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दंगे से उबर नहीं पाए दल, रालोद के लिए अपने खोए वजूद को पाना चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Mon, 26 Sep 2016 06:37 PM IST
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दंगे के दौरान शहर में गश्त करती सेना (फाइल फोटो)।
- फोटो : अमर उजाला
दंगे से बिखरे सियासी समीकरण को राजनीतिक पार्टियां आज तक नहीं साध पाई हैं। संसदीय चुनाव में भाजपा को दंगे का लाभ मिला था, जबकि रालोद, सपा और बसपा को करारा झटका लगा। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की जंग शुरू हो चुकी है। ऐसे में दंगे को लेकर वोटों के गणित में हुए नफे-नुकसान की भरपाई को लेकर कश्मकश चल रही है। पश्चिम में रालोद के लिए अपने खोए वजूद को पाना चुनौती होगा।
मिशन 2017 के लिए सभी सियासी पार्टियों में वेस्ट यूपी को लेकर रणनीति की जद्दोजहद है। दंगे ने सियासी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया था। सांप्रदायिक माहौल में हुए ध्रुवीकरण का फायदा सीधे भाजपा ने उठाया था। लोकसभा चुनाव में सूबे में मोदी लहर को उछाल देने में दंगे की अहम भूमिका रही। यही वजह है कि बसपा और रालोद का कोई सांसद चुनाव नहीं जीत पाया। सपा को भी केवल पांच सीटों पर संतोष करना पड़ा।
किसान राजनीति के महानायक चौधरी चरण सिंह ने जाट और मुसलिम समीकरण खड़ा कर प्रदेश और देश की सत्ता पर राज किया था। परंपरागत वोट बैंक बिखरने पर हाशिए पर गई रालोद फिर से खड़ा होने की कवायद में जुटी है। लोकसभा चुनाव में जाटों ने बड़ी संख्या में भाजपा के हक में वोट देकर छोटे चौधरी की पेशानी पर बल ला दिए। विधानसभा चुनाव रालोद के लिए जहां चुनौती है, वहीं बसपा को भी दुगनी ताकत से खड़ा होना पड़ेगा।
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बसपा सुप्रीमो मायावती की निगाहें भी मुसलिम वोटों पर टिकी हैं। पश्चिम में घोषित किए गए विधानसभा प्रत्याशियों में ज्यादातर मुसलिम उम्मीदवार हैं। यह तय है कि चुनावी रण में मुसलिमों को साधने के लिए बसपा और सपा में तलवारें खिचेंगी। दंगे का यह प्रभाव जरूर रहा कि अगड़ी जातियों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग की एकजुटता ने भाजपा को ताकत दी।
मुसलिमों की नाराजगी झेल रही सियासी पार्टियां अतिपिछड़ों को अपने पक्ष में करने की जुगत भिड़ा रही हैं। दंगे को तीन साल हो चुके हैं, लेकिन अलग-अलग सियासी पार्टियों में मौजूद नेताओं के लिए अपनी सीटें तय करना और जीत का गणित बैठाना सिरदर्द बना हुआ है।
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मिशन 2017 के लिए सभी सियासी पार्टियों में वेस्ट यूपी को लेकर रणनीति की जद्दोजहद है। दंगे ने सियासी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया था। सांप्रदायिक माहौल में हुए ध्रुवीकरण का फायदा सीधे भाजपा ने उठाया था। लोकसभा चुनाव में सूबे में मोदी लहर को उछाल देने में दंगे की अहम भूमिका रही। यही वजह है कि बसपा और रालोद का कोई सांसद चुनाव नहीं जीत पाया। सपा को भी केवल पांच सीटों पर संतोष करना पड़ा।
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किसान राजनीति के महानायक चौधरी चरण सिंह ने जाट और मुसलिम समीकरण खड़ा कर प्रदेश और देश की सत्ता पर राज किया था। परंपरागत वोट बैंक बिखरने पर हाशिए पर गई रालोद फिर से खड़ा होने की कवायद में जुटी है। लोकसभा चुनाव में जाटों ने बड़ी संख्या में भाजपा के हक में वोट देकर छोटे चौधरी की पेशानी पर बल ला दिए। विधानसभा चुनाव रालोद के लिए जहां चुनौती है, वहीं बसपा को भी दुगनी ताकत से खड़ा होना पड़ेगा।
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बसपा सुप्रीमो मायावती की निगाहें भी मुसलिम वोटों पर टिकी हैं। पश्चिम में घोषित किए गए विधानसभा प्रत्याशियों में ज्यादातर मुसलिम उम्मीदवार हैं। यह तय है कि चुनावी रण में मुसलिमों को साधने के लिए बसपा और सपा में तलवारें खिचेंगी। दंगे का यह प्रभाव जरूर रहा कि अगड़ी जातियों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग की एकजुटता ने भाजपा को ताकत दी।
मुसलिमों की नाराजगी झेल रही सियासी पार्टियां अतिपिछड़ों को अपने पक्ष में करने की जुगत भिड़ा रही हैं। दंगे को तीन साल हो चुके हैं, लेकिन अलग-अलग सियासी पार्टियों में मौजूद नेताओं के लिए अपनी सीटें तय करना और जीत का गणित बैठाना सिरदर्द बना हुआ है।