{"_id":"5c7c222ebdec22737a369461","slug":"rathiram-fought-two-wars-against-pak","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुजफ्फरनगर के जीवना निवासी रतिराम ने लड़ी पाक के खिलाफ दो जंग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मुजफ्फरनगर के जीवना निवासी रतिराम ने लड़ी पाक के खिलाफ दो जंग
Mon, 04 Mar 2019 12:21 AM IST
Deepak Kausik
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Published by: Deepak Kausik
Updated Mon, 04 Mar 2019 12:21 AM IST
विज्ञापन
indian army
मंसूरपुर के जीवना निवासी पूर्व सैनिक लांसनायक रतिराम ने भी वर्ष 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग लड़ी थी। लड़ाई के दौरान गोला उनके नजदीक गिरने के कारण उसके कान का पर्दा फट गया था। जीवना के साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले रतिराम बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही कुश्ती का शौक था। वर्ष1962 में हाथी खाना मेरठ में सेना की भर्ती चल रही थी, वह भी भर्ती होने के लिए चले गए। वहां सैनिक के रूप में भर्ती हो गए। पहली पोस्टिंग जम्मू क्षेत्र में अंधेरी कैंप में हुई।
1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनकी पोस्टिंग जम्मू जिले के तहसील लखनूर क्षेत्र में थी। युद्ध के दौरान कुछ पाकिस्तानी सैनिक सूखी नदी से गायों की आड़ लेकर क्षेत्र में घुसने की कोशिश कर रहे थे। हम समझ गए कि रात के समय यहां गाय नहीं आ सकती। माजरा कुछ और है। हमने फायरिंग की, तो गाय दूर भाग गई। पीछे पाकिस्तानी सैनिक थे। गोलीबारी करके पाक के सात सैनिकों को मार गिराया। वर्ष 1971 के युद्ध के दौरान वे बंगाल के बमनवाड़ी क्षेत्र में तैनात थे।
वहां 14 दिन चली लड़ाई में उन्होंने तथा उनके साथियों ने 11 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर 94 सैनिकों को बंदी बना लिया। इस दौरान पाकिस्तानी सेना का एक गोला उनके तथा उनके साथियों के पास आकर गिरा, जिसके धमाके की आवाज से उनका कान का पर्दा फट गया। तभी से उन्हें एक कान से सुनाई देता है। प्रमोशन पाकर वे लांस नायक के पद तक पहुंचे और वर्ष 1978 में सेवानिवृत्त हुए।
विज्ञापन
पूर्व सैनिक रतिराम का कहना है कि आज पहले की अपेक्षा सेना के पास आधुनिक संचार तंत्र तथा आधुनिक हथियार हैं। भारतीय सैनिकों का मनोबल तो हमेशा ऊंचा ही रहता है, बहुत कुछ राजनैतिक लोगों की इच्छा शक्ति पर भी निर्भर करता है। उनका कहना है कि सरकार को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध को निर्णायक मोड़ पर ले जाना चाहिए। वयोवृद्घ रतिराम इस उम्र में भी तीनों बेटों बलबीर, यशपाल तथा यशवीर के साथ खेती करते है।
विज्ञापन
1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनकी पोस्टिंग जम्मू जिले के तहसील लखनूर क्षेत्र में थी। युद्ध के दौरान कुछ पाकिस्तानी सैनिक सूखी नदी से गायों की आड़ लेकर क्षेत्र में घुसने की कोशिश कर रहे थे। हम समझ गए कि रात के समय यहां गाय नहीं आ सकती। माजरा कुछ और है। हमने फायरिंग की, तो गाय दूर भाग गई। पीछे पाकिस्तानी सैनिक थे। गोलीबारी करके पाक के सात सैनिकों को मार गिराया। वर्ष 1971 के युद्ध के दौरान वे बंगाल के बमनवाड़ी क्षेत्र में तैनात थे।
विज्ञापन
वहां 14 दिन चली लड़ाई में उन्होंने तथा उनके साथियों ने 11 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर 94 सैनिकों को बंदी बना लिया। इस दौरान पाकिस्तानी सेना का एक गोला उनके तथा उनके साथियों के पास आकर गिरा, जिसके धमाके की आवाज से उनका कान का पर्दा फट गया। तभी से उन्हें एक कान से सुनाई देता है। प्रमोशन पाकर वे लांस नायक के पद तक पहुंचे और वर्ष 1978 में सेवानिवृत्त हुए।
विज्ञापन
पूर्व सैनिक रतिराम का कहना है कि आज पहले की अपेक्षा सेना के पास आधुनिक संचार तंत्र तथा आधुनिक हथियार हैं। भारतीय सैनिकों का मनोबल तो हमेशा ऊंचा ही रहता है, बहुत कुछ राजनैतिक लोगों की इच्छा शक्ति पर भी निर्भर करता है। उनका कहना है कि सरकार को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध को निर्णायक मोड़ पर ले जाना चाहिए। वयोवृद्घ रतिराम इस उम्र में भी तीनों बेटों बलबीर, यशपाल तथा यशवीर के साथ खेती करते है।