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भगतराम तलवार: चुपचाप जहां में आए, चुपचाप जहां से विदा हुए

Fri, 11 Aug 2017 05:43 PM IST
Updated Fri, 11 Aug 2017 05:43 PM IST
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भगतराम तलवार: चुपचाप जहां में आए, चुपचाप जहां से विदा हुए
पीलीभीत। यूं तो देश को आजाद कराने में कई सपूतों ने स्वाधीनता संग्राम को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था, वहीं कुछ ऐसे भी गुमनाम योद्धा भी थे जो मादरे वतन की लाज बचाने को हर वक्त अपनी जान हथेली पर लिए फिरते थे। उन्हीं वीर सपूतों में एक थे शहर निवासी भगतराम तलवार। अपने विद्रोही तेवरों के लिए मशहूर भगतराम ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश हुकूूमत के सख्त पहरे के बीच से निकालकर सोवियत संघ पहुंचाया था।
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स्वाधीनता संग्राम के दौरान नेता जी सुभाष चंद्र बोस के अभिन्न अंग रहे भगतराम पंजाब प्रांत के फिरोजपुर निवासी गुरदास मल की तीसरी संतान थे। उन्होंने कम उम्र में ही देश को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद कराने के लिए क्रांतिकारियों के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन में केवल भगतराम ही नहीं बल्कि उनके दोनों भाईयों ने हिस्सा लिया। वर्ष 1930 के मध्य उनके भाई हरिकिशन को लाहौर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गवर्नर पर गोली चलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वह डेढ़ वर्ष तक केंद्रीय कारागार पेशावर में बंद रहे। नौ जून 1931 को उन्हें फांसी दे दी गई।
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उस दौरान आर्यसमाजी आंदोलन का दौर था। भगतराम आर्य कुमार सभा के सदस्य भी रहे। मार्च 1930 में खान अब्दुल गफ्फार खान के गांव में एक कार्यक्रम में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पेशावर जेल में बंद रहे भगतराम से रिहाई के लिए जुर्माना जमा करने को कहा गया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। इस पर उन्हें डेढ़ साल के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
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वर्ष 1940 में विवाह होने के बाद भी भगतराम की जीवनशैली नहीं बदली। आजादी का जुनून पत्नी के प्रेम पर हावी रहा। उनके हौसले को देखते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारियों ने उन्हें एक अहम जिम्मेदारी सौंपी। भगतराम को स्वाधीनता संग्राम के प्रखर नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सोवियत संघ पहुंचाने का जिम्मा सौंपा गया। उस दौरान ब्रिटिश सैनिक नेताजी को चप्पे-चप्पे पर खोज रहे थे। नेताजी से मिलने की ललक में वह यह भूल ही गए कि अगर पकड़े गए तो नेताजी के साथ उन्हें भी फांसी दे दी जाएगी। पठान के भेष में नेताजी 16 जनवरी 1941 को फ्रंटियर मेल से कलकत्ता से दिल्ली पहुंचे। यहां अंग्रेज सैनिक उनकी तलाश में लगे थे, लेकिन भगतराम ने उन्हें देखते ही पहचान लिया और अंग्रेजों की नजरों से सुरक्षित निकाल ले गए। कई मुश्किलें झेलते हुए उन्होंने नेताजी को सोवियत संघ पहुंचा दिया। उनकी जांबाजी देख नेताजी ने उन्हें सैल्यूट कर विदा किया। इसके बाद भगतराम देश आकर क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होते रहे। देश आजाद होने के बाद वह परिवार के साथ पीलीभीत शहर की अशोक कालोनी में बस गए। कई दशक तक यहां रहने के बाद दुनिया से विदा हो गए।
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