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अंग्रेजों की कठिन यातनाएं भी नही रोक पाई स्वतंत्रता सेनानी बलवंत सिंह के कदम

Mon, 15 Aug 2022 12:15 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 15 Aug 2022 12:15 AM IST
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The steps of Balwant Singh could not stop even the tortures of the British
- 1941 में सत्याग्रह के दौरान दो माह की कठोर कारावास के साथ 50 रुपये का दिया गया था अर्थदंड
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- 1951 में विधानसभा का चुनाव जीतकर भोकरहेड़ी निवासी बलवंत सिंह बने थे विधायक
संवाद न्यूज एजेंसी
भोपा। भोकरहेड़ी निवासी स्वतंत्रता सेनानी बलवंत सिंह देश की आजादी के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। सत्याग्रह के दौरान उन्हें दो माह की कठोर कारावास और अर्थदंड दिया गया था। जेल में मिली यातनाएं बलवंत सिंह की आजादी के जुनून को रोक नहीं सकी।
बलवंत सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से शुरू की। 25 जून 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने दो माह की सश्रम कारावास और 50 रुपये की अर्थदंड की सजा सुनाई। उन्हें जेल में काफी यातनाएं दी गई। मगर, उनके जुनून को अंग्रेजी हुकूमत भी रोक नहीं सके। आजादी के बाद 1951 में विधायक चुने गए। बलवंत सिंह एक अच्छे अधिवक्ता भी थे। ेयरमैन जिला परिषद मुजफ्फर नगर के अध्यक्ष भी रहे। 11 मार्च 2000 में उनका निधन हो गया था। उनके बेटे राजेंद्र सिंह आईएएस अधिकारी रहे। पौत्र अनिल राजकुमार (पीसीएस) कमिश्नर के पद से सेवानिवृत्त है, जो नोएडा में रहते हैं।
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स्वतंत्रता सेनानी बाबू बलवंत सिंह के वंशज व पूर्व चेयरमैन राजेश कुमार सहित राम कुमार शर्मा, पूर्व चेयरमैन कैप्टन ज्ञानेंद्र सिंह, चेयरमैन पति रविदत्त, जोगेंद्र वर्मा, उदयवीर सिंह, नीटू सहरावत, ब्रजवीर सेहरावत आदि का कहना है कि भोकरहेड़ी का बच्चा-बच्चा स्वतंत्रता सेनानी बलवंत सिंह पर गौरव महसूस करता है।
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बलवंत सिंह आर्य समाज में रखते थे आस्था
स्वतंत्रता सेनानी बाबू बलवंत सिंह आर्य समाज में आस्था रखते थे। स्कूलों और धर्मशालाओं आदि से नजदीकी रिश्ता रहा है। वह अपने क्षेत्र के ही स्कूलों और धर्मशाला के लिए ही नहीं शुकतीर्थ, मुजफ्फरनगर के भी कई प्रसिद्ध स्कूलों और धर्मशालाओं के अध्यक्ष व सदस्य आदि रहे।
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