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आचमन करने लायक भी बनी बचा देवहा और गोमती नदियों का जल
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पीलीभीत। मकर संक्रांति खिचड़ी भोज के साथ संपन्न हो गई। मगर, इस पर्व पर श्रद्धालु देवहा या गोमती नदी के स्वच्छ जल में मन मुताबिक स्नान नहीं कर पाए। गंगा स्नान करने से विशेष पुण्य मिलता है। पीलीभीत में गंगा की सहायक नदियों देवहुति गंगा (देवहा) और गोमती नदियों में अमावस्या या पूर्णिमा को स्नान करने की परंपरा जरूर है, लेकिन दोनों नदियों का पानी पीने की छोड़ों, स्नान करने लायक भी नहीं बचा है।
नमामि गंगे परियोजना भी इन दोनों नदियों को प्रदूषण से छुटकारा नहीं दिला पाई। देवहा और गोमती में पानी के टीडीसी की मात्रा सामान्य से दोगुने स्तर पर पहुंच चुकी है। गोमती नदी के रकबे में शाहजहांपुर बॉर्डर तक खेती हो रही है। दोनों नदियों के प्रदूषणयुक्त जल में स्नान करने का मतलब बीमारियों को बढ़ावा देना है। उत्तराखंड के पहाड़ों से निकलकर तराई में बहने वाली देवहा (देवहुति गंगा) पीलीभीत, बीसलपुर, शाहजहांपुर होते हुए ढाई घाट पर गंगा में विलीन हो जाती है। देवहा नदी के जल की स्वच्छता गंगा को सीधे प्रभावित करती है। यह गंगा की सहायक नदी है। देवहा नदी में शहर के छह नालों के अलावा घरेलू और कारखानों का प्रदूषित जल भी पहुंचता है। कूड़ा, प्लास्टिक कचरा, मेडिकल कचरा और अन्य अपशिष्ट भी देवहा और गोमती नदियों में समा जाता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से देवहा और गोमती नदियों में कहने को हर महीने पानी के नमूने लेकर उनका परीक्षण कराया जाता है। उसकी जांच रिपोर्ट भी ओके आती है, लेकिन जब सामने देखो तो देवहा या गोमती नदियों का पानी किसी नाले या नाली जैसा दिखता है। अब तक दोनों नदियों को जल प्रदूषण से बचाने के लिए प्रयास नहीं किए गए।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गोमती और देवहा नदियों से पानी के नमूने लेकर उनका परीक्षण किया तो उसमें टीडीएस से लेकर अन्य पैरामीटर्स पर नदियों का पानी उतना प्रदूषित नहीं पाया गया, जितना प्रदूषित दिखता है। पीसीबी ने देवहा नदी से पानी के नमूने पांच अक्टूबर, सात नवंबर और छह दिसंबर 2019 को लिए थे। इन तारीखों में ही पीसीबी की ओर से गोमती नदी से पानी के नमूने पूरनपुर (माधोटांडा) से लिए गए थे।
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शहर में पानी निकास की व्यवस्था को 29 छोटे बड़े नाले हैं। नगरपालिका द्वारा इन सभी नालों का गंदा पानी और अपशिष्ट छह बड़े नालों के माध्यम से बिना शोधन किए ही देवहुति गंगा नदी (देवहा) में वर्षों से बहाया जा रहा है। मौजूदा स्थिति यह है कि देवहुति गंगा का पानी निर्मल होने के बजाए काला पड़ता जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंदे पानी और अपशिष्ट से देवहा नदी तो प्रदूषित हो ही रही है, साथ ही भूगर्भ जल के प्रदूषित होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
देवहा करीब 122 किमी का लंबा सफर तय करने के बाद शाहजहांपुर के ढाई घाट पर जाकर गंगा नदी में विलीन होती है। ऐसे में रोजाना लाखों लीटर गंदा पानी व अपशिष्ट को अपने साथ समेटे देवहा नदी उस पवित्र गंगा नदी को और भी प्रदूषित करती जा रही है, जबकि मोदी सरकार नमामि गंगे प्रोजेक्ट के माध्यम से करोड़ों खर्च कर रही है।
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नमामि गंगे परियोजना भी इन दोनों नदियों को प्रदूषण से छुटकारा नहीं दिला पाई। देवहा और गोमती में पानी के टीडीसी की मात्रा सामान्य से दोगुने स्तर पर पहुंच चुकी है। गोमती नदी के रकबे में शाहजहांपुर बॉर्डर तक खेती हो रही है। दोनों नदियों के प्रदूषणयुक्त जल में स्नान करने का मतलब बीमारियों को बढ़ावा देना है। उत्तराखंड के पहाड़ों से निकलकर तराई में बहने वाली देवहा (देवहुति गंगा) पीलीभीत, बीसलपुर, शाहजहांपुर होते हुए ढाई घाट पर गंगा में विलीन हो जाती है। देवहा नदी के जल की स्वच्छता गंगा को सीधे प्रभावित करती है। यह गंगा की सहायक नदी है। देवहा नदी में शहर के छह नालों के अलावा घरेलू और कारखानों का प्रदूषित जल भी पहुंचता है। कूड़ा, प्लास्टिक कचरा, मेडिकल कचरा और अन्य अपशिष्ट भी देवहा और गोमती नदियों में समा जाता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से देवहा और गोमती नदियों में कहने को हर महीने पानी के नमूने लेकर उनका परीक्षण कराया जाता है। उसकी जांच रिपोर्ट भी ओके आती है, लेकिन जब सामने देखो तो देवहा या गोमती नदियों का पानी किसी नाले या नाली जैसा दिखता है। अब तक दोनों नदियों को जल प्रदूषण से बचाने के लिए प्रयास नहीं किए गए।
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गोमती और देवहा नदियों से पानी के नमूने लेकर उनका परीक्षण किया तो उसमें टीडीएस से लेकर अन्य पैरामीटर्स पर नदियों का पानी उतना प्रदूषित नहीं पाया गया, जितना प्रदूषित दिखता है। पीसीबी ने देवहा नदी से पानी के नमूने पांच अक्टूबर, सात नवंबर और छह दिसंबर 2019 को लिए थे। इन तारीखों में ही पीसीबी की ओर से गोमती नदी से पानी के नमूने पूरनपुर (माधोटांडा) से लिए गए थे।
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शहर में पानी निकास की व्यवस्था को 29 छोटे बड़े नाले हैं। नगरपालिका द्वारा इन सभी नालों का गंदा पानी और अपशिष्ट छह बड़े नालों के माध्यम से बिना शोधन किए ही देवहुति गंगा नदी (देवहा) में वर्षों से बहाया जा रहा है। मौजूदा स्थिति यह है कि देवहुति गंगा का पानी निर्मल होने के बजाए काला पड़ता जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंदे पानी और अपशिष्ट से देवहा नदी तो प्रदूषित हो ही रही है, साथ ही भूगर्भ जल के प्रदूषित होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
देवहा करीब 122 किमी का लंबा सफर तय करने के बाद शाहजहांपुर के ढाई घाट पर जाकर गंगा नदी में विलीन होती है। ऐसे में रोजाना लाखों लीटर गंदा पानी व अपशिष्ट को अपने साथ समेटे देवहा नदी उस पवित्र गंगा नदी को और भी प्रदूषित करती जा रही है, जबकि मोदी सरकार नमामि गंगे प्रोजेक्ट के माध्यम से करोड़ों खर्च कर रही है।