देवबंद (सहारनपुर)। कोरोना वायरस से बचाव को लेकर मस्जिदों में नमाज अदा करने या न करने को लेकर उलमा उलझन में हैं। वे साफ तौर पर कुछ नहीं कह रहे, लेकिन नमाज पर पाबंदी को लेकर उनका तर्क है कि इस मामले में बड़े इदारों के जिम्मेदार ही कुछ फैसले लेंगे।
कोरोना वायरस से बचाव के लिए नमाज पर पाबंदी को लेकर जहां एक तरफ सऊदी अरब ने इस पर फैसला लिया तो दूसरी तरफ लखनऊ के शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद नकवी ने भी आसिफी मस्जिद में जुमा की नमाज को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है। नमाज पर पाबंदी को लेकर फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारुकी का कहना है कि इस मसले पर आलम-ए-इस्लाम दो तबकों में बंटा हुआ है। एक तबका कहता है कि नमाज रोकी जाए, जबकि दूसरा तबका कहता है कि ऐसे हालात में नमाज अदा की जानी चाहिए। मुफ्ती अरशद ने कहा कि हम सऊदी अरब की राय पर नहीं चलेंगे। हिंदुस्तान के उलमा इस पर कुछ राय तय करेंगे तो उस पर अमल करेंगे। जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन मौलाना कारी इस्हाक गोरा कहना है कि ऐसे हालत में नमाज पर पाबंदी लगाना शायद ठीक नहीं है। किसी बीमारी की दवा करते हैं तो उसके साथ दुआ भी बहुत जरूरी होती है, लेकिन इतना जरूर है कि मस्जिदों में भीड़ कम रहे यदि कोई बुखार से पीड़ित है तो उसे मस्जिदों में जाने से परहेज करना चाहिए। कारी इस्हाक का कहना है कि हम दारुल उलूम और दूसरे बड़े इदारों के जिम्मेदारों से अपील करते हैं कि वह इस सिलसिले में कोई फैसले लें।