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उम्मीद की मशाल : दो सहेलियों ने उठाया महिलाओं की निरक्षरता मिटाने का बीड़ा

Mon, 27 Jun 2022 12:36 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 27 Jun 2022 12:36 AM IST
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Torch of hope: Two friends took up the task of eradicating illiteracy of women
धीराहेड़ी में रेखा के घर पर पढ़ाई कर रही महिलाएं। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
उम्मीद की मशाल : दो सहेलियों ने उठाया महिलाओं की निरक्षरता मिटाने का बीड़ा
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प्रेम सागर
भोपा (मुजफ्फरनगर)। धीराहेड़ी गांव की रेखा और सोनिया के संकल्प ने गांव की निरक्षर महिलाओं की जिंदगी में शिक्षा की ललक पैदा दी है। दोनों ने निरक्षर महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया तो तस्वीर बदलने लगी। तीन महीने में 12 महिलाओं को दोनों हस्ताक्षर करना और लिखना सिखा चुकी हैं।
आठवीं पास रेखा और बीए पास सोनिया के मन में हमेशा और आगे बढ़ने की ललक रही। रेखा गृहिणी हैं और खेतों से खुद पशुओं का चारा लेकर आती हैं। फुर्सत के पलों पड़ोसी बीए पास सोनिया से पढ़ाई को लेकर बातचीत होती थी। दोनों ने मोहल्ले की महिलाओं को पढ़ाने का संकल्प लिया। तीन महीने पहले आसपास की महिलाओं को इसके लिए तैयार किया। रेखा के घर पर कक्षा चलने लगी। जब भी महिलाओं की मंडली को फुर्सत मिलती तो पढ़ाई शुरू होती। नतीजा यह निकला कि अब तक 12 महिलाएं साक्षर बन चुकी हैं। अक्षरों की पहचान और हस्ताक्षर करने भी महिलाएं सीख रही हैं। दोनों का कहना है कि उनका मकसद गांव की अधिक से अधिक महिलाओं को साक्षर बनाना है।
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क्या कहती हैं दोनों महिलाएं
रेखा व सोनिया का कहना है कि उन्होंने यह कार्य तीन माह पूर्व शुरू किया है और इन तीन माह में वे एक दर्जन से भी अधिक अनपढ़ महिलाओं को किताब पढऩा, अक्षर पहचानना, अपना व परिजनों का नाम लिखना, अंगूठा की जगह हस्ताक्षर करना सिखा चुकी हैं। इस कार्य को और आगे लेकर जाएंगी, शिक्षा ग्रहण करने वाली महिलाओं से वह किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लेती हैं और न ही उनसे कॉपी और पेंसिल आदि मंगाती हैं। सोनिया ने बताया कि वह जल्दी से घर का कार्य निपटा कर महिलाओं को इकट्ठा कर उन्हें पढ़ाई कराती हैं। इस कार्य से जहां वह पूर्ण रूप से संतुष्ट है वही उसका परिवार भी खुश है।
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अंगूठा नहीं, अब करती हूं हस्ताक्षर
गांव की 55 वर्षीय साबदेई का कहना है कि वह किसी भी सरकारी कार्य में अपना अंगूठा लगाया करती थीं। आज वह अपना नाम ही नहीं, अपने परिजनों का नाम लिखने के साथ-साथ अक्षरों को जोड़कर पढ़ लेती हैं। उनके अलावा गांव की सरला, बबीता, सुधा, सावित्री भी अभियान से जुड़कर लिखना पढ़ना सीख रही हैं।
मुझे तो आसान लगने लगी हैं किताबें
अनीता देवी (32) का कहना है कि वह पढ़ने लिखने के कार्य को बड़ा कठिन मानती थी। लेकिन जैसे ही रेखा और सोनिया की प्रेरणा से यह कार्य शुरू किया तो उसे भी लगन लगी है। अब वह अक्षर पहचानना और नाम लिखना सीख गई है।
बच्चों की किताबों से पढ़ रही है मां
शिक्षा ग्रहण करने वाली अनीता देवी के पति बिन्नू का कहना है कि उसने कक्षा आठ तक शिक्षा ग्रहण की है। उसकी पत्नी निरक्षर थी। उसने एक माह में ही अक्षर ज्ञान सीख लिया है। अब वह बच्चों की किताब खोल कर अक्षर मिलाकर पढ़ लेती है जो उसे बड़ा अच्छा लगता है।

प्रधान बोले, महिलाओं का प्रयास सराहनीय
ग्राम प्रधान ऋषिपाल का कहना है कि यह सराहनीय कदम है। गांव की अन्य शिक्षित महिलाओं को भी अपने आसपास की महिलाओं को अक्षर ज्ञान कराना चाहिए। सबके प्रयास से शिक्षा की अलख जगेगी। पूर्व प्रधान सुक्रमपाल का कहना है कि बहुत अच्छी शुरूआत की गई है। सभी को इस तरह का अभियान सफल बनाने में योगदान करना चाहिए।
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