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सबक लेने को कोई तैयार नहीं, बीते नौ माह में 27 बच्चों ने दम तोड़ा

Tue, 07 Jan 2020 11:57 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 07 Jan 2020 11:57 PM IST
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No one is ready to take lessons, 27 children died in last nine months
सबक लेने को कोई तैयार नहीं, बीते नौ माह में 27 बच्चों ने दम तोड़ा
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मुजफ्फरनगर। राजस्थान राज्य के कोटा में शिशुओं की मौत के बाद से स्वास्थ्य महकमा सबक लेने को तैयार नहीं है। जिला महिला अस्पताल की एसएनसीयू में ही बीते नौ माह में 27 बच्चे दम तोड़ गए। वर्ष 2018 में भी बच्चों की मौत का यही आंकड़ा था। संस्थागत प्रसव, टीकाकरण और पोषण मिशन जैसी सुविधाएं बाल मृत्यु दर को कम करने में सहायक तो हुई हैं, लेकिन अभी भी एक हजार में से करीब 40 बच्चे विभिन्न कारणों से एक साल में दुनिया से विदा हो जाते हैं।
एक दशक पहले जनपद में प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद (एक साल तक) प्रति एक हजार पर करीब 72 बच्चों की मौत का आंकड़ा था। बाल मृत्यु दर में सुधार होकर यह आंकड़ा 40 पर आ गया है। जनपद में जिला महिला अस्पताल समेत सभी ब्लॉकों पर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव की सुविधा है। महिला अस्पताल में 12 बेड की एसएनसीयू (समय पूर्व पैदा हुए नवजात को रखने वाली यूनिट) है। सीएमओ डा. प्रवीण चौपड़ा के अनुसार यहां अप्रैल 2019 से दिसंबर 2019 तक 989 शिशुओं को भर्ती किया गया। इनमें से 836 तो ठीक होकर यहां से गए, जबकि 47 को हायर सेंटर रेफर किया गया। इन नौ महीनों में यहां भर्ती हुए 27 बच्चों की मौत हो गई। बाकी बच्चों के परिजन बिना बताए ही उन्हें लेकर चले गए। अप्रैल 2018 से मार्च 2019 तक भी एक वर्ष में 27 शिशुओं की मौत हुई थी। इस वर्ष यहां पर 1514 नवजात भर्ती हुए थे। इनमें से 1382 ठीक हो गए, जबकि 55 हायर सेंटर रेफर हुए। बाकी के परिजन बिना किसी को बताए ही बच्चों को लेकर चले गए। एसीएमओ डा. वीके सिंह बताते हैं कि प्राइवेट अस्पतालों में बच्चों के जन्म एवं मृत्यु की सूचना नहीं होती। बाल मृत्यु दर की गणना सर्वे के आधार पर होती है। 2015 में सर्वे हुआ था, लेकिन इसके परिणाम नहीं आए। अब फिर से सर्वे शुरू हो रहा है।
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अभी और सुधार की आवश्यकता
मुजफ्फरनगर। बीते करीब एक दशक में बाल मृत्यु दर का आंकड़ा काफी कम हुआ है, लेकिन इसमें अभी और सुधार की आवश्यकता है। करीब एक दशक पूर्व बाल मृत्यु दर का आंकड़ा 72 था, जो सुधरकर 40 पर आ गया है। पूर्व सीएमओ एवं बाल रोग विशेषज्ञ डा. वीके जौहरी बताते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं में हो रही बढ़ोतरी और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर आम जनमानस में आई जागरूकता से बाल मृत्यु दर में कमी आई है। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा दिया जा रहा है। कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए पोषण मिशन कार्यक्रम चल रहे हैं। इन सब कार्यक्रमों से बाल मृत्यु दर का आंकड़ा तेजी से कम हो रहा है।
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जिला महिला अस्पताल में बढ़ रही सुविधाएं
जिला महिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब 30 प्रसव होते हैं। सौ बेड के इस अस्पताल में 12 बेड की एसएनसीयू है। सीएमएस डा. अमिता गर्ग का कहना है कि अभी एसएनसीयू में छह बेड और बढ़ाए जाएंगे। 18 रेडियंट वार्मर लगे हैं। इसके अतिरिक्त केएमयू (कंगारू मदर केयर यूूनिट) की स्थापना भी इस साल होनी है। वह बताती हैं कि जिला महिला अस्पताल में प्रति एक हजार प्रसव पर मुश्किल से एक या दो शिशुओं की मृत्यु होती है। इनमें भी बाहर से रेफर होकर आने वाली महिलाओं के बच्चे होते हैं।

कुपोषित बच्चों की संख्या 24 हजार
राज्य पोषण मिशन से भी बच्चों की सेहत में सुधार हो रहा है। जिले में कुपोषित बच्चों की संख्या लगभग 24 हजार है। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को वजन के आधार पर कुपोषित और अति कुपोषित श्रेणी में रखा जाता है। अतिकुपोषित श्रेणी में पाए जाने पर उन्हें जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया जाता है जहां उन्हें भर्ती कर उपचार किया जाता है। सोमवार को एनआरसी में केवल एक बच्चा भर्ती था, लेकिन कुछ दिन पहले ही यहां दस बच्चे उपचार के बाद अपने घरों को लौटे हैं। एनआरसी की प्रभारी डा. आरती नंदनवार का कहना है कि अब तक सैकड़ों बच्चे एनआरसी में भर्ती होकर स्वस्थ हो चुके हैं।
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