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नवाजुद्दीन के दिल में रह गई कसक
अमर उजाला ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 07 Oct 2016 12:36 AM IST
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नवाजुद्दीन सिद्दीकी से मुलाकात करते केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ संजीव बालियान।
- फोटो : अमर उजाला
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मुजफ्फरनगर। अभिनय ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी को अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमका दिया है। कला में कभी मजहब की दीवारें आड़े नहीं आईं। गुरु-शिष्य की परंपराओं पर गौर करें तो हिंदू-मुस्लिम का अंतर नजर नहीं आता, मगर बुढ़ाना की रामलीला में कला धर्म के आगे बौनी होती नजर आई। खुद नवाजुद्दीन के दिल में कसक है कि वह रामलीला में मारीच के अभिनय का किरदार नहीं कर पाए।
भगवान श्रीराम की लीला के मंचन से नवाजुद्दीन सिद्दीकी बचपन से ही मोहित थे। कभी ऐसा मौका नहीं मिला, जिसमें वह बुढ़ाना की रामलीला में अपना
अभिनय दिखा सकें। हालांकि किस्मत ने सिद्दीकी को बड़े परदे पर अभिनय का सरताज बना दिया। पारिवारिक विवाद के बीच अपनी साफगोई में सिद्दीकी पहली बार जिले में लोगों से इस तरह रूबरू हुए।
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मुंबई की व्यस्तता में वह कब बुढ़ाना घर आते और लौट जाते, पता ही नहीं चलता था। गुमनाम तरीके से अदाकारी में खुद को तराशते हुए नवाजुद्दीन ने फिल्म इंडस्ट्री में स्टारडम के बीच अपना अलग मुकाम बनाया, जिसे देखकर आश्चर्य होता है।
आमिर खान की सरफरोश में छोटा सा रोल पाकर सिद्दीकी ने मांझी में दा माउंटेन मैन तक आते-आते अभिनय की एक नई इबारत लिख दी है। उनका कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है।
बुढ़ाना के काजीवाड़ा मोहल्ले की गलियों किसी को गुमान नहीं था कि नवाजुद्दीन का कल इतना सुनहरा होगा। रामलीला में मारीच के रोल का न्यौता मिला तो बचपन की मुराद पूरी करने का जज्बा जग गया। सिद्दीकी ने रामलीला के कलाकारों के साथ दो दिन रिहर्सल की।
संवादों को याद किया और अपनी पैतृक जमीन पर रामभक्तों के सामने यादगार अभिनय करने की ठान ली। अचानक कुछ ऐसा घटना कि कला मजहब में बंट गई।
हिंदू संगठनों के कुछ पदाधिकारियों ने ऐतराज जता दिया कि मुस्लिम कलाकार कैसे मारीच का रोल कर सकता है। हालांकि सत्य यह है कि देशभर की रामलीलाओं में हिंदू और मुस्लिम कलाकार मिलकर मंचन करते हैं। नवाज कहते हैं कि कभी किसी रोल को मजहब के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जब भी मौका मिलेगा, वो रामलीला के मंच पर अपना अभिनय दिखाना चाहेंगे। प्रभु राम के वह प्रशंसक हैं।
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भगवान श्रीराम की लीला के मंचन से नवाजुद्दीन सिद्दीकी बचपन से ही मोहित थे। कभी ऐसा मौका नहीं मिला, जिसमें वह बुढ़ाना की रामलीला में अपना
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अभिनय दिखा सकें। हालांकि किस्मत ने सिद्दीकी को बड़े परदे पर अभिनय का सरताज बना दिया। पारिवारिक विवाद के बीच अपनी साफगोई में सिद्दीकी पहली बार जिले में लोगों से इस तरह रूबरू हुए।
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मुंबई की व्यस्तता में वह कब बुढ़ाना घर आते और लौट जाते, पता ही नहीं चलता था। गुमनाम तरीके से अदाकारी में खुद को तराशते हुए नवाजुद्दीन ने फिल्म इंडस्ट्री में स्टारडम के बीच अपना अलग मुकाम बनाया, जिसे देखकर आश्चर्य होता है।
आमिर खान की सरफरोश में छोटा सा रोल पाकर सिद्दीकी ने मांझी में दा माउंटेन मैन तक आते-आते अभिनय की एक नई इबारत लिख दी है। उनका कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है।
बुढ़ाना के काजीवाड़ा मोहल्ले की गलियों किसी को गुमान नहीं था कि नवाजुद्दीन का कल इतना सुनहरा होगा। रामलीला में मारीच के रोल का न्यौता मिला तो बचपन की मुराद पूरी करने का जज्बा जग गया। सिद्दीकी ने रामलीला के कलाकारों के साथ दो दिन रिहर्सल की।
संवादों को याद किया और अपनी पैतृक जमीन पर रामभक्तों के सामने यादगार अभिनय करने की ठान ली। अचानक कुछ ऐसा घटना कि कला मजहब में बंट गई।
हिंदू संगठनों के कुछ पदाधिकारियों ने ऐतराज जता दिया कि मुस्लिम कलाकार कैसे मारीच का रोल कर सकता है। हालांकि सत्य यह है कि देशभर की रामलीलाओं में हिंदू और मुस्लिम कलाकार मिलकर मंचन करते हैं। नवाज कहते हैं कि कभी किसी रोल को मजहब के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जब भी मौका मिलेगा, वो रामलीला के मंच पर अपना अभिनय दिखाना चाहेंगे। प्रभु राम के वह प्रशंसक हैं।