाल में जब मरीज के करीब जाने से भी होता था परहेज तब नर्सें बनीं सहारा
विज्ञापन
मरीजों के आवश्यक चेकअप करतीं नर्स। संवाद
- फोटो : PILIBHIT
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पीलीभीत। कोरोनाकाल में जब मरीजों के पास जाने से परहेज होता था तब नर्सें सहारा बनीं थीं। करीब जाकर न केवल नर्सों ने मरीजों को इंजेक्शन लगाए बल्कि भावनात्मक सहयोग भी दिया। विश्व नर्स दिवस के मौके पर सेवाभाव में जुटीं कुछ नर्सों ने अपने अनुभव साझा किए। यह ऐसी नर्स हैं जिनके कामकाज की सराहना उनके विभाग के चिकित्सक भी नहीं करते थकते। जिला महिला अस्पताल की चिकित्साधीक्षक डॉ. अनीता चौरसिया ने स्टाफ नर्स संदीप कौर की सेवाओं से सराहनीय मानते हुए उन्हें मैट्रन बनाया है। संदीप कौर ऐसी स्टाफ नर्स हैं, जिन्होंने चार महीने के अपने बच्चे की परवाह भी नहीं की बल्कि मरीजों पर ध्यान दिया। उनकी इन सेवाओं की अब भी मिसाल दी जाती है।
-
मरीज की संतुष्टि ही है मेरे लिए बड़ा सम्मान : गीता सविता
ललितहरि राजकीय आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज की मैट्रन गीता सविता बताती हैं कि नर्सिंग के पेेशे में सेवाभाव लेकर तो सभी आते हैं लेकिन असली सुकून तब मिलता है जब वास्तव में किसी की जान बच जाए। वे बतातीं हैं कि करीब 23 वर्ष पहले वह गुुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में थीं। एक मरीज आया, उसे देखा तो ऐसा लग रहा था कि जान चली गई है। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर को बताया। डॉक्टर बोले- मरीज में कुछ नहीं है। इस पर मैंने कहा- नहीं एक कोशिश तो की जानी चाहिए। डॉक्टर ने जीवन रक्षक दवाएं दी और कुछ ही देर में मरीज को छींक आई। मरीज की सांस लौट आई। वह घटनाक्रम मुझे आज भी संतोष देता है। मेरी नजर में मरीज का ठीक होना ही मेरा पुरस्कार है।
-
सेवा का व्रत तभी होता है जब किसी की जान बच जाए : शालिनी
ललितहरि राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्टाफ नर्स शालिनी बतातीं हैं कि नौ वर्ष के सेवाकाल में उन्हें एक मौका ऐसा मिला जब उन्हें बड़ी संतुष्टि का एहसास हुआ। एक प्रसव पीड़ित महिला आई, उसकी हालत बड़ी गंभीर थी लेकिन कोई चिकित्सक उस वक्त नहीं था। मैंने अपने अनुभव के आधार पर डिलीवरी कराई और जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ रहे। इस कार्य में दूसरे स्टाफ ने भी सहयोग दिया लेकिन जब जब मैं उस दिन को याद करती हूं तो लगता है कि स्टाफ नर्स बनकर मैंने सेवा का जो व्रत लिया था, उसे पूरा करने में सफल रही।
विज्ञापन
-
निशा वर्मा संक्रमित हुईं पर सेवा का संकल्प नहीं पड़ा कमजोर
वक्त ऐसा था जब निशा वर्मा के घर वाले भी डर रहे थे और ड्यूटी में खुद का बचाव रखने की सीख दे रहे थे लेकिन कोरोना संक्रमित का इलाज तो उनके करीब जाकर ही होता है। कोरोना संक्रमित मरीजों को भावनात्मक सपोर्ट की भी जरूरत पड़ती है और इस मौके पर जब डॉक्टर मरीज के पास जाने से डर रहे हों तो स्टाफ नर्स की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ऐसे में महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स निशा वर्मा ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। कोरोना संक्रमित होने के बाद ठीक हुईं तो फिर से ड्यूटी पर आईं। उन महिलाओं की सफलता पूर्वक डिलीवरी कराई जो कोरोना संक्रमित होकर आईं थीं। निशा कहती हैं कि खुद को खतरे में डालकर जब ड्यूटी की तब पता लगा कि मरीजों को हमारी कितनी जरूरत है। यही अनुभव उनके लिए अब गर्व का विषय है।
-
हमें तो रोज मिलता है सेवा करने का अवसर : शिखा
जिला महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स शिखा कहती हैं-लोग सामाजिक कार्य के लिए अवसर तलाशते हैं लेकिन हमें तो हर रोज यह अवसर मिलता है। वह खुद को भाग्यशाली मानती हैं। शिखा बताती हैं कि कोरोनाकाल में जब वाहन भी नहीं चल रहे थे वह दो किलोमीटर पैदल चलकर आती थीं और अपनी जिम्मेदारी निभाती थीं। सबसे ज्यादा संतुष्टि तब मिली जब कोरोना संक्रमित होकर आईं महिलाओं के सुरक्षित प्रसव कराए और जच्चा बच्चा दोनों की जान बची। उन्होंने कहा कि उन्हें बेशक अभी कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मरीज के चेहरे की मुस्कराहट उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
विज्ञापन
-
मरीज की संतुष्टि ही है मेरे लिए बड़ा सम्मान : गीता सविता
ललितहरि राजकीय आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज की मैट्रन गीता सविता बताती हैं कि नर्सिंग के पेेशे में सेवाभाव लेकर तो सभी आते हैं लेकिन असली सुकून तब मिलता है जब वास्तव में किसी की जान बच जाए। वे बतातीं हैं कि करीब 23 वर्ष पहले वह गुुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में थीं। एक मरीज आया, उसे देखा तो ऐसा लग रहा था कि जान चली गई है। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर को बताया। डॉक्टर बोले- मरीज में कुछ नहीं है। इस पर मैंने कहा- नहीं एक कोशिश तो की जानी चाहिए। डॉक्टर ने जीवन रक्षक दवाएं दी और कुछ ही देर में मरीज को छींक आई। मरीज की सांस लौट आई। वह घटनाक्रम मुझे आज भी संतोष देता है। मेरी नजर में मरीज का ठीक होना ही मेरा पुरस्कार है।
विज्ञापन
-
सेवा का व्रत तभी होता है जब किसी की जान बच जाए : शालिनी
ललितहरि राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्टाफ नर्स शालिनी बतातीं हैं कि नौ वर्ष के सेवाकाल में उन्हें एक मौका ऐसा मिला जब उन्हें बड़ी संतुष्टि का एहसास हुआ। एक प्रसव पीड़ित महिला आई, उसकी हालत बड़ी गंभीर थी लेकिन कोई चिकित्सक उस वक्त नहीं था। मैंने अपने अनुभव के आधार पर डिलीवरी कराई और जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ रहे। इस कार्य में दूसरे स्टाफ ने भी सहयोग दिया लेकिन जब जब मैं उस दिन को याद करती हूं तो लगता है कि स्टाफ नर्स बनकर मैंने सेवा का जो व्रत लिया था, उसे पूरा करने में सफल रही।
विज्ञापन
-
निशा वर्मा संक्रमित हुईं पर सेवा का संकल्प नहीं पड़ा कमजोर
वक्त ऐसा था जब निशा वर्मा के घर वाले भी डर रहे थे और ड्यूटी में खुद का बचाव रखने की सीख दे रहे थे लेकिन कोरोना संक्रमित का इलाज तो उनके करीब जाकर ही होता है। कोरोना संक्रमित मरीजों को भावनात्मक सपोर्ट की भी जरूरत पड़ती है और इस मौके पर जब डॉक्टर मरीज के पास जाने से डर रहे हों तो स्टाफ नर्स की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ऐसे में महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स निशा वर्मा ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। कोरोना संक्रमित होने के बाद ठीक हुईं तो फिर से ड्यूटी पर आईं। उन महिलाओं की सफलता पूर्वक डिलीवरी कराई जो कोरोना संक्रमित होकर आईं थीं। निशा कहती हैं कि खुद को खतरे में डालकर जब ड्यूटी की तब पता लगा कि मरीजों को हमारी कितनी जरूरत है। यही अनुभव उनके लिए अब गर्व का विषय है।
-
हमें तो रोज मिलता है सेवा करने का अवसर : शिखा
जिला महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स शिखा कहती हैं-लोग सामाजिक कार्य के लिए अवसर तलाशते हैं लेकिन हमें तो हर रोज यह अवसर मिलता है। वह खुद को भाग्यशाली मानती हैं। शिखा बताती हैं कि कोरोनाकाल में जब वाहन भी नहीं चल रहे थे वह दो किलोमीटर पैदल चलकर आती थीं और अपनी जिम्मेदारी निभाती थीं। सबसे ज्यादा संतुष्टि तब मिली जब कोरोना संक्रमित होकर आईं महिलाओं के सुरक्षित प्रसव कराए और जच्चा बच्चा दोनों की जान बची। उन्होंने कहा कि उन्हें बेशक अभी कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मरीज के चेहरे की मुस्कराहट उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।