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पितरों की तृप्ति कौन जाने यहां तो जीते जी अपनों के लिए तरस रहे बागवां

Sun, 15 Sep 2019 07:33 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 15 Sep 2019 07:33 PM IST
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पीलीभीत। पितृ पक्ष शनिवार से प्रारंभ हो चुका है। पूर्वजों को खुश करने के लिए इन 15 दिनों में उनके अपने तर्पण के साथ ही उनकी पसंद के पकवान बनवाकर कौवों को खिलाएंगे, लेकिन यहां वृद्ध आश्रम में तमाम ऐसे बुजुर्ग बरसों से रह रहे हैं, जिन्हें उनके अपनों ने ही बेसहारा छोड़ दिया है। वर्तमान में वृद्ध आश्रम में करीब 19 बुजुर्ग रह रहे हैं। यह सभी किसी न किसी मजबूरी के चलते यहां बेबसी की जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।
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दर्द देने वालों को भी दोष नहीं देते बुजुर्ग अशर्फी
शहर के बरहा स्थित वृद्ध आश्रम में रह रहे बुजुर्ग अशर्फीलाल भले ही आज अपनों से दूर हैं, लेकिन आज भी वे अपनी औलाद को दोष देना नहीं चाहते। उनके साथ ही उनकी पत्नी भी रहती हैं। काफी कुरेदने पर बुजुर्ग अशर्फीलाल ने बताया कि उनकी पांच संतानें हैं। सभी की शादी हो चुकी हैं। घर में बहुएं आ चुकी हैं, भजन आदि करने में दिक्कत हो रही थी, इसीलिए पत्नी के साथ यहां आकर रहने लगे। उनके इन शब्दों के पीछे का दर्द उनकी आंखों से साफ झलक रहा था। वृद्ध आश्रम में कब तक रहेंगे? के सवाल को वे टाल गए। बोले- परमात्मा की इच्छा है तो यहीं रहूंगा।
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जिसने दर-दर भटकने को किया मजबूर..उसी को बचाने की लगाई गुहार
वृद्ध आश्रम में रहने वाले बीसलपुर निवासी 88 वर्षीय एक बुजुर्ग की कहानी भी किसी की आंखों को नम कर देने के लिए काफी है। कभी देश की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा देने वाले इस बुजुर्ग को उनके इकलौते बेटे ने घर से निकाल दिया। घर में शादी के लिए लोग रिश्ता लेकर आए तो उनका बेटा रिश्तेदारों को दिखाने के लिए उन्हें यहां से ले गया, लेकिन शादी निपटते ही उन्हें चंद कपड़े देकर घर से बेघर कर दिया। परिवार के बारे में पूछने पर बुजुर्ग ने नम आंखों से बताया कि बेटे ने सारी संपत्ति बेच दी और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए घर से निकाल दिया। बुजुर्ग दोनों हाथ जोड़कर बोले-आप मेरे बेटे के खिलाफ कोई कार्रवाई न करना। मुझे उससे कोई शिकवा नहीं।
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पितर माफ कर देंगे ये भी भूल! अब तो सिरा आओ उनके फूल
मुक्तिधाम में 150 से अधिक अस्थि कलश कर रहे अपनों का इंतजार
पीलीभीत। पितृ पक्ष में परंपरा के मुताबिक घरों में अपने पितरों के तर्पण के लिए श्राद्ध, पूजा और दान जैसे कई अनुष्ठान अगले 15 दिन तक चलेंगे, लेकिन कई ऐसे परिवार भी हैं जो अपने बुजुर्गों के परलोक गमन के बाद उन्हें भूल गए और अपने बुजुर्गों के फूल यानी अस्थियां विसर्जित करने तक की फुरसत नहीं निकाल पाए। शहर के मुक्तिधाम में करीब 150 से अधिक अस्थिकलश लंबे समय से अपनों का इंतजार कर रहे हैं।
शहर के मुक्तिधाम में सैकड़ों कलशों में चिताओं से चुने गए फूल इस इंतजार में रखे हैं कि शायद कभी कोई अपना उन्हें सिराने आएगा। शहर के कई परिवार अपनी व्यस्त दिनचर्या में इन फूलों को गंगा में विसर्जित करने का समय नहीं निकाल पा रहे हैं। नतीजा यह है कि धीरे-धीरे इन अस्थि कलशों की संख्या बढ़ती जा रही है। मुक्तिधाम समिति ने इन परिवारों को फोन करके अपने परिजनों के अस्थि विसर्जन करने को कहा है। फिलहाल इन परिवारों को एक सप्ताह का समय दिया गया है। मुक्तिधाम में कार्य कर रहे रवि ने बताया कि कुछ अस्थिकलश तो अपनों का इंतजार करते-करते टूट भी गए हैं। अब जिसको भी फोन करो तो कोई दो माह तो कोई छह माह बाद अस्थि कलश ले जाने की बात कह रहा है।
मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करना उत्तम
पीलीभीत। इस साल पितृ पक्ष 14 से शुरू होकर 29 सितंबर तक है। श्री रामलीला महोत्सव संचालन समिति के सर्वराकार एवं मंदिर के महंत ओमकार नाथ बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितर पृथ्वीलोक पर आते हैं। इन दिनों में पितरों को पिंडदान और तर्पण कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिए। श्राद्ध के दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं। जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु होती है उसी तिथि पर श्राद्ध करना उत्तम माना जाता है।

मोक्ष के लिए पतित पावनी गंगा में अस्थि विसर्जन का विधान
महंत ओमकार नाथ के मुताबिक, गंगा को अपने पितरों की मुक्ति के लिए सतयुग में महाराज भगीरथ पृथ्वी पर लेकर आए थे। स्वर्गलोक से भगवान विष्णु के चरणों से निकलकर गंगा भगवान शिव के शीश पर विराजीं और फिर पृथ्वी पर आईं। महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि ने श्राप देकर भस्म कर दिया था। उनकी आत्मा मोक्ष न मिलने से भटक रही थीं तब महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कई वर्ष तक तप करके मां गंगा को पृथ्वी पर लेकर आए, इसीलिए गंगा का भागीरथी भी कहते हैं। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद मोक्ष और आत्मा की शांति के लिए गंगा में अस्थियों का विसर्जन किया जाता है।
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