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बेंत की सजा खा बेहोश हो गए, पर नहीं मांगी माफी

Sun, 13 Aug 2017 11:38 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो  पीलीभीत।
अमर उजाला ब्यूरो  पीलीभीत। Updated Sun, 13 Aug 2017 11:38 PM IST
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became unconscious, but did not ask for forgiveness
freedom - फोटो : amar ujala
जरा याद करो कुर्बानी 
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बीसलपुर तहसील के छोटे से गांव उल्लिका के महाशय कुंदानलाल भी देश को आजाद कराने वाले उन स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे जो ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता के आगे घुटने नहीं टेके। चाहे हो ब्रिटिश शासकों के नुमाइंदों के हाथ मिलाने का न्योता रहा हो या फिर जेल के सीकचों से आजाद करने, बेंत की सजा माफ करने के लिए माफी नामा पर हस्ताक्षर कराने का ही आफर क्यो न रहा हो। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने के जुर्म में कैद के साथ 37 बेंतों की मिली सजा के दौरान भी जब तक होश में रहे भारत माता की जय के नारे लगाते रहे। 
1907 को उल्लिका गांव में मूलचंद के घर जन्मे महाशय कुंदनलाल ने 1928 में पं. दुर्गाशंकर की प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मलित हुए। बमरोली के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुंवर भगवान सिंह के साथ मिल कर कई आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाई। देश को आजाद कराने का जज्बा कुछ इस तरह सिर पर सवार था कि विवाह तक नहीं किया। कुश्ती लड़ने व लाठी चलाने के शौकीन रहे इस स्वतंत्रा सेनानी को आंदोलन के दौरान कई बार जेल जाना पड़ा। अगस्त 1942 में कुंवर भगवान सिंह उनके घर गए थे। उस समय कुंदनलाल घर पर नहीं थे। उनकी मां से भगवान सिंह ने उन्हें भेजने को कह दिया। 10 अगस्त 1942 को करीब चार बजे जब कुंदनलाल घर पहुंचे तो उनकी मां ने एक लोहासब की बोतल, कुछ कपड़े, 25 रुपये और उनका रिवाल्वर एक थैले में डाल कर देने के साथ आशीर्वाद देकर देश को स्वतंत्र कराने के लिए चले जाने को कहा। कुछ देर बाद जिलाधीश और एसपी भी कुंदनलाल को तलाशते उनके घर जा धमके। मां से पूछा तो उन्होंने साफ-साफ कर दिया कि तुम्हारे आने से दो घंटा पहले उसे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए भेज दिया। इस पर गुस्साए एसपी ने उनकी मां को दो बेंत भी मारे।  
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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिले के सेनानियों ने एक साथ जिले के सभी थानों को लूटने की योजना बनाई थी। कुंदनलाल को बीसलपुर कोतवाली लूटने की जिम्मेदारी दी गई थी। करीब एक हजार साथी के साथ कुंदनलाल वहां पहुंच एक बाग में एकत्र भी हो गए। इसी बीच सूचना मिली कि पुलिस को भनक लग चुकी है। काफी मंथन और साथियों से विचार विमर्श के बाद सब लोग वापस लौट आए। सभी ने फरारी हालत में गौटिया और बमिहाने आदि जगहों पर फरारी काटी। कोतवाली से असलहे लूटने की योजना न बन पाने पर पांच मिस्त्री बंदूक बनाने के लिए लगाए गए। कुछ कारतूस भरने में लगे। बम भी बनाए गए। जब यह काम चलता तो कुछ साथी पेड़ पर बैठ पहरा देते थे। खतरा महसूस होने पर घंटी बजाकर सचेत करते थे। बाद में भगवान सिंह के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। विभिन्न केसो में कुंदनलाल को 36 साल की कैद और 37 बेंत की सजा सुनाई गई। पहले पीलीभीत, फिर बरेली, और वहां से आगरा जेल भेज दिया गया। आगरा स्टेशन पर उतर कर जब उन्हें जेल ले जाया जा रहा था तो वहां भी लोगों ने उनके स्वागत में नारे लगाए। जेल में यातनाएं मिलने पर नारे लगाए। जेल में बगावत का माहौल अपने क्रांतिकारी गीतों से पैदा कर दिया। हर इतवार को कैदियों को बेंत की सजा दी जाती थी। पहले यह सजा सबके सामने दी जाती थी, लेकिन जब अंग्रेजों ने देखा कि सब बंदी भी आंदोलनकारियों के साथ खड़े हो रहे हैं तो जेल के अस्पताल में बुला कर यह सजा दी जाने लगी। कुंदनलाल का भी एक दिन आया। अस्पताल बुलाकर पहले दो चार लोगों को मिली सजा दिखाई। फिर एक छपे हुए माफीनामा पर हस्ताक्षर करने को कहा। कहा कि इस माफीनामा पर हस्ताक्षर कर दीजिए बेंतों से बच जाओगे। इस पर कुंदनलाल का जवाब था कि बूढ़ों को दुनिया बूढ़ी दिखाई देती है। बेंत लगवाइये, माफी कायर मांगते हैं। सिविल सर्जन ने उनका वजन किया। बेंत की टिकरी मंगाई। बेंत पड़े तो उन्होंने भारत माता की जय नारे लगाए। दो बेंत के बाद उन्हें होश नहीं रहा। जब होश आया तो वह स्ट्रेचर पर थे और जेल अधिकारियों ने उन्हेें कुछ दवा दी और दूध पीने को कहा, लेकिन उन्होंने दूध पीने से इंकार कर दिया। 1976 में उनका निधन हो गया। 
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आजादी का जश्न नहीं मनाया 
देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस आजीवन लड़वैए ने आजादी का जश्न नहीं मनाया। बल्कि एक और संग्राम के लिए उन्होंने अपने को समर्पित कर दिया। उनके लिए आजादी का अर्थ किसान, मजदूर और आम आदमी की खुशहाली था। उन्होंने नई पीढ़ी को शिक्षित करने का बड़ा दायित्व अपने ऊपर लिया और एक गुरुकुल खोल कर उसके माध्यम से कर्मक्षेत्र में उतरने वाले विद्यार्थियों को जोड़ा। साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने अपनी पुस्तक पहचान बीसलपुर में भी इसका जिक्र किया है।  
मेरी जिंदगी एक मुसलसल सफर है, 
जो मंजिल पर पहुंचा तो मंजिल बढ़ा दी। 
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