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Muzaffarnagar News: जहां कभी पांच रुपये में पढ़ाते थे शास्त्री जी, अब वहीं लगेगी उनकी प्रतिमा
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चरथावल स्थित बिरालसी में दयानंद गुरुकुल इंटर कॉलेज। संवाद
मुजफ्फरनगर। देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की युवावस्था की स्मृतियों से जुड़ा दयानंद गुरुकुल इंटर कॉलेज बिरालसी अब उनकी यादों को प्रतिमा के रूप में सहेजने जा रहा है। गुरुकुल में लाल बहादुर ने कभी पांच रुपये मासिक वेतन पर विद्यार्थियों को पढ़ाया था। अब उसी परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित की जाएगी। कनखल के कारीगर प्रतिमा तैयार कर रहे हैं। विद्यार्थियों को उनके गुरुकुल से जुड़े जीवन और राष्ट्रसेवा के उनके सफर की जानकारी मिलेगी।
लाल बहादुर शास्त्री का जिले से गहरा जुड़ाव रहा है। आजादी से पहले आर्थिक परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। शिक्षा पूरी करने के बाद आजीविका की तलाश में वह बिरालसी स्थित गुरुकुल पहुंचे। यहां उन्हें ब्रह्मचारियों को संस्कृत और हिंदी पढ़ाने की जिम्मेदारी मिली। इसके लिए उन्हें पांच रुपये मासिक वेतन मिलता था। उस समय गुरुकुल में करीब 55 विद्यार्थी अध्ययन करते थे।
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संस्कृत और हिंदी पढ़ाते थे शास्त्रीजी
विद्यालय के प्रधानाचार्य पदमाकर यादव ने बताया कि यहां के बुजुर्गों से लाल बहादुर के यहां रहने और पढ़ाने के बारे में जानकारी मिली है। वह विद्यार्थियों को संस्कृत और हिंदी पढ़ाते थे। सादगी और अनुशासन से उन्होंने गुरुकुल से जुड़े लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई थी। गुरुकुल का यह दौर उनके जीवन में आगे आने वाले संघर्ष और राष्ट्रसेवा की दिशा तय करने वाला बना। बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रियता बढ़ी तो उन्होंने अध्यापन का दायित्व छोड़ दिया। इसके बाद खादी, हिंदी, अछूतोद्धार और स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश पहुंचाने में जुट गए।
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विद्यार्थियों को बताएगी शास्त्रीजी की जीवन यात्रा
डीआईओएस हरिकेश यादव ने बताया कि विद्यालय में शास्त्रीजी की प्रतिमा स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है। प्रतिमा का निर्माण पूरा होते ही इसे विद्यालय परिसर में स्थापित कराया जाएगा। गुरुकुल में अध्यापन से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका और देश के प्रधानमंत्री के रूप में उनके योगदान तक की जीवन यात्रा नई पीढ़ी को प्रेरणा देगी।
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लाल बहादुर शास्त्री का जिले से गहरा जुड़ाव रहा है। आजादी से पहले आर्थिक परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। शिक्षा पूरी करने के बाद आजीविका की तलाश में वह बिरालसी स्थित गुरुकुल पहुंचे। यहां उन्हें ब्रह्मचारियों को संस्कृत और हिंदी पढ़ाने की जिम्मेदारी मिली। इसके लिए उन्हें पांच रुपये मासिक वेतन मिलता था। उस समय गुरुकुल में करीब 55 विद्यार्थी अध्ययन करते थे।
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संस्कृत और हिंदी पढ़ाते थे शास्त्रीजी
विद्यालय के प्रधानाचार्य पदमाकर यादव ने बताया कि यहां के बुजुर्गों से लाल बहादुर के यहां रहने और पढ़ाने के बारे में जानकारी मिली है। वह विद्यार्थियों को संस्कृत और हिंदी पढ़ाते थे। सादगी और अनुशासन से उन्होंने गुरुकुल से जुड़े लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई थी। गुरुकुल का यह दौर उनके जीवन में आगे आने वाले संघर्ष और राष्ट्रसेवा की दिशा तय करने वाला बना। बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रियता बढ़ी तो उन्होंने अध्यापन का दायित्व छोड़ दिया। इसके बाद खादी, हिंदी, अछूतोद्धार और स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश पहुंचाने में जुट गए।
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विद्यार्थियों को बताएगी शास्त्रीजी की जीवन यात्रा
डीआईओएस हरिकेश यादव ने बताया कि विद्यालय में शास्त्रीजी की प्रतिमा स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है। प्रतिमा का निर्माण पूरा होते ही इसे विद्यालय परिसर में स्थापित कराया जाएगा। गुरुकुल में अध्यापन से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका और देश के प्रधानमंत्री के रूप में उनके योगदान तक की जीवन यात्रा नई पीढ़ी को प्रेरणा देगी।

चरथावल स्थित बिरालसी में दयानंद गुरुकुल इंटर कॉलेज। संवाद

चरथावल स्थित बिरालसी में दयानंद गुरुकुल इंटर कॉलेज। संवाद