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हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मस्तान शाह का मकबरा
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1928 में अंग्रेज कलेक्टर आर मिल्नर व्हाइट ने बनवाया था मकबरा
28 और 29 जुलाई को सालाना उर्स का आयोजन होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
बुढ़ाना। खेड़ा मस्तान में पीर बाबा मस्तान शाह के मजार परिसर में 28 और 29 जुलाई को सालाना उर्स का आयोजन होगा। दरगाह कमेटी के पदाधिकारी सिराजुद्दीन ने बताया कि पीर बाबा मस्तान शाह का मकबरा तत्कालीन अंग्रेज कलक्टर आर मिल्नर व्हाइट ने 1928 में बनवाया था। पीर बाबा का मजार हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। चुरमे का प्रसाद और सरसों के तेल का दीपक के साथ चादर चढ़ाने पर पीर बाबा सभी की मनोकामनाएं पूरी करते है।
अंग्रेजी शासन काल में गठवाला खाप के गांव खेड़ा मस्तान नाम भोगल खेड़ा हुआ करता था। बाद में भोगल खेड़ा से बदलकर खेड़ा मस्तान हो गया। खेड़ामस्तान गांव की एक लंबी कहानी है। शाही मुगल खानदान के वंशज मस्तान शाह बचपन में वैरागी हो गए थे। शाही महल को छोड़कर उन्होंने एकांत में जाकर इबादत की। गांव खरड़ कीजूड़ में इबादत करते हुए वे खेड़ा मस्तान गांव में आ गए थे। गांव के बहार निर्जन स्थान पर बड़े झाड़ तथा बरगद के पेड़ के पास उन्होंने अपनी इबादत की। मस्तान शाह की प्रसिद्धि पूरे क्षेत्र में फैल गई। 1928 में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन कलक्टर आर मिल्नर व्हाइट अपने एक हिंदुस्तानी नौकर के साथ मस्तान शाह के पास पहुंचे। कलक्टर ने मस्तानशाह के सम्मान में सर नहीं झुकाया तो वे घोडे़ सहित जमीन पर गिर पडे़ थे। अंग्रेज कलेक्टर मस्तानशाह के चरणों में जाकर गिरे थे। बाबा मस्तानशाह ने उन्हें माफ कर दिया था।
वर्ष 1928 में ही पीर बाबा मस्तान शाह ने अपने भक्तों के सामने अपना शरीर त्याग दिया था। इस दौरान अंग्रेज कलेक्टर भी वहां मौजूद थे। उन्होंने ही पीर बाबा मस्तान शाह कामकबरा बनवाया। इमारत के मुख्य द्वार पर लगा पत्थर आज भी उनकी याद दिलाता है। इस मजार पर प्रति वर्ष दो दिवसीय उर्स का आयोजन होता है। दूरदराज से आनेवाले लोग उनके मजार पर पहुंचकर धूपबत्ती, प्रसाद व चादर चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।
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कोरोना संक्रमण के कारण दो साले से नहीं हुआ आयोजन
दरगाह कमेटी के पदाधिकारी सिराजुद्दीन ने बताया कि कोरोना महामारी के कारण दो वर्ष में उर्स का आयोजन नहीं हो सका। इस बार दरगाह परिसर में उर्स का आयोजन होगा। श्रद्धालु मस्तान शाह के मजार पर चादर और प्रसाद चढ़ा सकेंगे।
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28 और 29 जुलाई को सालाना उर्स का आयोजन होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
बुढ़ाना। खेड़ा मस्तान में पीर बाबा मस्तान शाह के मजार परिसर में 28 और 29 जुलाई को सालाना उर्स का आयोजन होगा। दरगाह कमेटी के पदाधिकारी सिराजुद्दीन ने बताया कि पीर बाबा मस्तान शाह का मकबरा तत्कालीन अंग्रेज कलक्टर आर मिल्नर व्हाइट ने 1928 में बनवाया था। पीर बाबा का मजार हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। चुरमे का प्रसाद और सरसों के तेल का दीपक के साथ चादर चढ़ाने पर पीर बाबा सभी की मनोकामनाएं पूरी करते है।
अंग्रेजी शासन काल में गठवाला खाप के गांव खेड़ा मस्तान नाम भोगल खेड़ा हुआ करता था। बाद में भोगल खेड़ा से बदलकर खेड़ा मस्तान हो गया। खेड़ामस्तान गांव की एक लंबी कहानी है। शाही मुगल खानदान के वंशज मस्तान शाह बचपन में वैरागी हो गए थे। शाही महल को छोड़कर उन्होंने एकांत में जाकर इबादत की। गांव खरड़ कीजूड़ में इबादत करते हुए वे खेड़ा मस्तान गांव में आ गए थे। गांव के बहार निर्जन स्थान पर बड़े झाड़ तथा बरगद के पेड़ के पास उन्होंने अपनी इबादत की। मस्तान शाह की प्रसिद्धि पूरे क्षेत्र में फैल गई। 1928 में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन कलक्टर आर मिल्नर व्हाइट अपने एक हिंदुस्तानी नौकर के साथ मस्तान शाह के पास पहुंचे। कलक्टर ने मस्तानशाह के सम्मान में सर नहीं झुकाया तो वे घोडे़ सहित जमीन पर गिर पडे़ थे। अंग्रेज कलेक्टर मस्तानशाह के चरणों में जाकर गिरे थे। बाबा मस्तानशाह ने उन्हें माफ कर दिया था।
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वर्ष 1928 में ही पीर बाबा मस्तान शाह ने अपने भक्तों के सामने अपना शरीर त्याग दिया था। इस दौरान अंग्रेज कलेक्टर भी वहां मौजूद थे। उन्होंने ही पीर बाबा मस्तान शाह कामकबरा बनवाया। इमारत के मुख्य द्वार पर लगा पत्थर आज भी उनकी याद दिलाता है। इस मजार पर प्रति वर्ष दो दिवसीय उर्स का आयोजन होता है। दूरदराज से आनेवाले लोग उनके मजार पर पहुंचकर धूपबत्ती, प्रसाद व चादर चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।
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कोरोना संक्रमण के कारण दो साले से नहीं हुआ आयोजन
दरगाह कमेटी के पदाधिकारी सिराजुद्दीन ने बताया कि कोरोना महामारी के कारण दो वर्ष में उर्स का आयोजन नहीं हो सका। इस बार दरगाह परिसर में उर्स का आयोजन होगा। श्रद्धालु मस्तान शाह के मजार पर चादर और प्रसाद चढ़ा सकेंगे।