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तीन अगस्त को खेती में संभावनाएं तलाशने को बैठक
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मुजफ्फरनगर। कम जोत की कृषि को लाभप्रद बनाने एवं निर्यात की संभावनाये तलाशने को भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक का एक प्रतिनिधिमंडल कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के दिल्ली मुख्यालय में तीन अगस्त को बैठक करेगा।
संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने बताया कि खेती पुश्तैनी होने के कारण खेती की जमीन छोटी हो रही है, जिसके कारण लघु, सीमांत किसानों के लिए जीवन यापन मुश्किल हो रहा है। इसका एक कारण कृषि में निवेश व नवाचार भी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व राजस्थान का कुछ क्षेत्र, मध्य प्रदेश अभी तक हरित क्रांति में ही उलझा हुआ है। इन्हीं क्षेत्रों में कुछ किसानों ने नई तकनीक के साथ खेती को बाजारोन्मुखी बनाया और अच्छी कमाई कर रहे है।
किसान आर्थिक रूप से कमजोर होता है, इसलिए रिस्क लेने की हालत में नहीं होता है। किसान मजबूरी में परंपरागत खेती में उलझा रहता है। अगर किसान के पास 10 बीघा जमीन है, तो उसके एक चौथाई भाग में बागवानी करनी चाहिए। एक भाग में ग्रीन हाउस या पोली हाउस से बेमौसम की सब्जियां और फूल की खेती करनी चाहिए। बागवानी खेती में आय मुख्यतया दो साल बाद में शुरू होती है। जब बागवानी खेती में आय शुरू हो जाये तो अगली आधी जमीन को बागवानी या सब्जी की खेती में तब्दील कर दें। भारतीय फल और सब्जियां मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका, नीदरलैंड, बांग्लादेश, मलेशिया, नेपाल, ओमान और कतर आदि देशों को भेजी जाती हैं।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्वीटकॉर्न, अमेरिकन गाजर, मशरूम, खीरा, पपीता, आम, बीन, गुड , गुड के जैम, जैविक गेहूँ, चावल, फूल के उत्पादन व निर्यात की अपार संभावनायें हैं। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक का 11 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल इन सभी विषयों पर एपीडा के चेयरमैन के साथ तीन अगस्त को सुबह दस बजे बैठक करेगा।
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संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने बताया कि खेती पुश्तैनी होने के कारण खेती की जमीन छोटी हो रही है, जिसके कारण लघु, सीमांत किसानों के लिए जीवन यापन मुश्किल हो रहा है। इसका एक कारण कृषि में निवेश व नवाचार भी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व राजस्थान का कुछ क्षेत्र, मध्य प्रदेश अभी तक हरित क्रांति में ही उलझा हुआ है। इन्हीं क्षेत्रों में कुछ किसानों ने नई तकनीक के साथ खेती को बाजारोन्मुखी बनाया और अच्छी कमाई कर रहे है।
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किसान आर्थिक रूप से कमजोर होता है, इसलिए रिस्क लेने की हालत में नहीं होता है। किसान मजबूरी में परंपरागत खेती में उलझा रहता है। अगर किसान के पास 10 बीघा जमीन है, तो उसके एक चौथाई भाग में बागवानी करनी चाहिए। एक भाग में ग्रीन हाउस या पोली हाउस से बेमौसम की सब्जियां और फूल की खेती करनी चाहिए। बागवानी खेती में आय मुख्यतया दो साल बाद में शुरू होती है। जब बागवानी खेती में आय शुरू हो जाये तो अगली आधी जमीन को बागवानी या सब्जी की खेती में तब्दील कर दें। भारतीय फल और सब्जियां मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका, नीदरलैंड, बांग्लादेश, मलेशिया, नेपाल, ओमान और कतर आदि देशों को भेजी जाती हैं।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्वीटकॉर्न, अमेरिकन गाजर, मशरूम, खीरा, पपीता, आम, बीन, गुड , गुड के जैम, जैविक गेहूँ, चावल, फूल के उत्पादन व निर्यात की अपार संभावनायें हैं। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक का 11 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल इन सभी विषयों पर एपीडा के चेयरमैन के साथ तीन अगस्त को सुबह दस बजे बैठक करेगा।