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खुद को खतरे में डाल जीवन बांट रहे चिकित्सक
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खुद को खतरे में डाल जीवन बांट रहे चिकित्सक
मुजफ्फरनगर। कोरोना महामारी में जहां कहर कोई एक दूसरे से बच रहा है वहां चिकित्सकों ने जान जोखिम में डालकर अपना फर्ज निभाया। आइसोलेशन में रहने वाले मरीजों को डाक्टरों के मित्रवत व्यवहार ने हौसला दिया और उनके ठीक होने में मदद की। ज्यादातर मरीज तो ऐसे हैं जिन्हें दवा की जरूरत ही नहीं पड़ी, वे खुद ही ठीक होकर लौट आए। मुजफ्फरनगर मेडिकल कॉलेज बेरागजपुर से ठीक होकर लौटे संक्रमितों ने चिकित्सकों के हौसले को सराहा।
पीपीई किट में रहना ही हिम्मत की बात
मुजफ्फरनगर। एक सप्ताह से कोविड-19 अस्पताल बेगराजपुर से डिस्चार्ज होकर लौटे अलमासपुर के मनोज कुमार चिकित्सकों के हौसले को सराहते हैं। उनके साथ परिवार की दो महिलाएं व दो लड़कियां भी भर्ती थीं। मनोज बताते हैं कि भीषण गर्मी में दिन भर पीपीई किट पहने रहना ही मुश्किल काम है। ऐसी गर्मी में तो साधारण कपड़ों में रहना भी मुश्किल होता है। वह बताते हैं कि परिवार के किसी सदस्य को दवा की जरूरत नहीं पड़ी। रोजाना चिकित्सक आते थे और हालचाल पूछते थे। सभी को अच्छा और सकारात्मक सोचने के लिए प्रेरित करते थे। वार्ड में भर्ती अन्य मरीजों का भी हौसला बढ़ाते थे।
चिकित्सकों ने रखा मित्रवत व्यवहार
खतौली। मोहल्ला इस्लामनगर निवासी शाहिद ने बताया कि उसका भाई दिल्ली शाहीन बाग में पानी सप्लाई का काम करता था। लॉकडाउन में घर आने के बाद उसकी मौत हो गई थी। परिवार के सदस्यों की जंाच में मां, बहन, भतीजी, भतीजे समेत वह भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। वह बेगराजपुर मेडिकल कॉलेज में 22 दिन रहा। उन्हें किसी प्रकार की दवा की जरूरत नहीं पड़ी। चिकित्सकों का व्यवहार बेहद सकारात्मक रहा। वे हमें हौसला बंधाते थे। डाक्टर से ज्यादा उनका व्यवहार एक मित्र की तरह होता था। कोरोना महामारी में जहां अपने ही दूरी बना रहे हैं, चिकित्सकों की सेवाएं काबिल-ए-तारीफ हैं।
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डाक्टरों ने समझाया कालकोठरी नहीं आइसोलेशन
भौराकलां। ससौली निवासी मंजू देवी आठ अप्रैल को जिले की पहली कोरोना पॉजिटिव पाई गई थी। उन्हें नोएडा में कोरोना का पता लगा था और वहीं पर भर्ती रहीं। वह बताती हैं कि पता लगने पर वह बेहद डरी हुई थी लेकिन चिकित्सकों ने हौसला बंधाया। डॉक्टर्स, नर्सों के मधुर व्यवहार के कारण हौसला बना रहा। एक बार लगा कि परिवार का क्या होगा। डॉक्टरों ने समझाया बीमारी साधारण खांसी-बुखार की तरह है, केवल ठीक होने में समय लगेगा। जांच रिपोर्ट के लिए सैंपल देने में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई। नर्सों ने घर जैसा माहौल देकर अपनापन दिया। परिवार की कमी महसूस नहीं होने दी। क्वारंटीन कालकोठरी नहीं है संक्रमण परिवार में न फैले इसीलिए अलग रखा गया। बचाव ही जीवन है। चिकित्सकों का सहयोग और मजबूत इरादे इस बीमारी को हरा सकते हैं।
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मुजफ्फरनगर। कोरोना महामारी में जहां कहर कोई एक दूसरे से बच रहा है वहां चिकित्सकों ने जान जोखिम में डालकर अपना फर्ज निभाया। आइसोलेशन में रहने वाले मरीजों को डाक्टरों के मित्रवत व्यवहार ने हौसला दिया और उनके ठीक होने में मदद की। ज्यादातर मरीज तो ऐसे हैं जिन्हें दवा की जरूरत ही नहीं पड़ी, वे खुद ही ठीक होकर लौट आए। मुजफ्फरनगर मेडिकल कॉलेज बेरागजपुर से ठीक होकर लौटे संक्रमितों ने चिकित्सकों के हौसले को सराहा।
पीपीई किट में रहना ही हिम्मत की बात
मुजफ्फरनगर। एक सप्ताह से कोविड-19 अस्पताल बेगराजपुर से डिस्चार्ज होकर लौटे अलमासपुर के मनोज कुमार चिकित्सकों के हौसले को सराहते हैं। उनके साथ परिवार की दो महिलाएं व दो लड़कियां भी भर्ती थीं। मनोज बताते हैं कि भीषण गर्मी में दिन भर पीपीई किट पहने रहना ही मुश्किल काम है। ऐसी गर्मी में तो साधारण कपड़ों में रहना भी मुश्किल होता है। वह बताते हैं कि परिवार के किसी सदस्य को दवा की जरूरत नहीं पड़ी। रोजाना चिकित्सक आते थे और हालचाल पूछते थे। सभी को अच्छा और सकारात्मक सोचने के लिए प्रेरित करते थे। वार्ड में भर्ती अन्य मरीजों का भी हौसला बढ़ाते थे।
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चिकित्सकों ने रखा मित्रवत व्यवहार
खतौली। मोहल्ला इस्लामनगर निवासी शाहिद ने बताया कि उसका भाई दिल्ली शाहीन बाग में पानी सप्लाई का काम करता था। लॉकडाउन में घर आने के बाद उसकी मौत हो गई थी। परिवार के सदस्यों की जंाच में मां, बहन, भतीजी, भतीजे समेत वह भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। वह बेगराजपुर मेडिकल कॉलेज में 22 दिन रहा। उन्हें किसी प्रकार की दवा की जरूरत नहीं पड़ी। चिकित्सकों का व्यवहार बेहद सकारात्मक रहा। वे हमें हौसला बंधाते थे। डाक्टर से ज्यादा उनका व्यवहार एक मित्र की तरह होता था। कोरोना महामारी में जहां अपने ही दूरी बना रहे हैं, चिकित्सकों की सेवाएं काबिल-ए-तारीफ हैं।
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डाक्टरों ने समझाया कालकोठरी नहीं आइसोलेशन
भौराकलां। ससौली निवासी मंजू देवी आठ अप्रैल को जिले की पहली कोरोना पॉजिटिव पाई गई थी। उन्हें नोएडा में कोरोना का पता लगा था और वहीं पर भर्ती रहीं। वह बताती हैं कि पता लगने पर वह बेहद डरी हुई थी लेकिन चिकित्सकों ने हौसला बंधाया। डॉक्टर्स, नर्सों के मधुर व्यवहार के कारण हौसला बना रहा। एक बार लगा कि परिवार का क्या होगा। डॉक्टरों ने समझाया बीमारी साधारण खांसी-बुखार की तरह है, केवल ठीक होने में समय लगेगा। जांच रिपोर्ट के लिए सैंपल देने में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई। नर्सों ने घर जैसा माहौल देकर अपनापन दिया। परिवार की कमी महसूस नहीं होने दी। क्वारंटीन कालकोठरी नहीं है संक्रमण परिवार में न फैले इसीलिए अलग रखा गया। बचाव ही जीवन है। चिकित्सकों का सहयोग और मजबूत इरादे इस बीमारी को हरा सकते हैं।