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ध्वनि प्रदूषण में भी होगा इजाफा
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ध्वनि प्रदूषण में भी होगा इजाफा
मुजफ्फरनगर। दिवाली पर न केवल वायु प्रदूषण बल्कि ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ जाता है। यह सेहत के लिए काफी खतरनाक होता है। ज्यादा ध्वनि प्रदूषण सुनने की क्षमता, हृदय तथा तंत्रिका तंत्र पर गंभीर असर डालता है। तेज आवाज के पटाखों से बचना ही ध्वनि प्रदूषण से बचने का एकमात्र उपाय है।
दिवाली पर छुड़ाए जाने वाल पटाखे न केवल धुआं पैदा करते हैं, बल्कि इनमें तेज आवाज भी होती है। इनसे ध्वनि प्रदूषण होता है। लोगों में तेज आवाज वाले पटाखों को लेकर क्रेज होता है। हर कोई ज्यादा शोर वाले पटाखे छुड़ाना चाहता है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव पर ध्यान नहीं देता। फिजिशियन डॉ योगेंद्र त्रिखा बताते हैं कि ज्यादा शोर का मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह हमारे तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। जानकारों के अनुसार 100 डेसिबल से ज्यादा आवाज सुनने की क्षमता को प्रभावित करती है। औद्योगिक क्षेत्र में दिन में 75 तथा रात में 70 डेसीबल का शोर मानक के अनुरूप है। आवासीय क्षेत्र में दिन में 55 तथा रात में 45 डेसीबल की ध्वनि का मानक होता है। इससे ज्यादा आवाज ध्वनि प्रदूषण के अंतर्गत आती है। मानक से ज्यादा ध्वनि दिमाग की कोशिका को प्रभावित करती है। ज्यादा समय तक ध्वनि प्रदूषण में रहने वाला व्यक्ति को ऊंची आवाज में सुनने, चिड़चिड़ापन, नींद न आने जैसी समस्याएं होती हैं।
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मुजफ्फरनगर। दिवाली पर न केवल वायु प्रदूषण बल्कि ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ जाता है। यह सेहत के लिए काफी खतरनाक होता है। ज्यादा ध्वनि प्रदूषण सुनने की क्षमता, हृदय तथा तंत्रिका तंत्र पर गंभीर असर डालता है। तेज आवाज के पटाखों से बचना ही ध्वनि प्रदूषण से बचने का एकमात्र उपाय है।
दिवाली पर छुड़ाए जाने वाल पटाखे न केवल धुआं पैदा करते हैं, बल्कि इनमें तेज आवाज भी होती है। इनसे ध्वनि प्रदूषण होता है। लोगों में तेज आवाज वाले पटाखों को लेकर क्रेज होता है। हर कोई ज्यादा शोर वाले पटाखे छुड़ाना चाहता है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव पर ध्यान नहीं देता। फिजिशियन डॉ योगेंद्र त्रिखा बताते हैं कि ज्यादा शोर का मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह हमारे तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। जानकारों के अनुसार 100 डेसिबल से ज्यादा आवाज सुनने की क्षमता को प्रभावित करती है। औद्योगिक क्षेत्र में दिन में 75 तथा रात में 70 डेसीबल का शोर मानक के अनुरूप है। आवासीय क्षेत्र में दिन में 55 तथा रात में 45 डेसीबल की ध्वनि का मानक होता है। इससे ज्यादा आवाज ध्वनि प्रदूषण के अंतर्गत आती है। मानक से ज्यादा ध्वनि दिमाग की कोशिका को प्रभावित करती है। ज्यादा समय तक ध्वनि प्रदूषण में रहने वाला व्यक्ति को ऊंची आवाज में सुनने, चिड़चिड़ापन, नींद न आने जैसी समस्याएं होती हैं।
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