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कोरोना ने जमकर चोट पहुंचाई बांसुरी कारोबार पर
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पीलीभीत। कभी शहर को बांसुरी नगरी के नाम से जाना जाता था। मगर, कोरोना काल में यह परंपरागत उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है। सरकार की एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना में शामिल होने के बाद बांसुरी कारीगरों जिस तरह की उम्मीद थी, उस तरह की सरकारी मदद नहीं मिली। बांसुरी के सुर साल दर साल पहले ही बिखरते जा रहे थे, अब साल भर में पांच करोड़ के इस कारोबार पर कोरोना की बहुत बुरी मार पड़ी है। खपत न होने से कारीगरों के घर और गोदामों में बांसुरी के ढेर लगे हुए हैं।
प्रदेश के औद्योगिक स्वरूप का विकास करने के लिए राज्य सरकार ने जनवरी 2018 में ओडीओपी योजना शुरू की थी। हर जिले में वहां के विशेष उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख उत्पाद का चयन किया गया। शासन ने पीलीभीत में इसके लिए बांसुरी को चुना। बांसुरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय कारीगरों और इससे जुड़े कारोबारियों को 25 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करने की बात कही गई। मगर, अधिकांश कारीगरों को बैंक से ऋण ही नहीं मिल सका। इसके साथ ही बांसुरी के लिए सस्ता कच्चा माल लाने के दावे भी धराशायी हो गए। तब से बांसुरी कारीगर बेरोजगार हैं। बहुत से कारीगरों ने तो परंपरागत कारोबार छोड़कर दूसरा काम पकड़ लिया है। तमाम बांसुरी कारीगर ऑटो या ई रिक्शा चलाकर परिवार का गुजारा करने लगे हैं।
लॉकडाउन से बिगड़ गए हालात
कोविड-19 को लेकर देश भर में 22 मार्च को लॉकडाउन लगा। उसमें सारे उद्योग धंधे बंद हो गए। जनपद में 80 से अधिक बांसुरी कारोबारी और 250 से अधिक कारीगर हैं। एकाएक लॉकडाउन से बांसुरी की बाहर को जाने वाली खपत भी रुक गई। बांसुरी कारीगरों को उम्मीद थी कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, इसलिए बांसुरी बनाने का काम चलता रहा। मगर, इसका नतीजा यह निकला कि 70 दिन बाद लॉकडाउन तो खुल गया लेकिन बांसुरी की खपत पर ब्रेक लगा है। कारोबारियों के मुताबिक करीब पांच करोड़ के आसपास का माल घरों और गोदामों में कैद है। पूरे अनलॉक-1 में जनपद से मात्र दो ट्रक ही बांसुरी सप्लाई की गई। इधर घरों और गोदामों में रखी बांसुरी और कच्चे माल में घुन भी लगने लगा है। यदि जल्द ही सप्लाई नहीं हुई तो कारोबारियों का बड़ा नुकसान हो सकता है।
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महीने में 12 से 15 ट्रक होती थी सप्लाई
बांसुरी कारोबारियों के मुताबिक सामान्य दिनों में 12 से 15 ट्रक माल सप्लाई होता था, मगर लॉकडाउन से अब तक मात्र दो ट्रक ही बांसुरी की सप्लाई हो सकी है। अमूमन एक ट्रक में 14 से 15 लाख रुपये की बांसुरियां लोड होती हैं।
विदेशों तक जाती थी पीलीभीत की बांसुरी
जनपद में बांसुरी का कारोबार करीब 125 साल पुराना है। बांसुरी कारोबार की शुरूआत शहर के नत्था शेख ने की थी। इसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले इकरार मियां और उनके पांच भाई की सबसे बड़ी फर्म नवी एंड संस है। ढाई इंच से 72 इंच तक की बांसुरी बनाने वाला यह परिवार आज भी सिस्टम के चक्रव्यूह में फंसा है। परिवार ने इस विरासत को एक समय अहमदाबाद, भोपाल, हैदराबाद के अलावा अमेरिका, फ्रांस, डेनमार्क और श्रीलंका तक पहुंचाया था, मगर आज उनकी यह बांसुरी मुंबई, गुजरात, मध्यप्रदेश और तमिलनाडु शहरों तक ही पहुंच पा रही है। एक जमाने में इन बांसुरियों की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 250 से 40 हजार रुपये तक थी।
बिक्री के लिए नहीं है कोई प्लेटफार्म
ओडीओपी योजना में बांसुरी को शामिल करने के बाद इसकी बिक्री के लिए आज तक कोई मार्केट नहीं बना। बांसुरी कारोबारी अपने स्तर से ही माल मार्केट तक पहुंचा रहे हैं। लॉकडाउन से बिजनेस पूरी तरह लड़खड़ा गया। - इकरार मियां, बांसुरी कारोबारी
लॉकडाउन में दिवाला निकला
ओडीओपी में शामिल होने के बाद भी बांसुरी को तरजीह नहीं मिली। लॉकडाउन से अब तक बांसुरी की बिक्री न के बराबर है। गोदाम में बांसुरी और कच्चा माल खराब होने लगा है। सरकार को हम लोगों की मदद करनी चाहिए। - मोहम्मद उवैस
हाल ही मैंने यहां ज्वाइन किया है। यहां की ओडीओपी योजना में बांसुरी शामिल है। कोरोना संक्रमण के चलते मार्केट अभी ठंडा है। इसकी जानकारी की जाएगी। उच्चाधिकारियों से बात कर समस्या का निदान कराया जाएगा। - चंद्र प्रकाश शाक्य, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र
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प्रदेश के औद्योगिक स्वरूप का विकास करने के लिए राज्य सरकार ने जनवरी 2018 में ओडीओपी योजना शुरू की थी। हर जिले में वहां के विशेष उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख उत्पाद का चयन किया गया। शासन ने पीलीभीत में इसके लिए बांसुरी को चुना। बांसुरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय कारीगरों और इससे जुड़े कारोबारियों को 25 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करने की बात कही गई। मगर, अधिकांश कारीगरों को बैंक से ऋण ही नहीं मिल सका। इसके साथ ही बांसुरी के लिए सस्ता कच्चा माल लाने के दावे भी धराशायी हो गए। तब से बांसुरी कारीगर बेरोजगार हैं। बहुत से कारीगरों ने तो परंपरागत कारोबार छोड़कर दूसरा काम पकड़ लिया है। तमाम बांसुरी कारीगर ऑटो या ई रिक्शा चलाकर परिवार का गुजारा करने लगे हैं।
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लॉकडाउन से बिगड़ गए हालात
कोविड-19 को लेकर देश भर में 22 मार्च को लॉकडाउन लगा। उसमें सारे उद्योग धंधे बंद हो गए। जनपद में 80 से अधिक बांसुरी कारोबारी और 250 से अधिक कारीगर हैं। एकाएक लॉकडाउन से बांसुरी की बाहर को जाने वाली खपत भी रुक गई। बांसुरी कारीगरों को उम्मीद थी कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, इसलिए बांसुरी बनाने का काम चलता रहा। मगर, इसका नतीजा यह निकला कि 70 दिन बाद लॉकडाउन तो खुल गया लेकिन बांसुरी की खपत पर ब्रेक लगा है। कारोबारियों के मुताबिक करीब पांच करोड़ के आसपास का माल घरों और गोदामों में कैद है। पूरे अनलॉक-1 में जनपद से मात्र दो ट्रक ही बांसुरी सप्लाई की गई। इधर घरों और गोदामों में रखी बांसुरी और कच्चे माल में घुन भी लगने लगा है। यदि जल्द ही सप्लाई नहीं हुई तो कारोबारियों का बड़ा नुकसान हो सकता है।
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महीने में 12 से 15 ट्रक होती थी सप्लाई
बांसुरी कारोबारियों के मुताबिक सामान्य दिनों में 12 से 15 ट्रक माल सप्लाई होता था, मगर लॉकडाउन से अब तक मात्र दो ट्रक ही बांसुरी की सप्लाई हो सकी है। अमूमन एक ट्रक में 14 से 15 लाख रुपये की बांसुरियां लोड होती हैं।
विदेशों तक जाती थी पीलीभीत की बांसुरी
जनपद में बांसुरी का कारोबार करीब 125 साल पुराना है। बांसुरी कारोबार की शुरूआत शहर के नत्था शेख ने की थी। इसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले इकरार मियां और उनके पांच भाई की सबसे बड़ी फर्म नवी एंड संस है। ढाई इंच से 72 इंच तक की बांसुरी बनाने वाला यह परिवार आज भी सिस्टम के चक्रव्यूह में फंसा है। परिवार ने इस विरासत को एक समय अहमदाबाद, भोपाल, हैदराबाद के अलावा अमेरिका, फ्रांस, डेनमार्क और श्रीलंका तक पहुंचाया था, मगर आज उनकी यह बांसुरी मुंबई, गुजरात, मध्यप्रदेश और तमिलनाडु शहरों तक ही पहुंच पा रही है। एक जमाने में इन बांसुरियों की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 250 से 40 हजार रुपये तक थी।
बिक्री के लिए नहीं है कोई प्लेटफार्म
ओडीओपी योजना में बांसुरी को शामिल करने के बाद इसकी बिक्री के लिए आज तक कोई मार्केट नहीं बना। बांसुरी कारोबारी अपने स्तर से ही माल मार्केट तक पहुंचा रहे हैं। लॉकडाउन से बिजनेस पूरी तरह लड़खड़ा गया। - इकरार मियां, बांसुरी कारोबारी
लॉकडाउन में दिवाला निकला
ओडीओपी में शामिल होने के बाद भी बांसुरी को तरजीह नहीं मिली। लॉकडाउन से अब तक बांसुरी की बिक्री न के बराबर है। गोदाम में बांसुरी और कच्चा माल खराब होने लगा है। सरकार को हम लोगों की मदद करनी चाहिए। - मोहम्मद उवैस
हाल ही मैंने यहां ज्वाइन किया है। यहां की ओडीओपी योजना में बांसुरी शामिल है। कोरोना संक्रमण के चलते मार्केट अभी ठंडा है। इसकी जानकारी की जाएगी। उच्चाधिकारियों से बात कर समस्या का निदान कराया जाएगा। - चंद्र प्रकाश शाक्य, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र