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इस बार पंजाब-उत्तराखंड में नहीं जलेंगे चरथावल के ‘रावण’

Sat, 24 Oct 2020 04:08 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 24 Oct 2020 04:08 PM IST
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This time Ravana of Charathaval will not burn in Punjab-Uttarakhand
चरथावल के कारीगरों द्वारा बनाया पुतला। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
इस बार पंजाब-उत्तराखंड में नहीं जलेंगे चरथावल के ‘रावण’
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चरथावल (मुजफ्फरनगर)। कोरोना संक्रमण काल का असर पर्वों के उल्लास पर भी पड़ा है। हर साल यहां के कारीगर दशहरे पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाने पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड तक जाते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। बाहरी राज्यों के रामलीला आयोजकों ने इस बार संपर्क नहीं किया है। 50 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि दशहरा पर्व पर पुतले बनाने वाले मुस्लिम परिवार में मायूसी हैं।
कस्बे के मोहल्ला तीरग्रान रामलीला के पुतलें बनाने के लिए जाना जाता है। करीब 50-55 साल से शब्बीर का परिवार इस पुतलें बनाने का कार्य करता है। फिलहाल तीसरी पीढ़ी इस कार्य में जुटी है। हर शब्बीर के सात पुत्र लियाकत, रियासत, इरफान, शराफत, शमीम, नसीम, शहजाद और उनके पौत्र समेत तीन दर्जन सदस्य इस धंधे में जुटतें थे। आर्डर समय से पूरा करने के लिए जन्माष्टमी से ही पुतलें तैयार करने में शुरू कर दिए जाते थे। पुतलों के ढांचे में लगने वाली सामग्री तैयार कर लेते थे। इस बार नजारा पूरी तरह बदला है।
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पुश्तैनी काम में जुटें मोहम्मद इंतजार बताते हैं कि पिछले साल रुड़की में दो, सहारनपुर के पांच, लुधियाना के छह, मुजफ्फरनगर के दो, चंडीगढ़ से 12 एवं चरथावल एक और कई शहरों में सैकड़ों पुतलें बनाने के आर्डर मिलते थे। लेकिन इस बार रामलीला आयोजकों ने कोई संपर्क नहीं किया। एक पुतलें की कीमत करीब 40 हजार रुपये होती है। चरथावल के पुतलें रामलीला मैदानों में सजाते थे।
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कारीगर लियाकत अली बताते है कि इस धार्मिक कार्य को वह बड़े चाव से करते हुए परिवार को पांच दशक से ज्यादा बीत गए। लेकिन इस बार कोरोना कहर उनकी आजीविका पर पड़ा है। इरफान बताते है उनके द्वारा तैयार पुतलें सहारनपुर के नानौता, शामली के जलालाबाद, थानाभवन, लुधियाना, जमारपुर कालोनी लुधियाना, जगरावा जालंधर और हड्डा बस्ती में 90 से 120 फीट तक के तैयार पुतलें लगते थे। परिवार के सदस्यों को अलग-अलग प्रांतों में प्रवास कर पुतलें तैयार करते थे। लेकिन इस बार सिर्फ चरथावल में छोटा पुतला बनने का आर्डर मिल पाया। दशहरे पर इस बार सभी कारीगर घर पर खाली बैठे हैं।

जन्माष्टमी से ही शुरू हो जाती थी तैयारी
आर्डर समय से पूरा करने के लिए जन्माष्टमी से ही पुतलें तैयार करने में शुरू कर दिए जाते थे। काले कपड़े को पुतले के आकार में सीलने, पुतलों के ढांचे में लगने वाली सामग्री और आकार के अनुरूप लकड़ियां पहले से तैयार कर ली जाती थी। जिससे पुतला दहन के स्थान पर अधिक समय न लगे।
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