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कागजों में हेराफेरी कर कब्जाई थी जमीन: एसडीएम कोर्ट

Fri, 22 Jan 2021 11:32 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 22 Jan 2021 11:32 PM IST
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The land was captured by manipulating papers: SDM court
कागजों में हेराफेरी कर कब्जाई थी जमीन: एसडीएम कोर्ट
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मुजफ्फरनगर। एसडीएम (उपजिलाधिकारी) कोर्ट ने आदेश में कहा है कि जालसाजी, कूटरचना या कपट से प्राप्त की गई भूमि में लाला रघुराज स्वरूप एवं उनके उत्तराधिकारियों अलोक स्वरूप एवं अनिल स्वरूप निवासी राजभवन, भोपा रोड और ललिता कुमार गुप्ता, कुसुम कुमारी, ओमप्रकाश गुप्ता, अतुल गुप्ता, अपर्णा वारिसान लाला दीपचंद को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। एसडीएम ने अपने आदेश में यह भी लिखा है कि प्रविष्टियों में कूट रचना करने वाले व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना उचित नहीं है। इसके बाद भी प्रतिवादीगणों को नोटिस भेजकर जवाब व साक्ष्य के लिए अवसर दिया गया। इसके बाद भी कोई जवाब और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। हालांकि अनिल स्वरूप का कहना है कि उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।

एसडीएम सदर दीपक कुमार की कोर्ट ने भोपा रोड पर पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री और मुजफ्फरनगर के जमीदार रहे लियाकत अली खां के चाचा रूस्तम अली खां की ग्राम यूसुफपुर में करीब सौ बीघा जमीन को लेकर यह निर्णय दिया है। कोर्ट ने कहा है कि रघुराज स्वरूप के नाम की प्रविष्टि शिकमी काश्तकार के रूप में दर्ज थी। कुछ भूमि पर 1360 फसली से पूर्व ही लाला रघुराज स्वरूप ने अवैध तरीके से संक्रमणीय अधिकार अर्जित कर लिए थे। शेष भूमि खसरा नंबर 365, 366, 371, 372, 373, 377, 379, 382, 383, 384 पर अधिवासी/ आसामी अधिकार जमींदारी खात्मा के दौरान वर्ष 1961 में लाला रघुराज स्वरूप को प्राप्त होने थे और भूमि नियमानुसार नियत अवधि के पश्चात राज्य सरकार में निहित होनी चाहिए थी, परंतु लाला रघुराज स्वरूप ने जमीन राज्य सरकार में निहित नहीं होने दी। कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी लिखा है कि मौरूसी काश्तकार के अधिकार अर्जित कर लेने के उपरांत लाला रघुराज स्वरूप की परिपाटी पर चलते हुए आलोक स्वरूप आदि ने खतौनी में मौरूसी काश्तकार के साथ-साथ खेवट चौसाला में भी जमींदार के रूप में एंट्री करा ली और जमींदार के रूप में ट्रांसफेरेबल अधिकार अर्जित कर लिए। कोर्ट ने कहा कि 21 मार्च 2020 की तत्कालीन तहसीलदार रणजीत सिंह की रिपोर्ट के आधार पर कूट रचित प्रविष्टियों को राजस्व अभिलेखों में निरस्त किया जाता है। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 के अंतर्गत निरस्त कर भूमि को राज्य सरकार में दर्ज किया जाता है। भूमि को कब्जे में लेने के लिए तहसीलदार सदर को आदेश जारी किए गए है।
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