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पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र-भाजपा को चुनौती दे रही सपा, बसपा और कांग्रेस मुकाबले को तैयार 17-13-35
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पीलीभीत। शहर सीट की चुनावी तस्वीर में बहुत कुछ बदला हुआ है। भाजपा को छोड़कर सभी के उम्मीदवार बदले हुए हैं पर जाति और धर्म के आधार पर मतों का ध्रुवीकरण एक बार फिर सबके सामने है। भाजपा को सपा की चुनौती मिल रही है। जबकि बससा और कांग्रेस भी मुकाबले को तैयार है।
वर्ष 2017 के चुनाव में पीलीभीत सदर सीट भाजपा ने जीती थी। संजय गंगवार विधायक बने थे। सपा के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री हाजी रियाज अहमद दूसरे नंबर पर थे। हाजी रियाज अहमद अब दिवंगत हैं। बेटे शाने अली सपा से टिकट मांग रहे थे न मिलने पर बागी हो गए। बसपा के उम्मीदवार हैं। सपा ने डा. शैलेंद्र गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस से शकील नूरी लड़ रहे हैं। सपा के लिए बसपा उम्मीदवार की चुनौती है। भाजपा के लिए किसान आंदोलन से पैदा हुए हालात मुश्किल खड़ी कर रहे हैं। इससे निपटने के लिए हिंदुत्व को हवा दी गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 30 दिसंबर को आ चुके हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रोड शो कर चुके हैं। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की तैयारी है। मुस्लिम मतों पर सपा की सबसे मजबूत दावेदारी है। बसपा और कांग्रेस के उम्मीदवार इसमें बंटवारा करके सपा के लिए चुनौती पैदा कर रहे हैं। स्थानीय मुद्दों में सड़कों की खराब स्थिति, रोजगार के अवसरों की कमी उच्च शिक्षा के लिए सरकारी संस्थानों का अभाव, सरकारी चिकित्सा सेवाओं का बुरा हाल होना है। युवाओं और महिलाओं के साथ साथ प्रबुद्ध वर्ग ने इन मुद्दों को अलग-अलग बातचीत में उठाया है। एक और मुद्दा उठा जो यह कि राजनीतिक खींचतान में विकास अटका है। लेकिन चुनाव में जाति और धर्म के आधार पर मतों का बंटवारा निर्णायक साबित होने के आसार हैं। इस चुनाव में भाजपा और सपा के उम्मीदवार आमने-सामने हैं। बसपा और कांग्रेस मुकाबले के लिए तैयार है। सियासी दिग्गज रियाज अहमद के बेटे शाने अली अबकी बार पिता की विरासत और बसपा के परंपरागत मतदाता के सहारे आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।
वहीं सपा उम्मीदवार डा. शैलेंद्र गंगवार ने जातिगत मतों से भी भाजपा को चुनौती दी है। जवाब में धार्मिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण को हवा दी जा रही है। कांग्रेस और बसपा के उम्मीदवार मुकाबले के लिए तैयार हैं। मुकाबला रोचक होने के आसार हैं।
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बसपा का खाता नहीं खुला, कांग्रेस ने छह बार जीत हासिल की
पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र के अतीत पर गौर करें तो सबसे अधिक चार बार विधायक पद पर हाजी रियाज अहमद रहे। 1989 में वह निर्दलीय जीते थे। सपा से 2002, 2007 व 2012 में जीत हासिल की। बसपा का कभी खाता नहीं खुल सका। अबकी बार बसपा ने हाजी रियाज के बेटे शाने अली को उम्मीदवार बनाया है। भाजपा से बीके गुप्ता तीन बार विधायक रहे। बीके गुप्ता 1991, 1993, 2000 में विधायक रहे। भाजपा की राजराय सिंह 1996 में विधायक रहीं। कांग्रेस से 1952 में मकसूद आलम खान, 1957 में निरंजन सिंह, 1962 में रामस्वरूप सिंह, 1969 में अली जहीर, 1980 में चरन जीत सिंह, 1985 में सय्यद अली अशरफी विधायक रहे। भारतीय जनसंघ से 1967 में बीराम विधायक रहे।
पीलीभीत-
कुल मतदाता-375568
पुरुष-198958
महिला-176587
अन्य-23
----------------------
जाति - मतदाता
कुर्मी - 68,000
लोधी - 28,000
सिख - 12,000
कश्यप - 18,000
मौर्य - 15,000
शर्मा - 5000
ब्राह्मण - 8000
बनिया - 6,000
कायस्थ - 10,000
अनुसूचित जाति-20,000
राठौर - 10,000
ठाकुर - 15,000
मुस्लिम - 1.40,000
अन्य - 10000
पिछले चुनाव का परिणाम
संजय गंगवार, भाजपा, 136486 मत प्रतिशत 54.59
हाजी रियाज अहमद, सपा 93130 -------37.25
अरशद खां, बसपा, 14532---5.81 प्रतिशत
अपने मुद्दों पर मुखर हैं मतदाता
पीलीभीत। मतदान के वक्त मुद्दे कितने प्रभावी होंगे? यह सवाल सबके सामने है। जतिगत और धर्म के आधार पर मत बंटने का अंदेशा सामने है लेकिन इसके बावजूद तमाम लोग अपने मुद्दों पर मुखर हैं। अपनी बात को कुछ इस तरह से रख रहे हैं कि मुद्दे भी उठ जाएं और पसंद की पार्टी को मतदान हो जाए। जैसे शिक्षक अनीता तिवारी ने कहा कि बेशक महिला शिक्षकों की अपनी समस्या हैं और पुरानी पेंशन का मुद्दा हम सबके सामने है लेकिन राष्ट्रहित के आधार पर वह अपने मत का फैसला लेंगी। मरोरी ब्लॉक के टंडोला की शिक्षामित्र पूजा रानी ने कहा- उनके सपनों में फिर से शिक्षक बनना है। वह अपने मुद्दे को सामने रखकर ही फैसला लेंगी।
व्यापारी वर्ग पर कोरोना महामारी का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है। सभी अब तक उससे उबर नहीं पाए हैं। टैक्सेशन की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। इन मुद्दों पर किस दल ने क्या कहा है? इसी पर गौर कर रहे हैं।
कमलजीत सिंह, व्यापारी
युवाओं के लिए आज के समय में सबसे बड़ा मुद्दा बेहतर शिक्षा व रोजगार है। वायदे तो किए जा रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। चुनौतियों से निबटने के प्रति कौन अधिक गंभीर है। इसे हम देखेंगे? तब अपने मत का फैसला लेंगे।
प्रबल महातिया, युवा
किसान की स्थिति बीते सालों से गड़बड़ा रही है। इस ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है। किसान मौसम की मार भी झेल रहा है। राजनीतिक दलों ने हमारे मुद्दों पर गौर नहीं किया। अबकी बार यह हमारे लिए एक मु्द्दा है।
सुखदीप सिंह लाडी, किसान
शहर में न ही बेहतर शिक्षण संस्थान हैं, न ही बेहतर रोजगार के अवसर। शहर के युवा बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं लेकिन चुनाव से यह मुद्दा गायब है। जबकि यह एक गम्भीर विषय है।
अली सलमानी, युवा
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वर्ष 2017 के चुनाव में पीलीभीत सदर सीट भाजपा ने जीती थी। संजय गंगवार विधायक बने थे। सपा के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री हाजी रियाज अहमद दूसरे नंबर पर थे। हाजी रियाज अहमद अब दिवंगत हैं। बेटे शाने अली सपा से टिकट मांग रहे थे न मिलने पर बागी हो गए। बसपा के उम्मीदवार हैं। सपा ने डा. शैलेंद्र गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस से शकील नूरी लड़ रहे हैं। सपा के लिए बसपा उम्मीदवार की चुनौती है। भाजपा के लिए किसान आंदोलन से पैदा हुए हालात मुश्किल खड़ी कर रहे हैं। इससे निपटने के लिए हिंदुत्व को हवा दी गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 30 दिसंबर को आ चुके हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रोड शो कर चुके हैं। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की तैयारी है। मुस्लिम मतों पर सपा की सबसे मजबूत दावेदारी है। बसपा और कांग्रेस के उम्मीदवार इसमें बंटवारा करके सपा के लिए चुनौती पैदा कर रहे हैं। स्थानीय मुद्दों में सड़कों की खराब स्थिति, रोजगार के अवसरों की कमी उच्च शिक्षा के लिए सरकारी संस्थानों का अभाव, सरकारी चिकित्सा सेवाओं का बुरा हाल होना है। युवाओं और महिलाओं के साथ साथ प्रबुद्ध वर्ग ने इन मुद्दों को अलग-अलग बातचीत में उठाया है। एक और मुद्दा उठा जो यह कि राजनीतिक खींचतान में विकास अटका है। लेकिन चुनाव में जाति और धर्म के आधार पर मतों का बंटवारा निर्णायक साबित होने के आसार हैं। इस चुनाव में भाजपा और सपा के उम्मीदवार आमने-सामने हैं। बसपा और कांग्रेस मुकाबले के लिए तैयार है। सियासी दिग्गज रियाज अहमद के बेटे शाने अली अबकी बार पिता की विरासत और बसपा के परंपरागत मतदाता के सहारे आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।
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वहीं सपा उम्मीदवार डा. शैलेंद्र गंगवार ने जातिगत मतों से भी भाजपा को चुनौती दी है। जवाब में धार्मिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण को हवा दी जा रही है। कांग्रेस और बसपा के उम्मीदवार मुकाबले के लिए तैयार हैं। मुकाबला रोचक होने के आसार हैं।
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बसपा का खाता नहीं खुला, कांग्रेस ने छह बार जीत हासिल की
पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र के अतीत पर गौर करें तो सबसे अधिक चार बार विधायक पद पर हाजी रियाज अहमद रहे। 1989 में वह निर्दलीय जीते थे। सपा से 2002, 2007 व 2012 में जीत हासिल की। बसपा का कभी खाता नहीं खुल सका। अबकी बार बसपा ने हाजी रियाज के बेटे शाने अली को उम्मीदवार बनाया है। भाजपा से बीके गुप्ता तीन बार विधायक रहे। बीके गुप्ता 1991, 1993, 2000 में विधायक रहे। भाजपा की राजराय सिंह 1996 में विधायक रहीं। कांग्रेस से 1952 में मकसूद आलम खान, 1957 में निरंजन सिंह, 1962 में रामस्वरूप सिंह, 1969 में अली जहीर, 1980 में चरन जीत सिंह, 1985 में सय्यद अली अशरफी विधायक रहे। भारतीय जनसंघ से 1967 में बीराम विधायक रहे।
पीलीभीत-
कुल मतदाता-375568
पुरुष-198958
महिला-176587
अन्य-23
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जाति - मतदाता
कुर्मी - 68,000
लोधी - 28,000
सिख - 12,000
कश्यप - 18,000
मौर्य - 15,000
शर्मा - 5000
ब्राह्मण - 8000
बनिया - 6,000
कायस्थ - 10,000
अनुसूचित जाति-20,000
राठौर - 10,000
ठाकुर - 15,000
मुस्लिम - 1.40,000
अन्य - 10000
पिछले चुनाव का परिणाम
संजय गंगवार, भाजपा, 136486 मत प्रतिशत 54.59
हाजी रियाज अहमद, सपा 93130 -------37.25
अरशद खां, बसपा, 14532---5.81 प्रतिशत
अपने मुद्दों पर मुखर हैं मतदाता
पीलीभीत। मतदान के वक्त मुद्दे कितने प्रभावी होंगे? यह सवाल सबके सामने है। जतिगत और धर्म के आधार पर मत बंटने का अंदेशा सामने है लेकिन इसके बावजूद तमाम लोग अपने मुद्दों पर मुखर हैं। अपनी बात को कुछ इस तरह से रख रहे हैं कि मुद्दे भी उठ जाएं और पसंद की पार्टी को मतदान हो जाए। जैसे शिक्षक अनीता तिवारी ने कहा कि बेशक महिला शिक्षकों की अपनी समस्या हैं और पुरानी पेंशन का मुद्दा हम सबके सामने है लेकिन राष्ट्रहित के आधार पर वह अपने मत का फैसला लेंगी। मरोरी ब्लॉक के टंडोला की शिक्षामित्र पूजा रानी ने कहा- उनके सपनों में फिर से शिक्षक बनना है। वह अपने मुद्दे को सामने रखकर ही फैसला लेंगी।
व्यापारी वर्ग पर कोरोना महामारी का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है। सभी अब तक उससे उबर नहीं पाए हैं। टैक्सेशन की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। इन मुद्दों पर किस दल ने क्या कहा है? इसी पर गौर कर रहे हैं।
कमलजीत सिंह, व्यापारी
युवाओं के लिए आज के समय में सबसे बड़ा मुद्दा बेहतर शिक्षा व रोजगार है। वायदे तो किए जा रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। चुनौतियों से निबटने के प्रति कौन अधिक गंभीर है। इसे हम देखेंगे? तब अपने मत का फैसला लेंगे।
प्रबल महातिया, युवा
किसान की स्थिति बीते सालों से गड़बड़ा रही है। इस ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है। किसान मौसम की मार भी झेल रहा है। राजनीतिक दलों ने हमारे मुद्दों पर गौर नहीं किया। अबकी बार यह हमारे लिए एक मु्द्दा है।
सुखदीप सिंह लाडी, किसान
शहर में न ही बेहतर शिक्षण संस्थान हैं, न ही बेहतर रोजगार के अवसर। शहर के युवा बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं लेकिन चुनाव से यह मुद्दा गायब है। जबकि यह एक गम्भीर विषय है।
अली सलमानी, युवा