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दवा कंपनी-डॉक्टर गठजोड़ से टूटी मरीजों की कमर
अमर उजाला ब्यूरो पीलीभीत।
Updated Wed, 01 Nov 2017 10:24 PM IST
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दवा कंपनी-डॉक्टर गठजोड़ से टूटी मरीजों की कमर
सरकारी अस्पतालों के साथ नर्सिंग होम में बड़े पैमाने पर हो रहा खेल
फार्मूूले में बदलाव कर महंगे दामों में बेंच रहे हैं दवाएं
आठ सौ से ज्यादा दवाएं हैं मूल्य नियंत्रण के दायरे में
दवा कंपनी-डॉक्टर गठजोड़ के चलते मरीजों को सस्ती दवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार ने लोगों को सस्ते रेट में दवा उपलब्ध कराने को हृदय रोग, कैंसर, मिर्गी समेत कई बीमारियों की दवाओं को ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) में शामिल किया है। शुरूआती दौर में इससे दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश तो लगा, लेकिन बाद में दवा कंपनियों ने फार्मूले में बदलाव कर नया खेल शुरू कर दिया। इस खेल में डॉक्टरों को भी शामिल किया गया, ताकि मनमाने दामों में दवाएं बेंची जा सके।
सरकार आम लोगों के लिए दवाइयां सस्ती रखने के लिए 800 से ज्यादा दवाइयों को मूल्य नियंत्रण के दायरे में ला चुकी है। ड्रग प्राइस रेगुलेटर एनपीपीए ने दवाइयों के दाम में 4.8 फीसदी से 23.3 फीसदी तक कमी की है। इसके तहत पैरासिटामॉल, सिफोड्रोक्सिन, सेल्ब्युटामॉल व कैफेजोलिन जैसी एंटी बायोटिक्स को भी मूल्य नियंत्रण के दायरे में शामिल किया गया। इससे काफी हद तक दवा कंपनियों के मनमाने दामों पर दवा बेचने का एकाधिकार टूट गया, लेकिन यह सबकुछ ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। दवा कंपनियों ने इस बंदिश से आजाद होने का नया तरीका ढूंढ निकाला। कंपनियों ने डीपीसीओ में शामिल दवाओं के साल्ट के साथ दवा बनाने में ऐसे साल्ट इस्तेमाल करने शुरू कर दिए जो डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं। इस तरह उनकी दवा मूल्य नियंत्रण दायरे से बाहर हो गई। बाजार में एक ही फार्मूले की दवाएं अलग-अलग रेट पर मौजूद हैं। खास बात यह है कि अंजान मरीज भी वहीं दवाएं खरीदते हैं जो डॉक्टर लिखते हैं। दवाओं के लिखने के पीछे बड़े पैमाने पर कमिशन का खेल होता है। इस खेल में सरकारी अस्पतालों के अलावा नर्सिंग होम के डॉक्टर बड़े पैमाने पर शामिल हैं। डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाओं को खरीदने के लिए मरीज के तीमारदार विवश हैं।
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यह हैं दवाएं जिनमें होता है खेल
दवा सामान्य दाम फार्मूला बदलने पर बढ़े दाम
पैरासिटामोल 1.00 रुपये 5.00 रुपये
सिफेकज्मि 7.00 रुपये 14.00 रुपये
सेलब्युटामॉल 9.00 रुपये 55.00 रुपये
सेट्राजिन श 0.75 पैसे 7.00 रुपये
मेट्राजिल 7.00 रुपये 38.00 रुपये
डेक्सा 20.00 रुपये 120 रुपये
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ऐसे होता है खेल
डीपीसीओ में दर्ज दवाओं के दाम सरकार के नियंत्रण में रहते हैं। इन दवाओं के दाम बिना अनुमति नहीं बढ़ाए जा सकते। इन दवाओं को मनमाने दामों पर बेचने के लिए इनके फार्मूले में बदलाव कर नई दवा के तौर पर लांच कर दिया जाता है। सरकार का कॉबिनेशन वाली दवाओं पर नियंत्रण नहीं है। ऐसे में इस खेल को रोकने में सरकार भी नाकाम है। मसलन बुखार के लिए पैरासिटोमॉल की गोली एक रुपये में मिलती है, लेकिन इसमें एसीक्लोफिनेक का साल्ट बढ़ाकर यह गोली पांच रुपये में बेची जा रही है।
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ब्रॉड नेम से ही लिखते हैं दवा
दवा कंपनियों के इस खेल में डॉक्टर भी शामिल हैं। सरकार द्वारा डॉक्टरों को फार्मूले के नाम से दवा लिखने को कहा गया है लेकिन डाक्टर ऐसा न करके ब्रॉडनेम से ही दवा लिखते हैं। दवा विक्रेता मनीष अग्रवाल बताते हैं कि मरीज भी वे ही दवाएं लेने की बात करते हैं जो पर्चे में लिखी है। यदि उन्हें उसी साल्ट की सस्ती दवा देने का प्रयास किया जाता है तो वह लेने से ही इंकार कर देते हैं।
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सरकारी डॉक्टर भी शामिल हैं गठजोड़
सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों को बाहरी दवाएं लिखने पर रोक लगी है। अब जब डाक्टर बाहरी दवाएं नहीं लिख सकते हैं तो उनके पास मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का क्या काम। लेकिन जिले के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी के दौरान अक्सर एमआर बैठे देखे जा सकते हैं। कमिशन के लिए एमआर डॉक्टरों को पैकेज का तारगेट भी देते हैं। जैसा लक्ष्य, वैसा कमिशन, गिफ्ट पैक तय होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि डॉक्टर बाहरी दवाएं लिख रहे हैं।
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एक दिन में होता है साढ़े छह लाख का कारोबार
जिले में करीब 1300 खुदरा मेडिकल स्टोर हैं। इन स्टारों के कारोबार का आकलन करें तो एक दिन में एक मेडिकल स्टोर पर कम से कम 50 लोग दवा लेते आते हैं। औसतन 500 रुपये की दवा खरीदी गई तो जिले के 1300 मेडिकल स्टोर पर एक दिन में दवा का कारोबार 6,50000 रुपये का होगा।
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सरकार नीति करें स्पष्ट
ड्रग प्राइज कंटोल आर्डर में जीवन रक्षक दवाओं को रखा गया है। इन दवाओं में जरूरत के हिसाब साल्ट मिलाकर कॉबिनेशन वाली दवाएं बेचीं जा रही हैं। इनके फंक्शन भी अलग-अलग होते हैं। सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए तभी डीपीसीओ का फायदा मिल सकता है।
आलोक बंसल, थोक दवा विक्रेता
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सिंगल ड्रग पालिसी अपनाए सरकार
डीपीसीओ में जो दवाएं शामिल की हैं वह आम लोगों के लिए काफी हितकारी हैं, लेकिन विभिन्न बीमारियों के लिए उनमें कुछ साल्ट मिलाकर नए कांबिनेशन बनाए गए हैं ताकि मरीज को कम दाम में पूरा इलाज मिल सके। कांबिनेशन वाली दवाओं पर सरकार को कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में सिंगल ड्रग पालिसी होनी चाहिए, तभी डीपीसीओ का लाभ मिल सकेगा।
राघवेंद्र नाथ मिश्रा, कैमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन
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बाहरी दवाएं लिखने व एमआर पर है पाबंदी
मैंने अभी करीब एक माह पहले ही यहां चार्ज लिया हैं। जिला अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा बाहरी दवाएं लिखने व मेडिकल रिप्रेंजेटेटिवस के आने पर पूरी तरह से पाबंदी है।
डॉ. रतनपाल सिंह सुमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल
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सरकारी अस्पतालों के साथ नर्सिंग होम में बड़े पैमाने पर हो रहा खेल
फार्मूूले में बदलाव कर महंगे दामों में बेंच रहे हैं दवाएं
आठ सौ से ज्यादा दवाएं हैं मूल्य नियंत्रण के दायरे में
दवा कंपनी-डॉक्टर गठजोड़ के चलते मरीजों को सस्ती दवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार ने लोगों को सस्ते रेट में दवा उपलब्ध कराने को हृदय रोग, कैंसर, मिर्गी समेत कई बीमारियों की दवाओं को ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) में शामिल किया है। शुरूआती दौर में इससे दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश तो लगा, लेकिन बाद में दवा कंपनियों ने फार्मूले में बदलाव कर नया खेल शुरू कर दिया। इस खेल में डॉक्टरों को भी शामिल किया गया, ताकि मनमाने दामों में दवाएं बेंची जा सके।
सरकार आम लोगों के लिए दवाइयां सस्ती रखने के लिए 800 से ज्यादा दवाइयों को मूल्य नियंत्रण के दायरे में ला चुकी है। ड्रग प्राइस रेगुलेटर एनपीपीए ने दवाइयों के दाम में 4.8 फीसदी से 23.3 फीसदी तक कमी की है। इसके तहत पैरासिटामॉल, सिफोड्रोक्सिन, सेल्ब्युटामॉल व कैफेजोलिन जैसी एंटी बायोटिक्स को भी मूल्य नियंत्रण के दायरे में शामिल किया गया। इससे काफी हद तक दवा कंपनियों के मनमाने दामों पर दवा बेचने का एकाधिकार टूट गया, लेकिन यह सबकुछ ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। दवा कंपनियों ने इस बंदिश से आजाद होने का नया तरीका ढूंढ निकाला। कंपनियों ने डीपीसीओ में शामिल दवाओं के साल्ट के साथ दवा बनाने में ऐसे साल्ट इस्तेमाल करने शुरू कर दिए जो डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं। इस तरह उनकी दवा मूल्य नियंत्रण दायरे से बाहर हो गई। बाजार में एक ही फार्मूले की दवाएं अलग-अलग रेट पर मौजूद हैं। खास बात यह है कि अंजान मरीज भी वहीं दवाएं खरीदते हैं जो डॉक्टर लिखते हैं। दवाओं के लिखने के पीछे बड़े पैमाने पर कमिशन का खेल होता है। इस खेल में सरकारी अस्पतालों के अलावा नर्सिंग होम के डॉक्टर बड़े पैमाने पर शामिल हैं। डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाओं को खरीदने के लिए मरीज के तीमारदार विवश हैं।
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यह हैं दवाएं जिनमें होता है खेल
दवा सामान्य दाम फार्मूला बदलने पर बढ़े दाम
पैरासिटामोल 1.00 रुपये 5.00 रुपये
सिफेकज्मि 7.00 रुपये 14.00 रुपये
सेलब्युटामॉल 9.00 रुपये 55.00 रुपये
सेट्राजिन श 0.75 पैसे 7.00 रुपये
मेट्राजिल 7.00 रुपये 38.00 रुपये
डेक्सा 20.00 रुपये 120 रुपये
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ऐसे होता है खेल
डीपीसीओ में दर्ज दवाओं के दाम सरकार के नियंत्रण में रहते हैं। इन दवाओं के दाम बिना अनुमति नहीं बढ़ाए जा सकते। इन दवाओं को मनमाने दामों पर बेचने के लिए इनके फार्मूले में बदलाव कर नई दवा के तौर पर लांच कर दिया जाता है। सरकार का कॉबिनेशन वाली दवाओं पर नियंत्रण नहीं है। ऐसे में इस खेल को रोकने में सरकार भी नाकाम है। मसलन बुखार के लिए पैरासिटोमॉल की गोली एक रुपये में मिलती है, लेकिन इसमें एसीक्लोफिनेक का साल्ट बढ़ाकर यह गोली पांच रुपये में बेची जा रही है।
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दवा कंपनियों के इस खेल में डॉक्टर भी शामिल हैं। सरकार द्वारा डॉक्टरों को फार्मूले के नाम से दवा लिखने को कहा गया है लेकिन डाक्टर ऐसा न करके ब्रॉडनेम से ही दवा लिखते हैं। दवा विक्रेता मनीष अग्रवाल बताते हैं कि मरीज भी वे ही दवाएं लेने की बात करते हैं जो पर्चे में लिखी है। यदि उन्हें उसी साल्ट की सस्ती दवा देने का प्रयास किया जाता है तो वह लेने से ही इंकार कर देते हैं।
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सरकारी डॉक्टर भी शामिल हैं गठजोड़
सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों को बाहरी दवाएं लिखने पर रोक लगी है। अब जब डाक्टर बाहरी दवाएं नहीं लिख सकते हैं तो उनके पास मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का क्या काम। लेकिन जिले के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी के दौरान अक्सर एमआर बैठे देखे जा सकते हैं। कमिशन के लिए एमआर डॉक्टरों को पैकेज का तारगेट भी देते हैं। जैसा लक्ष्य, वैसा कमिशन, गिफ्ट पैक तय होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि डॉक्टर बाहरी दवाएं लिख रहे हैं।
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एक दिन में होता है साढ़े छह लाख का कारोबार
जिले में करीब 1300 खुदरा मेडिकल स्टोर हैं। इन स्टारों के कारोबार का आकलन करें तो एक दिन में एक मेडिकल स्टोर पर कम से कम 50 लोग दवा लेते आते हैं। औसतन 500 रुपये की दवा खरीदी गई तो जिले के 1300 मेडिकल स्टोर पर एक दिन में दवा का कारोबार 6,50000 रुपये का होगा।
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सरकार नीति करें स्पष्ट
ड्रग प्राइज कंटोल आर्डर में जीवन रक्षक दवाओं को रखा गया है। इन दवाओं में जरूरत के हिसाब साल्ट मिलाकर कॉबिनेशन वाली दवाएं बेचीं जा रही हैं। इनके फंक्शन भी अलग-अलग होते हैं। सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए तभी डीपीसीओ का फायदा मिल सकता है।
आलोक बंसल, थोक दवा विक्रेता
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सिंगल ड्रग पालिसी अपनाए सरकार
डीपीसीओ में जो दवाएं शामिल की हैं वह आम लोगों के लिए काफी हितकारी हैं, लेकिन विभिन्न बीमारियों के लिए उनमें कुछ साल्ट मिलाकर नए कांबिनेशन बनाए गए हैं ताकि मरीज को कम दाम में पूरा इलाज मिल सके। कांबिनेशन वाली दवाओं पर सरकार को कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में सिंगल ड्रग पालिसी होनी चाहिए, तभी डीपीसीओ का लाभ मिल सकेगा।
राघवेंद्र नाथ मिश्रा, कैमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन
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बाहरी दवाएं लिखने व एमआर पर है पाबंदी
मैंने अभी करीब एक माह पहले ही यहां चार्ज लिया हैं। जिला अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा बाहरी दवाएं लिखने व मेडिकल रिप्रेंजेटेटिवस के आने पर पूरी तरह से पाबंदी है।
डॉ. रतनपाल सिंह सुमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल
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