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आत्म संतोष ही सबसे बड़ा धन है

Sat, 18 Sep 2021 12:03 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 18 Sep 2021 12:03 AM IST
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Self satisfaction is the greatest wealth
शाहपुर में दशलक्षण पर्व पर पूजा अर्चना करते जैन समाज के लोग। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
आत्म संतोष ही सबसे बड़ा धन है
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मुजफ्फरनगर, खतौली। पर्यूषण पर्व के आठवें दिन श्रद्धालुओं ने मंदिर में वीतरागी प्रभु का अभिषेक करते हुए पूजन किया। संगीतमयी पूजन करते हुए जिनेंद्र भगवान की भक्ति में अर्ध्य समर्पित किए गए। नगर के नौ जैन मंदिरों में जैन धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में एकत्रित हुए।
इस अवसर पर धर्मसभा में कल्पेंद्र जैन ने कहा कि हम उत्तम त्याग धर्म की आराधना कर रहे हैं। हमें जीवन से राग, द्वेष, मोह को त्यागना है, जो आत्मा के स्वभाव नहीं है। इन्हें छोड़ना ही वास्तविक त्याग धर्म है। मनुष्य के कर्म व उसका सात्विक आचरण ही उसे साथ जाता है। जीवन में बुरी प्रवृति व आदतों का त्याग ही वास्तविक पुण्यार्जन है। त्याग की प्रवृति वाला व्यक्ति आत्म संतोषी होता है। आत्म संतोष ही सबसे बड़ा धन है। परोपकार को संतों ने प्रमुख धर्म कहा है।
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रात्रि में सभी मंदिरों में भक्तिमयी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गई। विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों ने पुरस्कार जीते। जैन मंडी मंदिर में बच्चों की परिधान प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। नन्हे मुन्ने बच्चों ने धर्म से संबंधित चरित्रों का प्रदर्शित किया। बच्चों ने सभी का मन मोह लिया। दशलक्षण पर्व त्याग के पर्व है। इस अवसर पर सुनील ठेकेदार, आदीश प्रवक्ता, हंसकुमार, विपिन, अजय, सुधीर मुखिया, राकेश, पतेंद्र जैन, अरुण नंगली, अशोक, नीरज, बंटी, एलएम जैन, भूषण, नरेश, बबलू, मनीष जैन, विकास, अनुपम जैन, मुकेश जैन, निशांत, पवन तार, हितेश, राहुल, कमल सराय, विवेक, मनोज आढ़ती, अजय किराना, अकलंक, कौशल, सुधा, दीप्ती, मंजू, शशी, संगीता, निधि रहे।
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दशलक्षण पर्व पर की विशेष पूजा-अर्चना
शाहपुर। दशलक्षण पर्व पर जैन समाज के लोगों ने शुक्रवार को कस्बे के जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की।
मोहल्ला महाजनान स्थित पद्मप्रमु जिनालय, नेमिनाथ जिनालय, मंगलापुरी मंडी स्थित शांतिनाथ जिनालय व मुजफ्फरनगर रोड स्थित मुनि सुव्रतनाथ मानस्तंभ पर श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। सकल जैन समाज के संरक्षक बालेश जैन ने बताया कि उत्तम त्याग धर्म हमें बुराइयों को छोड़ने के साथ ही अपनी इच्छाओं व भावनाओं का त्याग करना भी सिखाता है। जैन धर्म में त्याग की भावना सबसे अधिक है। जैन संत सर्वत्र त्यागकर दिगंबर मुद्रा धारण कर जीवन व्यतीत करते हैं। त्याग की भावना आत्मा को शुद्ध बनाने पर ही होती है। सुंदरलाल जैन, अरविंद जैन, राकेश जैन, धनेंद्र जैन, मदन, सतीश, अमित जैन, मनोज जैन मौजूद रहे।

खतौली जैन मंदिर में पूजा अर्चना करते हुए श्रद्धालू।

खतौली जैन मंदिर में पूजा अर्चना करते हुए श्रद्धालू।- फोटो : MUZAFFARNAGAR

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