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...लड़ाई हारा हूं मैं बुजदिलों को साथ लाने से
Updated Thu, 13 Sep 2018 11:45 PM IST
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... तुम्हें क्या फर्क पड़ता है किसी के रूठ जाने से
चंदोई गांव में आयोजित हुआ मुशायरा
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। साहित्यिक संस्था अदबी संगम की ओर से बुधवार रात चंदोई गांव में मुशायरे का आयोजन किया गया। इसकी सदारत शायर मकबूल हुसैन फैज ने की। उन्होंने कहा कि ‘रहे हक में मोअज्जम है शहीदे नाज का रुतबा, हयाते जाविदां मिलती है, अपना सर कटाने से। मुशायरे के संयोजक साबिर हाशमी ने कहा कि- मोहब्बत तुमने की होती तो कुछ एहसास भी होता, तुम्हें क्या फर्क पड़ता है किसी के रूठ जाने से।
जनाब शराफत हुसैन शाद ने कहा कि- हवाएं वक्त से कह दो कि अब भी बाज आ जाएं, चरागे अज्म बुझ सकते नहीं हरगिज बुझाने से। एडवोकेट जियाउद्दीन के इस शेर को भी खूब दाद मिली- हकीकत में जमाने की यह आदत है जमाने में, कोई भी खुश नहीं होता किसी के मुस्कुराने से। अशरफ जमां काविशा ने फरमाया कि- कोई ताकत न मुझको रोक पाती जीत जाने से, लड़ाई हारा हूं मैं बुजदिलों को साथ लाने से। इसके अलावा कई अन्य शायरों ने भी बेहतरीन कलाम पेश किए। मुशायरा देर रात चला। इस मौके पर रेहान अली, सरताज नवाज, जावेद खां, नूर अहमद, तौफीक मलिक आदि मौजूद रहे।
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चंदोई गांव में आयोजित हुआ मुशायरा
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। साहित्यिक संस्था अदबी संगम की ओर से बुधवार रात चंदोई गांव में मुशायरे का आयोजन किया गया। इसकी सदारत शायर मकबूल हुसैन फैज ने की। उन्होंने कहा कि ‘रहे हक में मोअज्जम है शहीदे नाज का रुतबा, हयाते जाविदां मिलती है, अपना सर कटाने से। मुशायरे के संयोजक साबिर हाशमी ने कहा कि- मोहब्बत तुमने की होती तो कुछ एहसास भी होता, तुम्हें क्या फर्क पड़ता है किसी के रूठ जाने से।
जनाब शराफत हुसैन शाद ने कहा कि- हवाएं वक्त से कह दो कि अब भी बाज आ जाएं, चरागे अज्म बुझ सकते नहीं हरगिज बुझाने से। एडवोकेट जियाउद्दीन के इस शेर को भी खूब दाद मिली- हकीकत में जमाने की यह आदत है जमाने में, कोई भी खुश नहीं होता किसी के मुस्कुराने से। अशरफ जमां काविशा ने फरमाया कि- कोई ताकत न मुझको रोक पाती जीत जाने से, लड़ाई हारा हूं मैं बुजदिलों को साथ लाने से। इसके अलावा कई अन्य शायरों ने भी बेहतरीन कलाम पेश किए। मुशायरा देर रात चला। इस मौके पर रेहान अली, सरताज नवाज, जावेद खां, नूर अहमद, तौफीक मलिक आदि मौजूद रहे।
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