{"_id":"5b47a9e54f1c1bc5248b637c","slug":"special-2-on-swami-kalyandev-s-death-anniversary","type":"story","status":"publish","title_hn":"ग्रामोत्थान को शिक्षा की अलख जगा गए कल्याणदेव ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ग्रामोत्थान को शिक्षा की अलख जगा गए कल्याणदेव
ब्यूरो, अमर उजाला/मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 13 Jul 2018 12:50 AM IST
विज्ञापन
तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के साथ स्वामी कल्याणदेव।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शिक्षा ऋषि स्वामी कल्याणदेव ने ब्रिटिश दौर में ही अनपढ़ समाज की पीड़ा को समझ लिया था। ग्रामोत्थान के लिए वीतराग संत ने शिक्षा को मुख्य आधार बनाने की ठानी। वर्ष 1926 में मंसूरपुर क्षेत्र के गांव दूधाहेड़ी में उन्होंने पहली प्राथमिक पाठशाला स्थापित की।
तब दस रुपये दान देना भी दुश्वार था, मगर उनकी प्रेरणा से ग्रामीणों ने न केवल चंदा दिया, बल्कि विद्यालयों के लिए जमीने भी दान की। दीर्घायु जीवन में तीन सदी के युगदृष्टा ने करीब 300 शिक्षण संस्था, धर्मार्थ औषधालय, पॉलिटैक्निक, आयुर्वेदिक कॉलेज और गुरुकुल खुलवाए।
अंग्रेजी शासन काल में आम जनता शिक्षा से दूर थी। गांवों में चिट्ठी पत्री को पढ़वाने के लिए भी ढूंढ मचती थी। स्वतंत्रता आंदोलन में ग्रामीण अंचल में घूमने के दौरान ही स्वामी कल्याणदेव ने महसूस किया कि गांव की उन्नति में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। मंसूरपुर इलाके में दूधाहेडी गांव में शिक्षा ऋषि ने पहली पाठशाला की नींव रखी।
विज्ञापन
खुद जिले के डीएम जीके डार्लिंग ने वहां पहुंचकर उनके कार्य को सहमति दी। शिक्षा का माहौल बना तो दूधाहेडी गांव में होनहार प्रतिभाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इसके बाद उन्होंने शिक्षा एक सूत्रीय कार्यक्रम चला दिया। देश में गरीबी थी और चंदा एकत्रित करना भी कठिन था।
स्वामी ने अपने त्याग और सेवा से ग्रामीणों में शिक्षा की अलख जगाई। उन्हें दान को प्रेरित किया। स्कूल-कॉलेज बनवाने को किसानों से जमीनें ली और दानवीर सेठों से धन की व्यवस्था की। विश्वसनीय हाथों में शिक्षण संस्था के निर्माण की जिम्मेदारी सौंप दी जाती। प्रबंधन भी स्थानीय नागरिकों को ही दे देते थे। हर धर्म और जाति के लोगों से कॉलेज खोलने में सहयोग लिया, जिससे हर तबका अपनापन महसूस करने लगा।
शिक्षा ऋषि ने बघरा और भोपा क्षेत्र में सबसे ज्यादा शिक्षण संस्थाएं दी। शिक्षाविद् गजेंद्रपाल सिंह बताते हैं कि बघरा में नवोदय विद्यालय की स्थापना के लिए कर्मयोगी संत ने 100 बीघा जमीन केंद्र सरकार को दे दी थी। कृषि विज्ञान केंद्र के लिए उन्होंने शामली जिले के जलालपुर गांव में अपनी संस्था की 80 बीघा भूमि दान दी।
जनता इंटर कॉलेज भोपा के पूर्व प्राचार्य महावीर सिंह राठी के मुताबिक संत के आग्रह पर तत्कालीन सीएम चौधरी चरण सिंह कॉलेज में पधारे और सभा में कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में जो कार्य स्वामी कल्याणदेव ने किया है, उसे सरकार भी नहीं कर सकती।
चौधरी साहब ने स्वामी के कहने पर मुजफ्फरनगर में भूमि अधिग्रहण कराकर समाज कल्याण विभाग से अंबेडकर छात्रावास का निर्माण कराया था। शहर में भोपा रोड पर गांधी पॉलिटेक्निक और रामपुर तिराहे पर राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज उनकी बड़ी संस्थाएं हैं। शिक्षा क्षेत्र में स्वामी कल्याणदेव के विशिष्ट योगदान के कारण भारत सरकार ने उन्हें पदमश्री और पद्मभूषण जैसे राष्ट्रीय अलंकरणों से नवाजा।
विज्ञापन
तब दस रुपये दान देना भी दुश्वार था, मगर उनकी प्रेरणा से ग्रामीणों ने न केवल चंदा दिया, बल्कि विद्यालयों के लिए जमीने भी दान की। दीर्घायु जीवन में तीन सदी के युगदृष्टा ने करीब 300 शिक्षण संस्था, धर्मार्थ औषधालय, पॉलिटैक्निक, आयुर्वेदिक कॉलेज और गुरुकुल खुलवाए।
विज्ञापन
अंग्रेजी शासन काल में आम जनता शिक्षा से दूर थी। गांवों में चिट्ठी पत्री को पढ़वाने के लिए भी ढूंढ मचती थी। स्वतंत्रता आंदोलन में ग्रामीण अंचल में घूमने के दौरान ही स्वामी कल्याणदेव ने महसूस किया कि गांव की उन्नति में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। मंसूरपुर इलाके में दूधाहेडी गांव में शिक्षा ऋषि ने पहली पाठशाला की नींव रखी।
विज्ञापन
खुद जिले के डीएम जीके डार्लिंग ने वहां पहुंचकर उनके कार्य को सहमति दी। शिक्षा का माहौल बना तो दूधाहेडी गांव में होनहार प्रतिभाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इसके बाद उन्होंने शिक्षा एक सूत्रीय कार्यक्रम चला दिया। देश में गरीबी थी और चंदा एकत्रित करना भी कठिन था।
स्वामी ने अपने त्याग और सेवा से ग्रामीणों में शिक्षा की अलख जगाई। उन्हें दान को प्रेरित किया। स्कूल-कॉलेज बनवाने को किसानों से जमीनें ली और दानवीर सेठों से धन की व्यवस्था की। विश्वसनीय हाथों में शिक्षण संस्था के निर्माण की जिम्मेदारी सौंप दी जाती। प्रबंधन भी स्थानीय नागरिकों को ही दे देते थे। हर धर्म और जाति के लोगों से कॉलेज खोलने में सहयोग लिया, जिससे हर तबका अपनापन महसूस करने लगा।
शिक्षा ऋषि ने बघरा और भोपा क्षेत्र में सबसे ज्यादा शिक्षण संस्थाएं दी। शिक्षाविद् गजेंद्रपाल सिंह बताते हैं कि बघरा में नवोदय विद्यालय की स्थापना के लिए कर्मयोगी संत ने 100 बीघा जमीन केंद्र सरकार को दे दी थी। कृषि विज्ञान केंद्र के लिए उन्होंने शामली जिले के जलालपुर गांव में अपनी संस्था की 80 बीघा भूमि दान दी।
जनता इंटर कॉलेज भोपा के पूर्व प्राचार्य महावीर सिंह राठी के मुताबिक संत के आग्रह पर तत्कालीन सीएम चौधरी चरण सिंह कॉलेज में पधारे और सभा में कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में जो कार्य स्वामी कल्याणदेव ने किया है, उसे सरकार भी नहीं कर सकती।
चौधरी साहब ने स्वामी के कहने पर मुजफ्फरनगर में भूमि अधिग्रहण कराकर समाज कल्याण विभाग से अंबेडकर छात्रावास का निर्माण कराया था। शहर में भोपा रोड पर गांधी पॉलिटेक्निक और रामपुर तिराहे पर राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज उनकी बड़ी संस्थाएं हैं। शिक्षा क्षेत्र में स्वामी कल्याणदेव के विशिष्ट योगदान के कारण भारत सरकार ने उन्हें पदमश्री और पद्मभूषण जैसे राष्ट्रीय अलंकरणों से नवाजा।